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राजस्थान : क्या कांग्रेस का खेल बिगाड़ेंगे केजरीवाल?

Mon, 19 Jun 2023 04:06 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 19 Jun 2023 04:06 PM IST
सार

श्रीगंगानगर में अरविंद केजरीवाल ने एक रैली कर साफ संकेत दिया कि राजस्थान में वह उसी तरह मैदान में उतरेंगे, जिस तरह उन्होंने गुजरात में चुनाव लड़ा था।  बता दें कि गुजरात में कांग्रेस को 27.3 प्रतिशत वोट ही मिल सके थे और उसकी सबसे बड़ी हार हुई।

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अशोक गहलोत- अरविंद केजरीवाल (फइल फोटो) - फोटो : PTI

विस्तार

क्या आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ डबल गेम खेल रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि चंद दिन पहले दिल्ली सरकार के अधिकारियों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लाए अध्यादेश के खिलाफ अरविंद केजरीवाल विपक्ष को एकजुट करने में जुटे हुए थे और वह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से भी मिले। उन्होंने विपक्षी एकता की बात जोर-जोर से उठाई।

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इधर, पिछले सप्ताह दिल्ली सरकार के मंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने तो यहां तक ऑफर कर दिया कि यदि कांग्रेस दिल्ली और पंजाब में मैदान आम आदमी पार्टी के लिए छोड़ दे तो उनकी पार्टी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेगी। यहां तक तो दोनों में आपसी मेल-जोल की बात चलती दिख रही थी, लेकिन जिस तरह राजस्थान के श्रीगंगानगर में अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार और खासकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमला बोला, उसे लगता है कि विपक्षी एकता कम से कम कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच नहीं बनने वाली है।

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राजस्थान और आम आदमी पार्टी का दांव

श्रीगंगानगर में अरविंद केजरीवाल ने एक रैली कर साफ संकेत दिया कि राजस्थान में वह उसी तरह मैदान में उतरेंगे, जिस तरह उन्होंने गुजरात में चुनाव लड़ा था। गुजरात में सत्ता में भारतीय जनता पार्टी थी और वहां आम आदमी पार्टी ने पूरी तरह फोकस कांग्रेस के वोटरों और भारतीय जनता पार्टी पर हमला करने में लगाया। शायद यही कारण था कि गुजरात में आम आदमी पार्टी न केवल 5 सीटें जीतने में सफल रही, बल्कि उसने कांग्रेस का एक बड़ा वोट शेयर अपनी तरफ खींच लिया। यदि आम आदमी पार्टी को 12.9 प्रतिशत वोट न मिलते तो कांग्रेस 17 सीटों पर न सिमटती। गुजरात में कांग्रेस को 27.3 प्रतिशत वोट ही मिल सके थे और उसकी आजादी के बाद सबसे बड़ी हार हुई। 

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अब बात करते हैं राजस्थान की। राजस्थान में शुरुआत से आम आदमी पार्टी का फोकस रहा है। हालांकि, अब तक वह कोई बड़ा करिश्मा राज्य में नहीं दिखा सकी है। वर्ष 2018 के पिछले विधानसभा चुनाव में उसका राज्य में खाता नहीं खुला था। अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, लेकिन जिस तरह से आम आदमी पार्टी पिछले कुछ महीनों से राजस्थान में जमीनी स्तर पर अपने संगठन को तैयार कर रही है, उससे लगता है कि वह सीटें भले न जीते, पर कुछ प्रतिशत वोट जरूर लेकर जाने वाली है। 
 

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अरविंद केजरीवाल राजस्थान में कांग्रेस को लेकर नरमी बरतने नहीं जा रहे हैं। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

देश में अब तक आम आदमी पार्टी के इलेक्शन कैंपेन को देखा जाए तो वह कांग्रेस के कंधे पर ही चढ़कर आगे बढ़ती दिखती है। भले वह दिल्ली हो या पंजाब में सत्ता हासिल करना। दिल्ली में तो आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का लगभग सूपड़ा साफ कर सरकार बनाई। अरविंद केजरीवाल भली-भांति जानते हैं कि कांग्रेस की कमजोरी ही उनकी ताकत है। पंजाब में भी इसी तरह उन्होंने कांग्रेस से सत्ता छीनी। हालांकि, वहां कुछ हद तक वोटों के बिखराव का भी केजरीवाल को फायदा मिला।

पंजाब में चार दल अलग-अलग मैदान में उतरे थे। यदि राजस्थान में देखा जाए तो यहां भी कुछ-कुछ स्थिति पंजाब जैसी बन सकती है। मौजूदा समीकरण कुछ ऐसे हैं कि सत्ता में कांग्रेस है और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी है।
 

नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी अपना दमखम दिखाने के लिए तैयार है। जाट बाहुल्य सीटों पर बेनीवाल अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। बहुजन समाज पार्टी भी कुछ क्षेत्रों में थोड़ी-बहुत सीटें ले आती है। वर्ष 2018 में उसने 6 सीटें जीती थीं। भारतीय ट्राइबल पार्टी आदिवासी इलाकों में अच्छा प्रदर्शन करती आ रही है। भले उसे सीटें कम मिली हों, लेकिन आदिवासियों में उसकी अच्छी पैठ है। भीम आर्मी ने दलित वोटरों में एक पैठ बना ली है। भीम आर्मी के कर्ता-धर्ता चंद्रशेखर रावण राजस्थान में सक्रिय हैं।

 


गुजरात की तर्ज पर चुनाव में उतरेंगे केजरीवाल?

आम आदमी पार्टी ने गुजरात में भारतीय ट्राइबल पार्टी से गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। वह राजस्थान में भी ऐसा ही चाहती है। दूसरा अरविंद केजरीवाल लगातार कांग्रेस के बागी दिख रहे नेता सचिन पायलट की तरफ नजरें गड़ाते आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी की कोशिश है कि किसी तरह सचिन पायलट जैसा कोई नेता उससे जुड़ जाए, ताकि वह पूरी तरह मैदान में ताल ठोक सके। हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं है। यदि सचिन को पाला ही बदलना होता तो उनके लिए भारतीय जनता पार्टी ज्यादा मुफीद रहती।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी तीसरा मोर्चा बनाकर यहां चुनाव लड़ेगी? जिसकी बात बार-बार हनुमान बेनीवाल कर रहे हैं, क्योंकि बेनीवाल भली-भांति जानते हैं कि वह अकेले अपने दम पर बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। इसलिए वह भी सचिन पायलट की ओर देखते रहते हैं।

इधर, यदि आम आदमी पार्टी और हनुमान बेनीवाल मिलते हैं तो एक नया गठबंधन पेश करके कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों के लिए चुनौती खड़खड़ी कर सकते हैं। यदि इनके साथ भारतीय ट्राइबल पार्टी भी मिल जाती है और बसपा को यह गठबंधन में शामिल कर लेते हैं तो राजस्थान का मुकाबला बेहद रोचक हो जाएगा।

फिलहाल तो लगता है कि अरविंद केजरीवाल राजस्थान में कांग्रेस को लेकर नरमी बरतने नहीं जा रहे हैं। जहां कांग्रेस 200 यूनिट बिजली फ्री देने की बात कर रही है, वहीं अरविंद केजरीवाल ने 300 यूनिट फ्री बिजली का पासा फेंक डाला है। श्रीगंगानगर को रैली के लिए उन्होंने बड़े सुनियोजित ढंग से चुना, क्योंकि श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ का इलाका पंजाब के बॉर्डर से लगता है। यह पंजाबी बाहुल्य क्षेत्र है। शायद यही कारण था कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने यहां पंजाब और श्रीगंगानगर के मिलते-जुलते मुद्दे उठाए। उन्होंने अपना 95% भाषण भी पंजाबी में दिया। 


अरविंद केजरीवाल की रैली को लेकर कांग्रेस पार्टी ने प्रतिक्रिया देने में देर नहीं लगाई। कांग्रेस ने न केवल अरविंद केजरीवाल के अपने बंगले पर 50 करोड़ खर्च करने का मुद्दा उठाया, बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया के जेल में होने की बात भी याद दिला दी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अच्छी तरह जानते हैं कि अरविंद केजरीवाल उनके वोट बैंक में ही सेंध लगाकर आगे बढ़ेंगे। जिस फ्री बिजली के मुद्दे पर वो राज्य में महंगाई राहत कैंप चला रहे हैं, उसके जनक बहुत हद तक अरविंद केजरीवाल ही हैं। गहलोत भले सरकार रिपीट करने का दावा पेश कर रहे हैं, लेकिन यह बहुत आसान नहीं दिखता है। 

गहलोत के लिए अब तक अच्छी बात यह है कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अब भी गुटों में बंटी नजर आ रही है। भाजपा में एक अनार-सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से लेकर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, सतीश पूनियां, अश्विनी वैष्णव समेत एक दर्जन नेता मुख्यमंत्री की रेस में हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी पर्दे के पीछे से कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि, भाजपा नेता बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं। कुल मिलाकर राजस्थान में विधानसभा चुनावों में चंद महीने बचे हैं और यहां का राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो रहा है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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