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दूसरा पहलू: 'सांसें' खोती नदियां और खतरे का अलार्म, घुलित ऑक्सीजन की कमी जलीय जीवन पर संकट

Wed, 03 Jun 2026 08:30 AM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Wed, 03 Jun 2026 08:30 AM IST
सार

ग्लोबल वार्मिंग, बढ़ता तापमान, प्रदूषण व मानवीय गतिविधियों के कारण नदियों के पानी में घुलित ऑक्सीजन (डीओ) कम हो रही है।  स्वस्थ नदी के पानी में डीओ का स्तर छह से आठ मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होना चाहिए। इससे कम मात्रा खतरे का संकेत है। डीओ का स्तर तीन से नीचे पहुंचने पर मछलियों के लिए जीवित रहना कठिन हो जाता है, जबकि दो मिलीग्राम प्रति लीटर से कम स्तर पर जलीय जीवन समाप्त होने लगता है।

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rivers losing their breath and alarming the danger; lack of dissolved oxygen threatens aquatic life
'सांसें' खोती नदियां और खतरे का अलार्म - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

धरती पर जल संकट को लेकर दुनिया लंबे समय से चिंतित है, पर अब खतरा केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रह गया है। नदियां धीरे-धीरे अपनी ‘सांस’ खो रही हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, प्रदूषण और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के कारण नदियों के पानी में घुलित ऑक्सीजन (डीओ) तेजी से कम हो रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो सदी के अंत तक भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों की नदियां ‘डेड जोन’, यानी ऐसे जलक्षेत्रों में बदल सकती हैं, जहां जलीय जीवन लगभग समाप्त हो जाएगा।
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साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस संकट की गंभीर तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट में पाया गया कि पिछले चार दशकों में नदियों में घुलित ऑक्सीजन का स्तर औसतन 2.1 प्रतिशत घट चुका है और दुनिया की लगभग 78.8 प्रतिशत नदियां ऑक्सीजन खो रही हैं। पानी में मौजूद डीओ ही जलीय जीवन की ‘सांस’ है। जलीय जीव-जंतु और कई पौधे इसी ऑक्सीजन पर निर्भर रहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, स्वस्थ नदी के पानी में डीओ का स्तर छह से आठ मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होना चाहिए।
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इस पैमाने के तीन से नीचे पहुंचने पर कई मछलियों के लिए जीवित रहना कठिन हो जाता है, जबकि दो मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों को ‘हाइपॉक्सिक’ या ‘डेड जोन’ कहा जाता है, जहां अधिकांश जलीय जीवन समाप्त होने लगता है। दरअसल, ठंडा पानी अधिक ऑक्सीजन को अपने भीतर बनाए रख सकता है, जबकि गर्म पानी में ऑक्सीजन धारण करने की क्षमता कम हो जाती है। जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे नदियों का पानी भी गर्म हो रहा है और ऑक्सीजन का तेजी से ह्रास हो रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे नदियों की ‘सांस उखड़ने’ जैसा संकट बता रहे हैं।
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शोध के अनुसार, वैश्विक स्तर पर नदी-ऑक्सीजन ह्रास के पीछे लगभग 62.7 प्रतिशत जिम्मेदारी जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि की है। दरअसल, नदियों में घटती ऑक्सीजन केवल पर्यावरणीय खबर नहीं है। यह चेतावनी है कि भविष्य में पानी तो बहेगा, पर उसमें जीवन नहीं बचेगा। दुनिया को यह समझना होगा कि यदि नदियों की सांसें उखड़ने लगीं, तो इन्सानी सभ्यता भी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पाएगी।
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