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गैर-पारंपरिक खतरों से निपटना: विकसित भारत के सपनों को सुरक्षित करना
सार
कोविड-19 महामारी ने यह दिखाया कि एक छोटा-सा वायरस भी पूरी दुनिया की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। केवल दो वर्षों में इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को धीमा कर दिया, विकास की कई वर्षों की उपलब्धियों को पीछे धकेल दिया और स्वास्थ्य सेवाओं, शहरी व्यवस्था तथा प्रवासी श्रमिकों के कल्याण से जुड़ी कमजोरियों को उजागर किया।
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भारत का डिजिटल विकास उसकी बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
- फोटो : AI Generated
विस्तार
भारत का 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के समग्र विकास की एक बड़ी परिकल्पना है। इसका उद्देश्य एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो तकनीक के क्षेत्र में आगे हो, जहाँ समाज में एकता हो, पर्यावरण सुरक्षित रहे और विश्व स्तर पर भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो।
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भारत विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है, लेकिन इस यात्रा के सामने गैर-पारंपरिक सुरक्षा के कई खतरे भी मौजूद हैं। इन खतरों पर अभी उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जितनी आवश्यकता है। ये चुनौतियाँ भारत की विकास यात्रा को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।
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पारंपरिक सुरक्षा खतरों की तरह ये चुनौतियां टैंकों, मिसाइलों या ड्रोनों के रूप में सीमाओं पर दिखाई नहीं देतीं। बल्कि ये साइबर हमलों, समाज में नफरत और गलत सूचनाएं फैलाने, महामारियों, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं, पानी की कमी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाली बाधाओं के रूप में सामने आती हैं।
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इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि संस्थाओं, अर्थव्यवस्था और समाज की संकटों से उबरने की क्षमता पर भी निर्भर करती है।
महामारी; चेतावनी का संकेत
कोविड-19 महामारी ने यह दिखाया कि एक छोटा-सा वायरस भी पूरी दुनिया की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। केवल दो वर्षों में इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को धीमा कर दिया, विकास की कई वर्षों की उपलब्धियों को पीछे धकेल दिया और स्वास्थ्य सेवाओं, शहरी व्यवस्था तथा प्रवासी श्रमिकों के कल्याण से जुड़ी कमजोरियों को उजागर किया।
भारत ने इस संकट के दौरान अपनी संस्थागत क्षमता और कठिन परिस्थितियों से निपटने की शक्ति का परिचय दिया। टीका उत्पादन, कोविन मंच और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से देश ने अपनी क्षमता दिखाई। हालांकि, इस दौरान सामने आई कमियाँ यह बताती हैं कि भविष्य में ऐसी चुनौतियाँ भारत की आर्थिक प्रगति के लिए बड़ा जोखिम बन सकती हैं।
साइबर क्षेत्र: नया युद्धक्षेत्र
भारत का डिजिटल विकास उसकी बड़ी उपलब्धियों में से एक है। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, डिजीयात्रा और आभा जैसे डिजिटल मंचों ने देश को नई पहचान दी है। लेकिन डिजिटल सुविधाओं के बढ़ने के साथ साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ा है। सरकारी सहायता प्राप्त समूह, साइबर अपराधी और हैक्टिविस्ट समूह इन तकनीकों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।
दिल्ली एम्स के सर्वरों और मुंबई के बिजली ग्रिड पर हुए साइबर हमले बताते हैं कि ऐसे हमले देश की डिजिटल व्यवस्था और महत्त्वपूर्ण सेवाओं को कितना नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसके अलावा, बुजुर्गों को डराकर पैसे ठगने वाले ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के मामले और पेशेवर लोगों को निशाना बनाने वाले ‘बॉस स्कैम’ भी बढ़ रहे हैं।
इसलिए साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीक से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए स्वदेशी साइबर क्षमताओं, क्वांटम-प्रतिरोधी कूटलेखन और सार्वजनिक-निजी सहयोग में निवेश आवश्यक है।
जलवायु संकट
