शो मैन के 100 वर्ष: राज कपूर का सिनेमा भव्यता की दुनिया रचता था..!
राज कपूर और भव्यता पर्याय है। उनके यहाँ भव्यता या विशालता यह दो तरह की नजर आती है। एक जो उनके सिनेमा में नजर आती है, दूसरी उनके दिल में, उनके व्यवहार में दीखती है। उन्हें भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग का सबसे बड़ा शोमैन कहा जाता है।
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राज कपूर और भव्यता पर्याय है। उनके यहां भव्यता या विशालता यह दो तरह की नजर आती है। एक जो उनके सिनेमा में नजर आती है, दूसरी उनके दिल में, उनके व्यवहार में दीखती हैं। उन्हें भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग का सबसे बड़ा शोमैन कहा जाता है। उन्होंने 10 फ़िल्में निर्देशित कीं। ‘आग’, ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘बॉबी’, ‘सत्यमं, शिवं, सुंदरं’, ‘प्रेम रोग’ तथा ‘राम तेरे गंगा मैली’ उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्में हैं।
70 फ़िल्मों में राज कपूर ने अभिनय किया। इन 70 में से अधिकाँश सफ़ल रहीं। इनमें से छ: – ‘आग’, ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘संगम’, शुरुआती तथा ‘मेरा नाम जोकर’ फ़िल्मों में वे स्वयं नायक हैं। उनकी दूसरी फ़िल्म ‘बरसात’ आई और इसके साथ ही वे स्टार बन गए। आज भी वे इस पद से नावजे जाते हैं।
सृष्टिनाथ के रूप में जन्में ने फ़िल्म ‘इंकलाब’ में रनबीर राज कपूर नाम से पदार्पण किया। लेकिन परिवार की स्त्रियां रविंद्रनाथ टैगोर के उपन्यास के एक प्रमुख पात्र नाम गोरा से उन्हें पुकारतीं। बाद में वे परदे पर राज कपूर के नाम पर आने लगे। और वे दर्शकों के चहेते राज बन गए। ‘आवारा’ में वे सिस्टम के बाहर रह कर आदर्श का जीवन जीने वाले, हाशिए के आदमी को आकर्षित कर लेते हैं। उनकी यह छवि कई फ़िल्मों में बनी रहती है।
आम आदमी के जीवन में शिक्षा के महत्व को वे दिखाते हैं। यह वह समय था, जब बंटवारे के बाद विस्थापितों का हुजूम बंबई के रहवास का हिस्सा बना। न मालूम कितनी बेकसूर औरतें अपने परिवार द्वारा ठुकरा दी गईं थीं। न जाने कितने बच्चे सड़क पर पैदा हुए थे। उनकी फ़िल्मों ने उस भारतीय सिनेमा की नींव डाली जो भारत के महाकाव्याधारित सिनेमा से भिन्न है।
पिता पृथ्वीराज के आभा मंडल से बाहर निकल राज कपूर ने अपने आपको स्वतंत्र अभिनेता, निर्देशक, प्रोड्यूसर के रूप में स्थापित किया। ‘आग’ में वे कहते हैं, ‘मैं अपनी जिंदगी खुद बनाना चाहता हूं।’ और उन्होंने अपनी जिंदगी बनाई, संग में कई अन्य लोगों की भी। वे महत्वाकांक्षी थे। अपनी फ़िल्म बनाने का निश्चय किया। अपना स्टूडियो खड़ा किया। अपनी टीम बनाई। साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्म बनाने के चलन से हटकर अपनी फ़िल्में बनाई।
