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इसलिए आरसीईपी से अलग हुआ भारत? क्या मोदी सरकार ने लिया सही फैसला?

Thu, 07 Nov 2019 04:05 PM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Thu, 07 Nov 2019 04:05 PM IST
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regional comprehensive economic partnership 2019 why india will not participate
भारत की चिंताओं को अगर भविष्य में दूर किया जाएगा तो भारत इसमें शामिल होगा। - फोटो : Twitter

भारत ने 16 देशों के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (रीजनल कंप्रेहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशीप) में फिलहाल शामिल नहीं होगा। रीजनल कंप्रहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशीप (आरसीईपी) में भारत भविष्य में शामिल हो सकता है, बशर्ते भारत की चिंताओं का हल बाकी के 15 देश निकालें।

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यह चिंता डेरी, खेती, फर्मा और कपड़ा उद्योग से संबंधित है। हाल ही में बैंकाक में आयोजित बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय हितों की रक्षा की गारंटी की बात की और साफ संकेत दिए कि भारत अपने किसानों, व्यापारियों के हितो की बलि नही चढ़ा सकता है।
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भारत की चिंताओं को अगर भविष्य में दूर किया जाएगा तो भारत इसमें शामिल होगा। चूंकिं 16 देशों के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते में भारत एक महत्वपूर्ण पक्ष है, इसलिए इस व्यापार समझौते के भविष्य पर सवाल उठ रहा है। चुकिं इस समझौते में शामिल होने वाले देशों की नजर बड़े भारतीय बाजार पर है, इसलिए चीन जैसे देशों को भारत के फैसले से झटका भी लगा है। हालांकि एकाएक भारत ने इसमें आरसीईपी में शामिल न होने का क्यों फैसला लिया है, इसपर भी बहस हो रही है।

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regional comprehensive economic partnership 2019 why india will not participate
आखिरकार एकाएक भारत सरकार ने आरसीईपी समझौते से बाहर रहने का फैसला क्यों लिया? - फोटो : ANI

क्या हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उम्मीद से कम सफलता बना कारण ?
सवाल यह भी उठ रहे है कि आखिरकार एकाएक भारत सरकार ने आरसीईपी समझौते से बाहर रहने का फैसला क्यों लिया? बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में उम्मीद के मुताबिक चुनाव परिणाम नहीं आने के बाद केंद्र सरकार ने रीजनल कंप्रेहेन्सिव इकनॉमिक पार्टनरशीप में शामिल न होने का फैसला लिया। हालांकि अक्तूबर के मध्य तक केंद्र सरकार ने इस मुक्त व्यापार समझौते में शामिल होने का मन बना लिया था।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों, किसान संगठनों, व्यापारिक संगठनों के साथ संपन्न हुई बैठकों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और खुद मंत्री पीयूष गोयल ने साफ शब्दो मे कहा था कि भारत इस समझौते में शामिल होगा।

कई भाजपा नेता जो समझौते को लेकर किसान संगठनों, सहकारी संगठनों, व्यापारिक संगठनों से बातचीत कर रहे थे, वे भी इस समझौते के पक्ष में बात कर रहे थे। लेकिन एकाएक भारत सरकार ने कुछ ही समय में अपना मन बदला और इस समझौते में शामिल होने से मना कर दिया।

दरअसल, महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों जगहों पर ग्रामीण इलाकों में भाजपा को उम्मीद से काफी कम सफलता मिली। महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों राज्यों में भाजपा की सीटें 2014 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले कम हो गई। बताया जाता है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में भाजपा को उम्मीद से कम समर्थन मिला।

इसका मुख्य कारण किसान संकट, डेरी उद्योगों का संकट आदि था। वहीं हरियाणा में शहरी सीटें अगर भाजपा नहीं जीतती तो गठबंधन से भी सरकार बनाना मुश्किल था। हरियाणा में भी ग्रामीण प्रभाव वाले विधानसभा सीटों पर भाजपा की हार हो गई। वैसे में भाजपा और केंद्र सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी, क्योंकि जल्द ही झारखंड में चुनाव होने है। अगले साल बिहार में भी चुनाव होगा।

regional comprehensive economic partnership 2019 why india will not participate
दो बड़े सेक्टर डेरी और कपड़ा उद्योग रीजनल कंप्रहेन्सिव इकॉनॉमिक पार्टनरशीप का जोरदार विरोध रहे थे। - फोटो : सोशल मीडिया

क्या प्रधानमंत्री का गृह राज्य भी बना कारण
दो बड़े सेक्टर डेरी और कपड़ा उद्योग रीजनल कंप्रहेन्सिव इकॉनॉमिक पार्टनरशीप का जोरदार विरोध रहे थे। इन दोनों उद्योगों में गुजरात अग्रणी राज्य है। गुजरात में डेरी उद्योग काफी आगे है। इसमें खासे लोगों को रोजगार मिला है। वहीं गुजरात का कपड़ा उद्योग भी काफी आगे है। जबकि इन दोनों उद्योगों को आरसीईपी से ज्यादा नुकसान की संभावना जताई गई है। कपड़ा उद्योग को डर था कि मुक्त व्यापार समझौते में शामिल होने के बाद भारत में चीन के बने हुए कपड़ों की बाढ़ आ जाएगी।

2 से 2.5 डॉलर में एक रेडीमेड पॉलिस्टर शर्ट यूरोपीय देशों को भेजने वाला चीन भारतीय बाजार में इन शर्टों को डंप कर देगा। जबकि भारत में इसकी फैब्रिक की कीमत ही 2.5 डॉलर पड़ती है। वैसे में भारतीय कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान होगा।

