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असली राम कौन हैं? निर्गुण, सगुण या कोई और...

Sun, 21 Jan 2024 11:21 AM IST
Acharya Prashant आचार्य प्रशांत
Updated Sun, 21 Jan 2024 11:21 AM IST
सार

राम तो हर जगह हैं, हर व्यक्ति में है। तुम्हें ज्ञान नहीं है इसलिए दिखाई नहीं दे रहे, तो अगर आप किसी विशेष स्थल पर नहीं पहुंच पा रहे हो तो दुखी मत हो “आतम ज्ञान जाहि घट होई, आतम राम को चीन्है सोई।” तुम आत्मज्ञान की तरफ चले जाओ, राम तुम्हारे भीतर ही हैं और हर जगह हैं।

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श्रीराम मंदिर - फोटो : Social media

विस्तार

“निर्गुण सगुण दोऊ से न्यारा, कहें कबीर सो राम हमारा”

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निर्गुण हैं, न सगुण हैं, निर्गुण भी हम कहेंगे तो उन्हें अपने मन की कोई बात बना लेंगे अपनी छवियों में कैद कर लेंगे और सगुण कहेंगे तब तो हमने उनकी छवि खड़ी कर ही दी। न निर्गुण, न सगुण निर्गुण सगुण दोऊ से न्यारा, दोनों से अलग है। तो राम क्या है इसके लिए आपको हम ले चलते हैं उपनिषदों की ओर।

मुक्तिका उपनिषद आरम्भ होता है- हनुमान जी श्रीराम से कह रहे हैं कि जीवन भर आपकी सेवा में लगा रहा और आपकी देह देखी है। आपका शरीर देखा है, आपकी लीलाएं देखी हैं अब मुझे अपना वो स्वरूप बताइए जो उच्चतम है, सत्य है, असली है और मुक्तिदायक है।
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पहला अध्याय और सातवां श्लोक मुक्तिका उपनिषद का- और श्रीराम कहते हैं कि हे हनुमान अगर तुम मेरी सच्चाई जानना चाहते हो तो सुनो। "मैं वेदांत में वास करता हूं"। कहते हैं जो सचमुच मुझे जानने के इच्छुक होंगे वो वेदांत की ओर आएंगे नहीं, तो मेरे चार तल हैं। मेरे चार प्रकार हैं। इस बात पर आगे संतों ने और ज़्यादा उसको विस्तृत रूप से बताया। ज्यादातर लोग जो नीचे के तीन तल हैं उसी में आरम्भ करके रुक जाते हैं। 
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चार राम हैं जगत में, तीन राम व्यवहार। 
चौथे राम में सार है ताका करो विचार।। 


जो तीन राम हैं, व्यवहार माने जो हमारा आम कर्म है। जो व्रत होता है, आचरण है। उसमें हम नीचे के तीन रामों में ही सीमित रह जाते हैं। लेकिन संतों ने कहा है कि चौथे राम में सार है, उनका करो विचार। सार, असलियत, सच्चाई, मुक्ति तो चौथे राम में है। विचार उनका ही करना चाहिए। 

एक राम दशरत घर डोले, एक राम घट घट से बोले।
एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा।।।


ज्यादातर लोग यहीं से शुरुआत करते हैं- दशरथ के घर में जो राम हैं वो वहीं से शुरुआत करते हैं और शुरुआत करना अच्छी बात है पर वो वहीं पर रुक भी जाते हैं। आगे कहते हैं एक राम घट-घट से बोले, अब ये दूसरे तल के राम हो गए। एक राम में बोले मतलब प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से जो चेतना। वो दूसरे राम हैं। जो वैयक्तिक चेतना है, वो दूसरे राम हैं। और एक राम का सकल पसारा।

तीसरे राम हैं जो ये पूरा विस्तार है। जिसको हम कहते हैं "द आई टेंडेंसी" अहमवृत्ति वो तीसरे राम हैं। और कहते हैं लेकिन जो असली राम हैं वो इन तीनों से अलग है। न्यारे हैं और चौथा राम है सबसे न्यारा। यही जो चौथे राम हैं इन्हीं तक जाने के लिए श्री राम जी ने हनुमान जी को आदेश दिया कि अगर तुम सचमुच मुझे पाना चाहते हो तो जो चौथे राम हैं यही मुक्तिदाता हैं यही सत्य है। तुम इन तक जाओ। 

