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कोटा की महत्वकांक्षा में डूबता भविष्य: क्यों करियर की आग में झोंका जा रहा जीवन, कौन समझाएगा अभिभावकों को?

Mon, 28 Aug 2023 01:01 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 28 Aug 2023 01:01 PM IST
सार

इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा कोचिंग्स की प्रसिद्धि देशभर में है। तकरीबन डेढ़-दो लाख बच्चे हर साल कोटा कोचिंग में पढ़ाई के लिए आते हैं। पिछले कुछ अरसे से कोटा, कोचिंग से ज्यादा बच्चों की खुदकुशी के लिए पहचान बनाने लगा है। इन दिनों बच्चों की खुदकुशी का सिलसिला तेजी बढ़ा है, जिसने सरकार और अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है।

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Rising student suicides in Kota know its causes and how to prevent it
छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की दर - फोटो : istock

विस्तार

साल 2009 में फिल्म आई थी थ्री इडियट्स। फिल्म ने समाज में एक जनजागृति पैदा की थी कि बच्चे की रुचि के अनुसार उसे करियर चुनने की आजादी दी जाए। थ्री-इडियट्स फिल्म देखने के बाद बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों को यह आजादी दी भी, पर शायद कई अभिभावक ऐसे भी हैं, जो अपने बच्चों को किसी भी हालत में डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखते हैं। उनमें कुछ अभिभावकों का यह सपना राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा से होकर गुजरता है।

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इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा कोचिंग्स की प्रसिद्धि देशभर में है। तकरीबन डेढ़-दो लाख बच्चे हर साल कोटा कोचिंग में पढ़ाई के लिए आते हैं। पिछले कुछ अरसे से कोटा, कोचिंग से ज्यादा बच्चों की खुदकुशी के लिए पहचान बनाने लगा है। इन दिनों बच्चों की खुदकुशी का सिलसिला तेजी बढ़ा है, जिसने सरकार और अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है।
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समस्या यह है कि खुदकुशी कैसे रुके? इसका कोई सीधा-सीधा समाधान न तो कोचिंग वाले ढूंढ पा रहे हैं और न ही शासन-प्रशासन। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कोटा के कलेक्टर को कोचिंग सेंटर में वीकली टेस्ट लेने पर रोक लगानी पड़ी है। गेस्ट हाउस और हॉस्टल के पंखों में स्प्रिंग लगा दी गई है। फिर भी खुदकुशी रुकेगी? इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता है।
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पिछले 8 महीने में 23 बच्चे आधिकारिक रूप से कोटा में खुदकुशी कर चुके हैं। केवल कोटा में नहीं, देशभर में इन खुदकुशी की घटनाओं को लेकर हड़कंप मचा हुआ है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछले दिनों कोटा के कोचिंग संचालकों से मिले। इस दिशा में समाधान की कोशिश की।

मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि हम बच्चों को मरते हुए नहीं देख सकते। उन्होंने खुदकुशी को लेकर एक कमेटी बना दी है, जिसे 15 दिन में रिपोर्ट देनी है। इसी सप्ताह यह कमेटी रिपोर्ट दे सकती है। मुख्यमंत्री ने कहा था कि आजकल ऐसा माहौल बन गया है, जैसे आईआईटीएन बन गया तो जैसे खुदा बन गया।

दरअसल, कोटा कोचिंग में एक ऐसी रेस चल रही है, जिसे रोक पाना अब शायद न सरकारों के बस में है, न समाज के, क्योंकि हर कोई अपने बच्चों को आईआईटी और मेडिकल में एडमिशन कराना चाहता है। कोटा में स्थिति यह है कि हर साल करीब 2 लाख बच्चे यहां कोचिंग करते हैं। यहां कोचिंग का सालाना कारोबार 5000 करोड़ रुपये को भी पार कर गया है।

कोटा कोचिंग से लाखों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़े हुए हैं। एक तरह से कहा जाए तो कोटा कोचिंग के आसपास एक बड़ी इंडस्ट्री खड़ी हो गई है, जिसमें हर कोई अपना हिस्सा ढूंढ रहा है।


