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दूसरा पहलू: राजा हरिपाल की लोककथा, बौद्ध यात्रियों के वर्णनों से उलझन, हड़प्पा का महत्व समझने से चूके कनिंघम?

Tue, 03 Nov 2026 09:58 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 03 Nov 2026 09:58 AM IST
सार

राजा हरिपाल की लोककथा और बौद्ध यात्रियों के वर्णनों में उलझे कनिंघम इतिहास की सबसे बड़ी पुरातात्विक खोज को पहचानने से चूक गए। स्थल की खोदाई में मिले बिना कूबड़ वाले बैल की आकृति के आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह मेसोपोटामिया सभ्यता का स्थल रहा होगा।

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Raja Haripal Folklore accounts of Buddhist travelers confusion Cunningham fail to grasp Harappa significance
हड़प्पा का महत्व समझने से चूके कनिंघम (फाइल) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स

विस्तार

यह एक ऐसी पहेली है, जिसे अब तक कोई सुलझा नहीं पाया। हजारों साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को पढ़ना पुरातत्वविदों के लिए हमेशा से चुनौती रही है। सवाल उठता है, क्या कोई ऐसी कड़ी थी, जो समय के किसी हिस्से में टूट गई। क्या ऐसा हो सकता था कि अगर भारतीय पुरातत्व के पुरोधा कहे जाने वाले सर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं सदी के छठे दशक में चूक न की होती, तो आज हम यह जानते होते कि सिंधु घाटी सभ्यता को बसाने वाले कौन थे और उसका विनाश कैसे हुआ।

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कनिंघम जब पहली बार हड़प्पा (अब पाकिस्तान) गए, तो उन्होंने वहां जो देखा, उसे विस्तार से लिखा। अगर वह थोड़ी और मेहनत करते तो शायद अगले साठ साल में वह संरक्षित रह जाता, जो नष्ट हो गया। कनिंघम ने 1853, 1856 और 1872-73 में हड़प्पा के उस टीले का अध्ययन किया, जहां पुरावशेष मिल रहे थे। उन्हें खोदाई में काले पत्थर से निर्मित बिना कूबड़ वाले बैल जैसी आठ आकृतियां मिलीं। उनके हिसाब से यह 400 ईसा पूर्व की थीं। कनिंघम के अनुसार, यहां से मिली ईंटों और ज्यादातर पुरावशेषों का लाहौर-मुल्तान रेलवे लाइन बनाने में इस्तेमाल कर लिया गया। उन्हें स्थानीय लोगों ने बताया था कि यहां राजा हरिपाल का शासन था। वह प्रजा का सब कुछ हड़प लेना चाहता था।
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लोककथा के अनुसार, हड़पने से ही हड़प्पा शब्द बना। दूसरी ओर, कनिंघम को लगा कि ह्वेनसांग व फाह्यान जैसे चीनी यात्रियों ने अपने संस्मरणों में हड़प्पा का जिक्र किया होगा, पर जब ऐसा सूत्र नहीं मिला, तो उन्होंने मान लिया कि यह कोई बौद्ध स्थल रहा होगा, जो नष्ट हो गया। वह यह समझने में चूक गए कि जहां वह खड़े हैं, वह लगभग साढ़े चार हजार साल पुरानी ताम्रकाल की सभ्यता है। उस समय के विदेशी इतिहासकार भी यही मानते थे कि भारत का इतिहास छठी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होता है। इसीलिए, बिना कूबड़ वाले बैल की आकृति के आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह मेसोपोटामिया या मिस्र की सभ्यता का स्थल रहा होगा।
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फिर, 1921 में पुरातत्ववेत्ता दयाराम साहनी ने अविभाजित पंजाब के साहीवाल जिले में इस स्थल की खोदाई की, तो दुनिया के सामने सिंधु घाटी सभ्यता आई। उस समय के एएसआई महानिदेशक सर जान मार्शल ने 20 सितंबर, 1924 को द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज में आधिकारिक रूप से इस खोज की घोषणा की। पर, यह पता नहीं चल सका कि वे कौन लोग थे, जिन्होंने इसे बनाया। ...क्या कनिंघम इस गुत्थी को सुलझा सकते थे?

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