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यादों में रतन टाटा: एक शहर से उठती स्मृतियों की कहानियां
सार
रतन टाटा के पूर्वजों ने देश में पहला स्टील मिल खोला था। इन्हीं लोगों ने बैंग्लोर में दि इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ साइंस खोला। ये दीगर है कि वे स्टीलमिल खोलने वाले के सीधे वारिस न थे, मगर उन्होंने टाटा की विरासत को संभाला और उसे विस्तारित किया। वे टाटा उद्योग के चेयरपर्सन थे मगर उनके रहन-सहन में कभी अमीरी-फिजूलखर्ची नजर नहीं आई।
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नहीं रहे रतन टाटा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देवबंद के बुल्लेशाह की गलियों से निकल कर एक छोटी लड़की टाटा की सड़कों की सैर करती है और चकित होती है, ‘बाप रे बाप, इतनी सड़कें! कैसे लोग रास्ता याद रखते होंगे? कैसे अपने घर वापस जाते होंगे?, इत्ता बड़ा शहर!’
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मगर उस लड़की ने टाटानगर को अपना घर बना लिया और फ़िर कभी रास्ता नहीं भूली। वह अपने बाबा-दादी, नाना-मौसी सबको छोड़ कर इस अजनबी शहर में आई थी और इसके प्यार में पड़ गई। असल में यह लड़की जिस साल टाटानगर आई उसी 1961 में रतन टाटा ने टाटा स्टील में काम प्रारंभ किया था और 1991 में टाटा सन्स के चेयरपर्सन बने थे। लड़की अब उम्रदराज स्त्री बन चुकी है, टाटानगर उसकी पहचान है। उसे रतन टाटा से प्यार है, वह उनका हृदय से सम्मान करती है। तो हुआ न दोनों का इतना लंबा साथ! और कल रात जब बैंग्लोर से उसकी जर्नलिस्ट बेटी ने बताया, रतन टाटा नहीं रहे। वह काफ़ी देर कुछ न बोल सकी।
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शहर का सरपरस्त, शहर को नई दिशा-दशा में लेजाने वाला चला गया, वह क्या बोले! वह कभी उनसे नहीं मिली थी, बस उसने उन्हें एक बार दूर से देखा था। उतना ही काफ़ी था श्रद्धा उत्पन्न करने केलिए। न मालूम कितनों के लिए रतन टाटा ‘लाइटहाउस’ रहे हैं।
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तुलसीदास कह गए हैं जो राजा अपना कर्तव्य निभाता है उसके मरने का शोक नहीं करना चाहिए। मगर दु:ख तो होता है। वे मेरे कोई नहीं थे, फ़िर भी अपने थे। उनके बारे में इतना सुना है, इतना पढ़ा है और आज न केवल टाटनगर शोक में डूबा हुआ है, पूरा देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। टाटानगर में पहली बार पारसियों को देखा, बाद में कई पारसी क्लासमेट रहे, और बाद में कुछ पारसियों को पढ़ाया भी।
रतन टाटा के पूर्वजों ने देश में पहला स्टील मिल खोला था। इन्हीं लोगों ने बैंग्लोर में दि इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ साइंस खोला। ये दीगर है कि वे स्टीलमिल खोलने वाले के सीधे वारिस न थे, मगर उन्होंने टाटा की विरासत को संभाला और उसे विस्तारित किया। वे टाटा उद्योग के चेयरपर्सन थे मगर उनके रहन-सहन में कभी अमीरी-फिजूलखर्ची नजर नहीं आई। हां, दूसरों के लिए अपनी सम्पत्ति से उन्होंने जो किया वह देश कभी भूल नहीं सकता है। वे न केवल महान उद्योगपति थे, वरन महान मानवतावादी भी थे।
बचपन से उन्हें सीख मिली थी धन का सम्मान करना है, उसका प्रदर्शन और बर्बादी नहीं। और बचपन भी कैसा! एकाकी! जब वे केवल 10 साल के थे, माँ सोनी छोड़ कर चली गई, और पिता नवाल टाटा ने दूसरी शादी कर ली। उनके बचपन में उनकी दादी उनका आश्रय थीं। शायद इन्हीं अनुभवों ने उन्हें शादी से विमुख रखा। अपने कुत्तों से बेहद लगाव रखने वाले वे सदा लाइमलाइट में रहे मगर हमेशा शर्मीले और अपनेआप में सिमटे हुए। उन्होंने स्वयं स्वीकारा है, ‘मैं बहुत सामाजिक नहीं हूँ लेकिन एंटी-सोशल नहीं हूं।’
2008 में जब भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण की पदवी दी तो इस अवसर पर पूरा टाटानगर सम्मानित अनुभव कर रहा था। इसके पहले जब 2000 में उन्हें पद्म भूषण मिला थ तब भी शहर ने जश्न मनाया था। काभी समय से वे कमजोर नजर आने लगे थे, मगर चेहरे पर वही निश्छलता और मुस्कान कायम थी।
कुछ दिन पहले भी उन्होंने कह अथा वे रुटीन चेकअप करवा रहे हैं, मात्र उम्र का तकाजा है। मगर 86 साल के रतन टाटा, इस देश के रतन ने अंतिम सांस ली तो पूरा देश, पूरा विश्व उद्योग शोक में डूब गया है।
टाटा अपने नैतिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध हैं, और रतन टाटा न केवल व्यापार बल्कि निजी जीवन में भी नैतिकता के उदाहरण हैं। उनकी अगली यात्रा शांतिपूर्ण हो! मैं अपनी ओर से इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि देती हूं!
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।