एक अनुमान के अनुसार गुजरात में इस समय 6.5 लाख लूम काम कर रहे है। एक समय में इसकी संख्या 9 लाख थी। लेकिन जीएसटी के कारण बहुत सारे व्यापारियों ने लूम बेच दिए। गुजरात के कपड़ा उद्योग पहले ही मंदी की मार झेल रहा है। उन्होंने अपना उत्पादन कम कर दिया है। घरेलू और अंतराष्ट्रीय बाजारों में कम मांग के कारण उत्पादन में चालीस प्रतिशत तक की गिरावट है।

गुजरात का डेरी सेक्टर भी होता प्रभावित
गुजरात की डेरी सेक्टर पूरे देश में अग्रणी है। इसका उदाहरण अमूल है। पिछले कुछ चुनावों में यहां डेरी उद्योग महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बना है। बताया जा रहा है कि मुक्त व्यापार समझौते का नुकसान भारतीय दुग्ध उद्योग को खासा होगा, क्योंकि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख दुग्ध उत्पादक देश अपना माल भारत में डंप करेंगे। एक अनुमान के अनुसार देश में डेयरी सेक्टर का कारोबार लगभग 6 लाख करोड़ रुपए का है इसमें गुजरात अग्रणी है।

यह सलाना 10 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है। भारत में डेरी उद्योग में लगभग एक करोड़ लोग सीधे जुड़े हैं और उन्हें रोजगार मिला हुआ है। दिलचस्प बात है कि इसमें 71 प्रतिशत महिलाएं हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार आंकड़ों के माध्यम से तर्क दे रही थी कि देश में आने वाले समय में दूध की किल्लत होगी इसलिए इसका आयात जरूरी है। जबकि दूसरी तरफ अमूल और पंजाब के मिल्कफेड केंद्र सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक में आकंड़ों के साथ तर्क दे रहे थे कि देश में डेरी इंडस्ट्री का अच्छा विकास हो रहा है। देश में दूध की कमी आने का भविष्य में कोई सवाल ही नहीं है।

क्या हमने अच्छा मौका गवां दिया ?
हालांकि देश में प्रधानमंत्री मोदी के फैसले पर खुशी की लहर है। किसान संगठन भी खुश है। व्यापारिक संगठन भी खुश हैं। मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि डेरी और कृषि क्षेत्र को संरक्षण देने के मामले में भारतीय पक्ष पर जबतक मुक्त व्यापार पर समझौता करने वाले देश फैसला नहीं लेते भारत इसमें शामिल नहीं होगा।

हालांकि भारत ने अपने दरवाजे बंद नहीं किए है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि भारत ने फिलहाल इस समझौते से अलग रहने का फैसला कर भारी गलती की है, क्योंकि 16 देशों में सिर्फ भारत ने ही फिलहाल मुक्त व्यापार समझौते से दूरी बनाई है। उनका कहना है कि मुक्त व्यापार समझौते से दूरी भारत की मजबूती नहीं भारत की कमजोरी दर्शाती है।

अलग अंतराष्ट्रीय बाजार में भारतीय सामान प्रतियोगी नहीं है तो इसके लिए जिम्मेवार चीन, थाईलैंड, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और जापान नहीं है। इसके लिए जिम्मेवार भारतीय उद्यमी है जो दूसरे देशों में उत्पादित किए गए वस्तुओं से कीमतों के मामले में प्रतियोगिता नहीं कर पा रहे है। भारतीय उद्योगों में इस्तेमाल किए जाने वाली तकनीक पुरानी है।

यहां पर औद्योगिक माहौल को प्रतियोगी बनाने के लिए जो आधारभूत संरचना चाहिए वो नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय कपड़ा उद्योग सरकार का संरक्षण चाहता है, लेकिन यह अध्ययन करने को राजी नहीं है कि आखिर बांग्लादेश दुनिया का दूसरा बड़ा रेडीमेड गारमेंट निर्यातक देश कैसे बन गया? वो कैसे अब चीन के बने हुए माल को अंतराष्ट्रीय बाजार में पछाड़ने की स्थिति में है?

शामिल होते तो व्यापार संतुलन और होता खराब
आरसीईपी में भारत का शामिल न होने के फैसले के पीछे एक मुख्य कारण भारत का इन देशों से होने वाले व्यापार में पहले से ही भारी व्यापार घाटा होना भी है। कहा जा रहा है कि अगर भारत मुक्त व्यापार समझौते में शामिल हो जाता तो भारत का व्यापार घाटा और बढ़ता और व्यापार संतुलन और खराब होता। अगर आंकड़ों को देखें तो 2018-19 में भारत का आसियान देशों, चीन, ऑस्ट्रेलिया का होने वाले व्यापार में भारत का व्यापार घाटा काफी है।

आसियान देशों के साथ होने वाले व्यापार में 2018-19 भारत का व्यापार घाटा 21 अरब डॉलर का है। जबकि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 53.58 अरब डॉलर का है। जबकि भारत का दक्षिण कोरिया के साथ 12.05 अरब डॉलर, जापान के साथ 7.91 अरब डॉलर, ऑस्ट्रेलिया के साथ 9.61 अरब डॉलर और न्यूजीलैंड के साथ 0.25 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है।

वैसे में अगर भारत इस समझौते में शामिल होता तो भारत की स्थिति खराब होती। 2018-19 में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में शामिल होने वाले देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से ऊपर था।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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