चौथे राम तक तो बात पहुंचनी बहुत जरूरी है। और जो सचमुच श्री राम के प्रेमी हों उन्हें वेदांत की ओर जाना ही पड़ेगा। वहां जाए बिना हम जो शिखर है वहां तक नहीं पहुंच सकते। 

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राम को जानिए - फोटो : iStock

जो लोग राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी नहीं हो पाए उन्हें दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि और ऊंचाई पर जाने की कोशिश करनी चाहिए, पहले राम हैं उस तल तक नहीं पहुंच पा रहे उनके लिए ज्ञानियों ने कहा है “घट राम बसत है भाई, ज्ञान बिन नहीं देत दिखाई”

राम तो हर जगह हैं, हर व्यक्ति में है। तुम्हें ज्ञान नहीं है इसलिए दिखाई नहीं दे रहे, तो अगर आप किसी विशेष स्थल पर नहीं पहुंच पा रहे हो तो दुखी मत हो “आतम ज्ञान जाहि घट होई, आतम राम को चीन्है सोई।” तुम आत्मज्ञान की तरफ चले जाओ, राम तुम्हारे भीतर ही हैं और हर जगह हैं। ज्ञान की कमी के कारण तुम्हें दिखाई नहीं दे रहे है। तुम्हें कमी फिर यात्रा की नहीं है स्वयं को न जानने की।

आत्मज्ञान, किसी साधारण ज्ञान की बात नहीं कर रही है, कहा जब आत्मज्ञान होता है तो आत्म राम भी दिखाई दे जाते है। और देखिये धर्म का पूरा क्षेत्र आत्मज्ञान के लिए ही है, स्वयं को जानने के लिए ही है। और ज्ञानियों ने भी संतों ने भी बार-बार यही कहा है “कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे तो बन माहि, ऐसे घट घट राम है दुनिया जानत नहीं”।

अरे, जिनको तुम खोज रहे हो तुम्हारे भीतर ही वास करते हैं और अगर स्वयं में नहीं पा रहे तो कहीं भी नहीं पाओगे जैसे जो कस्तूरी मृग है, उसकी जो पूरी बात चलती है। वो चीज है जिसके लिए जीवन भर भटकता है पर जहां है वहां नहीं कभी देखता और वहां नहीं देखेगा तो भटकता रह जाएगा पाएगा कुछ नहीं। तो वैसे ही घट घट राम हैं दुनिया जानत नाहिं। खोजना तो वही पड़ेगा बाकी कहीं खोजने से शुरुआत हो सकती है अंत नहीं हो सकता।

अपूर्ण मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा

जैसा मैंने अभी तक आपसे कहा मेरे लिए तो मंदिर का आशय होता है। हर वो स्थान जहां पर जाकर मन बिल्कुल शुद्ध हो जाए। और सबसे महत्वपूर्ण तो भीतर का मंदिर होता है। मन को मंदिर बनाना ही सबसे जरूरी बात है। मन मंदिर बन गया तो जीवन सार्थक है और मन मंदिर नहीं बना तो जीवन निरर्थक है। 

बहुतों को यह लगता है कि किसी जगह में कुछ खास है। और खास होने के नाते बहुत लोग वहां पर पहुंच जाते हैं। जो नहीं पहुंचते उनका भी तर्क वही है। बस विपरीत दिशा में काम कर रहा है। वो कह रहे हैं हम नहीं पहुंचेंगे। उनके पास अपने कुछ तर्क होंगे मैं बस ये कहना चाहता हूं की जितने भी तर्क जितने भी तरह के लोगों के पास है अगर वो आत्मज्ञान जनित नहीं है, तो कुतर्क हैं।

कोई तर्क काम नहीं करता अगर वो ज्ञान के आधार से खड़ा नहीं हो रहा है और अभी मीडिया में जो बहसे चल रही है इस तरफ से उस तरफ हर तरफ से उनमें आत्मज्ञान कहीं पर भी नहीं है।  कोई इधर जाए, कोई इधर को जाए, कोई उधर को, कोई विशेष अंतर है नहीं किसी में। सब एक ही तरह के चल रहे हैं। 


भक्ति: भाव या प्रेम? 