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। भारत उन देशों में शामिल है, जो जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। मानसून का अनियमित होना, हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना, पूर्वी और पश्चिमी तटों पर बार-बार चक्रवात आना, उत्तर भारत में लू और मध्य भारत में सूखा पड़ना अब वास्तविक समस्याएँ बन चुकी हैं।
नेचर सस्टेनेबिलिटी के अनुसार, भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहर हर साल 4 मिमी से अधिक धँस रहे हैं। इससे मेट्रो, सड़कों और ऊंची इमारतों जैसे महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को खतरा बढ़ रहा है। जलवायु से जुड़ी आपदाएँ सामाजिक असमानता, पलायन और अस्थिरता को बढ़ाती हैं। इसलिए टिकाऊ बुनियादी ढाँचे, जलवायु के अनुकूल कृषि और जल सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक है।
सूचना युद्ध और सामाजिक एकता की चुनौती
गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों में गलत सूचनाओं का प्रसार एक गंभीर चुनौती है। सोशल मीडिया ने लोगों को अपनी बात रखने का अवसर दिया है, लेकिन इसका उपयोग नफरत फैलाने, झूठी खबरें प्रसारित करने और लोगों की सोच को प्रभावित करने के लिए भी किया जा रहा है। भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इसी विविधता का सहारा लेकर समाज में विभाजन पैदा करने वाली बातें भी फैलाई जा सकती हैं।
देश के विकास के लिए सामाजिक स्थिरता, संस्थाओं पर लोगों का विश्वास और आपसी एकता आवश्यक हैं। गलत सूचनाएँ इन सभी को कमजोर करती हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए डिजिटल साक्षरता बढ़ाना, डिजिटल मंचों को जिम्मेदार बनाना, तथ्य-जांच की व्यवस्था मजबूत करना और लोगों को सही-गलत सूचना में अंतर करना सिखाना जरूरी है। नागरिकों में ऐसी समझ विकसित होनी चाहिए, जिससे वे भ्रामक सूचनाओं को पहचान सकें और उनका सही मूल्यांकन कर सकें।
प्रौद्योगिकी और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता
कोविड-19 महामारी के बाद आपूर्ति शृंखलाओं में आई बाधाओं, रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन द्वारा महत्त्वपूर्ण खनिजों और स्थायी चुंबकों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने की आशंका ने आर्थिक सुरक्षा की चुनौतियों को बढ़ा दिया है। भारत का विकास ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और आधुनिक तकनीक की निरंतर उपलब्धता पर निर्भर करता है।
इनके लिए दूसरे देशों पर अधिक निर्भर रहना भारत की रणनीतिक कमजोरी बन सकता है। हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने से नए अवसर मिल रहे हैं, लेकिन इसके साथ कुछ नई निर्भरताएँ भी पैदा हो रही हैं। इसलिए देश की सुरक्षा के लिए प्रौद्योगिकी और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता बढ़ाना, आपूर्ति के अलग-अलग स्रोत विकसित करना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना उतना ही जरूरी है जितना रक्षा तैयारियों को मजबूत करना।
शासन की आवश्यकता
गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों से निपटना किसी एक मंत्रालय या विभाग के लिए संभव नहीं है। स्वास्थ्य, ऊर्जा, वित्त, शहरी व्यवस्था और डिजिटल सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। भारत ने डिजिटल शासन, आपदा प्रबंधन और महामारी से निपटने में अपनी क्षमता दिखाई है। अब जरूरी है कि हर विकास योजना में भविष्य के संकटों से निपटने की तैयारी पहले से शामिल की जाए।
इतिहास बताता है कि राष्ट्र केवल बाहरी हमलों से ही कमजोर नहीं होते, बल्कि आंतरिक कमजोरियों की अनदेखी भी उनके लिए खतरा बन सकती है। विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए आर्थिक विकास, जनसंख्या की शक्ति और तकनीकी प्रगति के साथ-साथ इनकी सुरक्षा भी जरूरी है क्योंकि चुनौती केवल विकास की गति बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने की भी है।
VUCA (अस्थिरता, अनिश्चितता, जटिलता और अस्पष्टता) से भरी दुनिया में वही देश आगे बढ़ेंगे, जो संकटों का सामना करने और उनसे उबरने में सक्षम होंगे। इसलिए भारत के लिए यह क्षमता केवल आपातकालीन तैयारी नहीं, बल्कि विकसित भारत की मजबूत नींव होनी चाहिए।
श्रद्धा शर्मा
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।