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Republic day 2021: मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्य भी समझने होंगे

Tue, 26 Jan 2021 11:56 AM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Tue, 26 Jan 2021 11:56 AM IST
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Republic day 2021 26 january Along with fundamental rights fundamental duties also have to be understood
गणतंत्र दिवस पर हम अपने कर्तव्यों को कब समझेंगे। - फोटो : iStock

26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया। संविधान ही वह दस्तावेज है जिसमें वर्णित मौलिक अधिकारों के बल पर हम देश प्रदेश के हर कोने में अपनी हर प्रकार की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं। किसी भी प्रकार का अन्याय होने पर यही मौलिक अधिकार हमारी ढाल बन जाते हैं। मेरी तरह हर भारतीय खुद को सौभाग्यशाली समझता है कि उसे ऐसे मौलिक अधिकार मिले, जिससे वह अपने जीवन को बिना किसी डर भय के व्यतीत कर सकता है।

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हम सब मौलिक अधिकारों की बात तो बड़ेे जोर-शोर से करते हैं, लेकिन जब बात आती है देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की तो हम सब पीछे हटने और टाल मटोली वाली हालत में आ जाते हैं। इसी संविधान ने हमें समाज व देश के प्रति जो जिम्मेदारी तय करने के मौलिक कर्तव्य दिए उसकी बात या तो कोई करना नहीं चाहता या हम जानबूझकर नहीं करते, मतलब साफ है कि हम पाना तो सबकुछ चाहते हैं लेकिन बदले में या अपना दायित्व समझ कर कुछ करना नहीं चाहते। 
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इसी संविधान में वर्ष 1976 में अपनाए गए 42वां संविधान संशोधन के द्वारा नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया। संविधान के भाग IV में सन्निहित अनुच्छेद 51 'क' मौलिक कर्तव्यों के बारे में है।
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यह अन्य चीजों के साथ-साथ नागरिकों को संविधान का पालन करने, आदर्श विचारों को बढ़ावा देने और अनुसरण करने का आदेश देता है, जो भारत के स्वंतत्रता संग्राम से प्रेरणा लेता है, देश की रक्षा करने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर देश की सेवा करने और सौहार्द्रता एवं समान बंधुत्व की भावना विकसित करने व धार्मिकता का संवर्धन करना, साथ ही भाषाविद् और क्षेत्रीय एवं वर्ग विविधताओं का विकास करने का आदेश व प्रेरणा देते हैं। 

सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा पर ही संविधान के 42वें संशोधन -1976 ई० के द्वारा मौलिक कर्तव्य को संविधान में जोड़ा गया। मौलिक कर्त्तव्यों को रूस के संविधान से लिया गया है। कहने को तो मौलिक कर्तव्य की संख्या 11 है, परंतु इन मौलिक कर्त्तव्यों में कुछेक कर्तव्यों को एक दूसरे में जोड़ दिया गया है अर्थात् नाम अलग-अलग कर दिया है।

मैं बात करूं विशेष व जरूरी मौलिक कर्तव्यों की तो सबसे पहले बात आती है संविधान में वर्णित प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।

प्रत्येक देशवासी का मौलिक कर्तव्य बनता है कि भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे लेकिन यहां भी हम कहां निभा पाते हैं इस कर्तव्य को। 

हमें यह याद जरूर रहता है कि हमें हमारी सुरक्षा का मौलिक अधिकार मिला है पर देश की सुरक्षा अखंडता की आज कितने लोग परवाह कर रहे हैं। देश की रक्षा केवल सीमा पर जाकर या सैनिक बन कर ही नहीं हो सकती।

हम देश या अपने क्षेत्र में भाईचारे की भावना को पैदा कर भी देश की रक्षा कर सकते हैं। आज जातिवाद या धर्म के नाम पर बंटने बांटने की बजाए हम क्यों नहीं अपने मौलिक कर्त्तव्य का पालन करते। अपने-अपने धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बात तो सब करते हैं, लेकिन सर्वधर्म स्वतंत्रता व धार्मिक विश्वास को बढ़ाने की बात आखिर क्यों नहीं की जाती? तब हम इसी मौलिक अधिकार के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य की बात क्यों नहीं करना चाहते?