एक बात समझना जरूरी है कि भक्ति प्रेम से संबंधित होती है, भाव से नहीं। हम बहुत बार सोच लेते हैं और लोक संस्कृति में ऐसा बहुत बार कह भी दिया जाता है। बड़े माननीय जगहों से कई बार कह दिया जाता है कि भक्ति तो भाव है। भक्ति भाव नहीं है। भाव मार्ग नहीं होता, प्रेम मार्ग होता है, भक्ति प्रेम है। प्रेम में और भाव में बड़ा अंतर होता है।

भाव तो एक मूर्छा में भी आ सकता है, चेतना बेहोश पड़ी हो भाव तो तब भी उठ सकता है। अक्सर प्रेम को भी एक भावना समझ लेते हैं। प्रेम भावना नहीं होता, प्रेम भावना से बहुत आगे की बात होती है। तो जो भक्ति मार्ग है वो प्रेम का मार्ग है। बच्चे को हमें प्रेम तक ले जाना है मात्र भाव तक नहीं। बच्चे को आप भाव तक ले जाएंगे तो वो अपनी निचली वृत्तियों का जीवन भर गुलाम होकर रह जाएगा, इमोशनल हो जाएंगा। और ये जो इमोशनल रिएक्टिविटी होती है, भावनात्मक प्रिया प्रतिक्रियात्मकता, ये जिंदगी का बोझ जहर जैसी बन जाती है कि किसी ने कुछ करा और तुरंत भावुक हो गया।

जब आप भावुक हो जाते हो तो उसमें कुछ प्रतिक्रिया भी कर देते हो। और उसी से फिर दुनिया भर के सारे फसाद होते हैं। उससे हमें बचना है। हमें प्रेम सीखना है। प्रेम और भाव एक बात नहीं होते। प्रेम में चेतना की ऊंचाई होती है और भाव तो बिना चेतना के भी आ सकता है। 

हमारी कोशिश है सब में प्रेम जाग्रत हो इसलिए मैं आपसे बात कर रहा हूं और अगर हम कोशिश कर रहे हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि लोगों में प्रेम जाग्रत हो इसका मतलब यह है कि प्रेम तक पहुंचना तो अभी बाकी है न!


हमारी चेतना के तीन आराध्य

आप अगर आज के भारत को देखेंगे तो ये ये नाम हैं जो हमारी चेतना के आराध्य हैं-  राम, कृष्ण, शिव। तीनों का ही सीधा-सीधा संबंध वेदान से है। श्रीमत भगवत गीता तो वेदांत की प्रस्थान त्रयी का एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है ही उसे उपनिषदों का सार कहते हैं। मुक्तिका उपनिषद में श्रीराम क्या कहते हैं उसका भी मैंने उल्लेख किया इसी तरह वेदांत पूरा हो ही नहीं सकता जब तक उसमें शिवत्व न आए। कितने ही उपनिषद हैं जो महादेव को समर्पित हैं जिन्होंने अद्वैत वेदांत को भारत में पक्का खड़ा कर दिया आदि।

शंकराचार्य उनका अगर आप निर्माण शतकम सुनेंगे तो कहते हैं शिवो हम से वो। हम तो ये तीनों राम, कृष्ण, शिव तीनों ही बार-बार बार-बार हमसे आग्रह कर रहे हैं अपनी ऊंचाइयों पर बैठ कर। हम नीचे वालों को कह रहे हैं तुम वेदांत की ओर जाओ। और जब आप वेदांत की ओर जाते हो आपके भीतर कुछ ऐसा आ जाता है जिसे चोट लग नहीं सकती।

आत्मा को कहा जाता है खंड आत्मा चोट नहीं खाती। आत्मा को कहा जाता है अजेय अवयव जिसके हिस्से नहीं हो सकते अटूट जिसको कोई आ कर के कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता तो किया होगा किसी ने कुछ किया होगा तीत में। अगर हम सचमुच धार्मिक हैं तो हमारे भीतर एक फ़ौलाद पैदा हो जाता है जो घाव नहीं खाता बाहर-बाहर चोट लग सकती है भीतर से फिर हम आहत नहीं होंगे और अगर मैं कहूं कि मैं धार्मिक हूं और अपने भीतर चोट और जख्म लेकर के घूम रहा हूं तो इसका मतलब है की अभी मेरे अध्यात्म में गहराई आनी शेष है।

