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सबरीमाला: इसलिए महिलाएं ही हैं महिलाओं के विरोध में, हैरान करती है ये कहानी
Updated Wed, 31 Oct 2018 05:42 PM IST
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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को संविधान से मिलने वाले उनके अधिकारों के मद्देनजर उन्हें प्रवेश देने का आदेश जारी किया। लेकिन खुद महिलाएं ही इस आदेश के खिलाफ खड़ी हो गईं। महिला अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली यह कौन सी लड़ाई है, जिसे महिलाओं का ही समर्थन प्राप्त नहीं है? आपको याद होगा कि यह फैसला 4:1 के बहुमत से आया था जिसमें एकमात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ने इस फैसला का विरोध किया था। उस समय भी यह बात उठी थी कि यह विषय कानूनी अधिकारों का नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का है।
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इसलिए हो रहा कोर्ट के फैसले का विरोध
दरअसल, देखा जाए तो विश्व के किसी भी कानून में इस विवाद का हल नहीं मिलेगा, क्योंकि व्यक्ति में अगर श्रद्धा और आस्था है, तो गंगा का जल "गंगा जल" है, नहीं तो बहता पानी। इसी प्रकार यह मनुष्य की आस्था ही है जो पत्थर में भगवान को देखती भी है और पूजती भी है। लेकिन क्या दुनिया का कोई संविधान या कानून उस जल में गंगा मैया के अस्तित्व को या फिर उस पत्थर में ईश्वर की सत्ता को सिद्ध कर सकता है?
दरअसल, देखा जाए तो विश्व के किसी भी कानून में इस विवाद का हल नहीं मिलेगा, क्योंकि व्यक्ति में अगर श्रद्धा और आस्था है, तो गंगा का जल "गंगा जल" है, नहीं तो बहता पानी। इसी प्रकार यह मनुष्य की आस्था ही है जो पत्थर में भगवान को देखती भी है और पूजती भी है। लेकिन क्या दुनिया का कोई संविधान या कानून उस जल में गंगा मैया के अस्तित्व को या फिर उस पत्थर में ईश्वर की सत्ता को सिद्ध कर सकता है?
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यही कारण है कि न्यायालय के इस फैसला को उन्ही महिलाओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिनके हक में उसने फैसला सुनाया है। शायद इसीलिए कोर्ट के इस आदेश से प्रशासन के लिए भी बड़ी ही विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई, जब मंदिर में वो ही औरतें प्रवेश करना चाहती रहीं जिनकी न तो अय्यपा में आस्था है, ना ही सालों पुरानी इस मंदिर की परंपरा में, जबकि जो महिलाएं अय्यपा के प्रति श्रद्धा रखती हैं, वो कोर्ट के आदेश के बावजूद ना तो खुद मंदिर में जाना चाहती हैं और न ही किसी और महिला को जाने देना चाहती हैं, तो यह महिलाओं का कौन सा वर्ग है जो अपने संवैधानिक अधिकारों के नाम पर मंदिर में प्रवेश की अनुमति चाहता है।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या संविधान के दायरे में बंधे न्यायालयों के फैसले भारत की आत्मा के साथ न्याय कर पाते हैं? कहीं संविधान और लोकतंत्र का उपयोग आज केवल एक दूसरे की रक्षा के लिए तो नहीं हो रहा? कहीं इनकी रक्षा की आड़ में भारत की संस्कृति के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा?
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या संविधान के दायरे में बंधे न्यायालयों के फैसले भारत की आत्मा के साथ न्याय कर पाते हैं? कहीं संविधान और लोकतंत्र का उपयोग आज केवल एक दूसरे की रक्षा के लिए तो नहीं हो रहा? कहीं इनकी रक्षा की आड़ में भारत की संस्कृति के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा?
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आस्था और अधिकारों का सम्मान
पिछले कुछ समय से उस देश में महिलाओं के लिए पुरुषों के समान अधिकारों की मांग लगातार उठाई जा रही है, जिसकी संस्कृति में सृष्टि के निर्माण के मूल में स्त्री-पुरूष दोनों के समान योगदान को स्वयं शिव ने अपने अर्धनारीश्वर के रूप में व्यक्त किया हो, वहां इस तरह के मामले समाज के भीतर एक विषमता और विरोधाभास पैदा करते हैं।
दरअसल, भारतीय संस्कृति विविधता में एकता के सूत्र की स्थापना करती है। देश का संविधान भी हर व्यक्ति को अपनी मर्जी से धर्म चुनने, उस पर आस्था रखने की आजादी देता है। ऐसे मामलों में अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए किसी के अधिकारों का ध्यान रखना जितना जरूरी है, उतना ही किसी की आस्था और विश्वास का सम्मान करना भी।
सबरीमाला मामले में महिलाओं के अधिकार और आस्था दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
पिछले कुछ समय से उस देश में महिलाओं के लिए पुरुषों के समान अधिकारों की मांग लगातार उठाई जा रही है, जिसकी संस्कृति में सृष्टि के निर्माण के मूल में स्त्री-पुरूष दोनों के समान योगदान को स्वयं शिव ने अपने अर्धनारीश्वर के रूप में व्यक्त किया हो, वहां इस तरह के मामले समाज के भीतर एक विषमता और विरोधाभास पैदा करते हैं।
दरअसल, भारतीय संस्कृति विविधता में एकता के सूत्र की स्थापना करती है। देश का संविधान भी हर व्यक्ति को अपनी मर्जी से धर्म चुनने, उस पर आस्था रखने की आजादी देता है। ऐसे मामलों में अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए किसी के अधिकारों का ध्यान रखना जितना जरूरी है, उतना ही किसी की आस्था और विश्वास का सम्मान करना भी।
सबरीमाला मामले में महिलाओं के अधिकार और आस्था दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.