कोचिंग नहीं है आपके सफलता की गारंटी

बड़ा सवाल यह है कि क्या कोचिंग के माध्यम से सभी बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर बनाया जा सकता है? क्योंकि एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि इतने सारे बच्चे कोचिंग के माध्यम से आईआईटी या एम्स जैसे संस्थानों में सिलेक्ट नहीं हो सकते। स्थिति तो यह है कि एक-एक कोचिंग क्लास में एक साथ चार सौ बच्चे पढ़ते हैं। जो आगे की पंक्ति होती है, उसमें टैलेंटेड बच्चों को कोचिंग संस्थान खुद प्राथमिकता देते हैं। बाकी तो भीड़ ही होती है।

कुछ साल पहले इंफोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति ने इस बात को लेकर चिंता जाहिर की थी कि कोचिंग के माध्यम से परीक्षा पास करने की ट्रिक सीखकर बच्चों को आईआईटी जैसे बड़े इंस्टीट्यूट में भेजा जा रहा है, जबकि वह नेचुरल टैलेंट नहीं होता है। उस समय मूर्ति ने आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों में गिरते स्तर के लिए इन्हीं कोचिंग सेंटर्स को जिम्मेदार ठहराया था। 

Rising student suicides in Kota know its causes and how to prevent it
कोटा कोचिंग छात्रों का सुसाइड - फोटो : Social Media

फिर आखिर समाधान क्या है? लाखों रुपये खर्च करके बच्चा कोटा कोचिंग में दाखिला लेता है और साल भर कोचिंग करने के बाद यदि उसका दाखिला नहीं होता है तो वह क्या करे? दूसरा कोचिंग के अंदर भी एक ऐसा कंपटीशन क्रिऐट हो जाता है कि बच्चा कम नंबर लाने पर अवसाद में चला जाता है। अधिकांश आत्महत्याओं के पीछे यह एक बड़ा कारण बताया जा रहा है।

बहुत सारे बच्चे अपनी रुचि या इच्छा के विपरीत परिवार के दबाव में कोटा भेज दिए जाते हैं, जो पढ़ाई के दबाव को झेल नहीं पाते। कुछ बच्चों में फेल होकर परिवार के पास लौटने का साहस नहीं होता और वो आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लेते हैं। 


कैसे रुकेंगे आत्महत्या के मामले?

बच्चे अपनी जीवन लीला समाप्त न करें, इसके लिए सरकार के साथ कोचिंग संस्थानों को भी रास्ता निकालना पड़ेगा। अभिभावकों को इस दिशा में सकारात्मक रूप से सोचना होगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना बिल्कुल उचित है कि कोई आईआईटी कर लेगा तो खुदा नहीं बन जाएगा।

आज देश में आईआईटी और मेडिकल के अलावा बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बच्चे अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं। अच्छे पैसे बना रहे हैं। बेहतर तो यही होगा कि स्कूल के स्तर पर बच्चों की रुचि का पता लगाया जाए और बच्चा अपनी फील्ड चुन सकें। इस दिशा में सरकार की बनाई नई शिक्षा नीति में कई बदलाव किए गए हैं, जिनका दूरगामी असर देखने को मिलेगा।

कोटा कोचिंग में यह भी देखने को मिलता है कि अभिभावक बच्चों को दसवीं कक्षा के बाद कोचिंग में डाल देते हैं। कोचिंग सेंटर डमी स्कूलों से बारहवीं की कक्षा करवाते हैं। सरकार कम से कम ऐसे डमी स्कूलों की व्यवस्था को तो तत्काल रुकवा सकती है।

समाज के स्तर पर भी इस दिशा में बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है। जरूरत तो थ्री इडियट्स जैसी फिल्में लगातार बनाने की है, ताकि अभिभावकों को समय-समय पर ध्यान दिलाया जा सके कि करियर से कहीं ज्यादा उनके बच्चे का जीवन अनमोल है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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