कोई बाहर से आए, भीतर से आए, कहीं से आए, किसी दूसरे देश से आए, किसी दूसरे द्वीप से आए या अपने घर के भीतर से आए या वो स्वयं आप भी हो सकते हैं जो अपने आप को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ये सब हो सकता है यह संयोग की बात होती है सहयोगों पर। किसी का कोई बस नहीं चलता है। अभी यहां पर भूकंप आ जाए आप भी गिरेंगी मैं भी गिरुंगा, हम क्या कर सकते है भूकंपों का पर हमारा गिरना हमारी देह का गिरना होना चाहिए हमें चोट लगे तो सर फट सकता है कोनी टूट सकती ये सब।

हो गया कोई बात नहीं भीतर। हमारे कुछ। ऐसा शिव होना चाहिए कि कुछ हो जाए उस पर खरोच न आए और अगर वो नहीं है हमारे भीतर तुम कहां के धार्मिक हो गए हम कब तक यही कहते रहेंगे कि चोट लग गई मार खा गए ऐसा हो गया वैसा हो गया इतिहास है इतिहास को पकड़ कर। 

वेदांत मार्ग कम लोगों को पता है इसीलिए है क्योंकि वो अहंकार को सीधी चुनौती देता है। और बहुत सारे दूसरे हमने ऐसे मार्ग विकसित कर लिए हैं देखिये जिनमे अहंकार किसी तरीके से कहीं कोना पा करके सुरक्षित रह जाता है। और कुछ तो ऐसे दूषित मार्ग भी हम आविष्कृत करते रहते हैं जिसमें अहंकार और फूल-फूल के मोटा हो जाता है। 

वेदांत जनमानस में प्रचलित इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि उसके सामने जो हमारी गंदगी। हमारी बीमारी है जो रोग है हमारा अहंकार उसको छुपने की जगह नहीं मिलती तो इसीलिए वेदांत जो है वो फिर आम लोग उसको इतना सीधे सीधे स्वीकार नहीं करते लेकिन अगर हम भक्ति मार्ग को स्वीकार करते हैं। अभी हम जिन जिन दोहों की चौपाइयों की बात कर रहे हैं वो सब के सब वेदांत से ही तो आ रहे हैं तो हम भले ही वेदांत को सीधे सीधे स्वीकार करें लेकिन वेदांत पानी की तरह है।

आप जो कुछ भी पिएंगे उसमे पानी मौजूद होता है आप कुछ भी कहीं में शर्बत पी रहा हूं पानी तो वहां भी है। और बिना वेदांत के जल के। कुछ भी। ऐसा बन नहीं सकता। जो आपकी प्यास बुझा दे तो वेदांत तो ले दे के हर जगह है ही। मौजूद। रामचरित मानस की। हम इतनी बात करते हैं पूजनीय ग्रंथ हैं राम ब्रह्म परमारथ रूपा लो राम ब्रह्म हो गया न आग वेदांत तो भले ही।

आप कहीं भी जाएं तो अब संतों को भी क्या कहा है श्री राम के लिए कह रहे हैं कि “राम ब्रह्म परमारथ रूपा अविगत अविगत अचल अनादि अनुपा” अविगत अनादि अनूपा और आगे की सकल विकार रहित गत भेदा अब अगली अगला सुनिए क्या कह रहे हैं “कहीं नेति नेति निरूपहीं वेदा” तो वेदों ने माने वेदांत ने जिनको नेति नेति करके निरूपित कराया वो राम ही तो हैं तो आपको राम की और भी अगर जाना है। तो नेति नेति  तो करनी पड़ेगी अब वो नेति नेति आप सीधे सीधे नहीं करे तो भक्ति मार्ग से कर लें जैसे भी करना हो करें। पर वेदांत से बचके धार्मिक नहीं हुआ जा सकता कोई कहे वो धार्मिक है और वेदांत से बच के चलना चाहता है तो असंभव है। 


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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