Republic day 2021 26 january Along with fundamental rights fundamental duties also have to be understood
भारत का झंडा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

हम अपने लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, व सड़क जैसी जनसुविधाएं पाने के लिए अपने मौलिक अधिकारों की बात भी करते हैं लेकिन कभी इन्हीं जनसुविधाओं को पा लेने के बाद इनके प्रति रख रखाव की बात हम क्यों नहीं करते?

हमें परिवहन सुविधा मिलती है लेकिन हम उसी सुविधा के प्रति अपने मौलिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। अपने-अपने क्षेत्र में सरकारी बस चले ऐसा अधिकार तो हम चाहते हैं लेकिन उन्हीं बसों को अपने आक्रोश या किसी मांग को पूरा करने करवाने के लिए जला देते हैं। कई बार बस में बैठे बस की सीट को फाड़ देना या किसी को ऐसा करते न रोकना भी तो मौलिक कर्तव्यों का हनन है। 

अपनी मांगों को मनवाने के लिए हम मौलिक अधिकार की आड़ लेकर आंदोलन करते हैं लेकिन मौलिक अधिकार में शांति पूर्वक रोष प्रकट करने की बात है न कि हिंसक प्रदर्शन या आगजनी कर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना?

हम तब क्यों भूल जाते हैं कि सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखने का मौलिक कर्त्तव्य भी इसी संविधान ने दिया है। आपका रोष व्यवस्था से हो सकता है लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना मतलब खुद की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है।

ये कोई मुफ्त में मिला उपहार नहीं होता यह हम सब के द्वारा करों के रूप में किए भुगतान से होने वाली आय से बनी संपत्ति होती है। चाहे कोई ग्रामीण हो या शहरी सभी को सड़क सुविधा तो चाहिए लेकिन जब यही सड़क सुविधा मिल जाती है तो देखने में आता है कि कोई अपने घर के व्यर्थ पानी को सड़क पर फेंक रहा है किसी के शौचालय की निकासी सड़क पर है तो कोई निजी कार्य के लिए सड़क को उखाड़ रहा है। 

सुविधा हेतु मौलिक अधिकार तो याद रहा लेकिन उसी सुविधा अर्थात् सार्वजनिक संपत्ति के प्रति हमें अपने मौलिक कर्त्तव्यों की याद क्यों नहीं रहती। हमारा मौलिक कर्त्तव्य है पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना परंतु आए दिन जंगलों को अवैध रूप से काटने से खुद को या अन्य को कहां रोक पा रहे हैं।

माता-पिता या संरक्षक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना (86वां संशोधन) जहां बच्चों का मौलिक अधिकार है वहीं यह दूसरी तरफ इनके अभिभावकों का मौलिक कर्त्तव्य भी है कि बच्चों को शिक्षित बनाएं। देखा जाए तो अधिकारों एवं कर्तव्यों का परस्पर घनिष्ठ संबंध है।

अधिकारों का अभिप्राय है कि मनुष्य को कुछ स्वतंत्रताएं प्राप्त होनी चाहिए, जबकि कर्तव्यों का अर्थ है कि व्यक्ति के ऊपर समाज के कुछ ऋण हैं। समाज का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति का विकास न होकर सभी मनुष्यों के व्यक्तित्व का समुचित विकास है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य जुड़े हुए हैं जिनको निभाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

देखा जाए तो हम आप मौलिक अधिकारों को अपनी जागीर मानते हैं जबकि मौलिक कर्तव्यों को दूसरों के लिए छोड़ देते हैं मतलब लेने का अधिकार हमारा और देने का किसी दूसरे का यह सोच हमें विकसित होने नहीं दे सकती।  

एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सब की अपने राष्ट्र के प्रति जवाबदेही बनती है। मौलिक अधिकार जहां हमें देश में स्वतंत्र रूप से रहने सहने की शक्तियां देते हैं वहीं मौलिक कर्त्तव्य हमें देश के प्रति बनते हमारे दायित्व को निभाने के आदेश देते हैं। मौलिक अधिकार व मौलिक कर्त्तव्य एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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