राज कपूर की फ़िल्मों के भव्य सेट्स उनकी भव्य कल्पना के मूर्तिमान रूप हैं। वे अपनी फ़िल्मों के गानों, डांस, भावुक अभिव्यक्ति, यौनिकता केलिए याद किए जाते हैं। उस काल की सर्वाधिक मंहगी अभिनेत्री नर्गिस के साथ उनकी 19 फ़िल्में हैं, जिसमें ‘आग’, ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’ खुद उनके द्वारा निर्देशित थीं। दोनों की रोमांटिक छवि दर्शकों को सदैव याद रहेगी। इसी जोड़ी की एक मुद्रा आर. के. फ़िल्म्स का ‘लोगो’ बना।
अपनी पहली फ़िल्म ‘आग’ में वे तीन बड़ी अभिनेत्रियों – कामिनी कौशल, नर्गिस और निगार सुल्ताना को अपने साथ लेते हैं, जबकि वे खुद अभी नए थे। इसमें वे आंतरिक और बाह्य सौंदर्य को विश्लेषित करते हैं जो आगे चल कर उनकी फ़िल्म ‘सत्यं शिवं सुंदरं’ में फ़िर नजर आता है। ‘बरसात’ के ओपनिंग सीन में प्राकृतिक भव्यता को कैमरा पकड़ता है, फ़िल्म कश्मीर की भव्य सुंदरता को पकड़ता है। इस हिट फ़िल्म के गाने, ‘हवा में उड़ता जाए’, ‘पतली कमर है...’, ‘मुझे किसी से प्यार हो गया’, ‘जिया बेकरार है’, ‘बरसात में तुमसे मिले’ आज भी हिट लिस्ट में हैं। और यहीं से राज कपूर की टीम बननी शुरु हुई।
संपादक जी. जी. मायकर, मुकेश, लता, शंकर-जयकिशन, अल्लाउद्दीन, अरुण भट्ट से शुरु हुई टीम में बाद में राधू करमाकर, मुकेश, रफ़ी जुड़े। टीम भी उन पर जान छिड़कती थी। आदमी को पहचाना, उसकी इज्जत करना वे जानते थे। यह उनका बड़प्पन था कि शैलेंद्र को ‘कविराज’, ‘पुश्किन’ कहते थे, उनके घर जाकर उनकी बराबरी में कुर्सी पर नहीं बैठते थे।
इंटरनेशनल प्रसिद्धि की ‘श्री 420’ के गानों राष्ट्रीय गीत जैसा दर्जा पाने वाला ‘मेरा जूता है जापान’, ‘दिल का हाल सुने दिल वाला’, ‘रमैया वस्तावैया’, ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’, ‘मुड़ मुड़ के न देख’, ईचक दाना’ ने
धूम मचाई। याद कीजिए इसके क्लब के सेट को। और याद कीजिए ‘आवारा’ का भव्य स्वप्न दृश्यबंध जिसे फ़िल्माने में कितनी मेहनत लगी थी, इसी फ़िल्म का जज का भव्य बंगला। ‘संगम’ (‘बोल राधा बोल’, ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर’, ‘हर दिल जो प्यार करेगा’, ‘मैं का करूँ राम’, ‘दोस्त दोस्त न रहा’, ‘ओ महबूबा’), ‘बॉबी’ (‘मैं शायर तो नहीं’, ‘झूठ बोले’, ‘हम तुम इक कमरे में’, ‘अखियों को रहने दो’) सबके गाने हिट रहे और भव्यता के क्या कहने। भव्यता को लेकर उनकी ऐसी दीवानगी थी कि मंहगे-से-मंहगे उपकरण खरीदने में गुरेज न करते। और इसी भव्यता के चक्कर में उन्होंने ‘मेरा नाम जोकर’ बनाई जो उस समय बुरी तरह फ़ेल हुई। कोई शिखर पर कितने दिन टिकेगा?
असल में यहां तक उनकी फ़िल्में नायक प्रधान होती थीं, इसके बाद वे नायिका प्रधान (‘बॉबी’, ‘सत्यमं, शिवं, सुंदरं’, ‘राम तेरे गंगा मैली’) बनाने लगे। असल में नर्गिस के बाद उनकी फ़िल्मों का चार्म जाता रहा, भव्यता भले कायम रही। दर्शक नर्गिस का चेहरा, उसकी सुंदरता देखता है, कभी उसका शरीर नहीं। असल में वे भी मनुष्य थे, उनमें भी मानवीय कमजोरियां थीं। रोमांटिक थे, स्वप्नदर्शी थे साथ ही बहुत पोजेसिव थे। जो उनके साथ होते उनसे अपेक्षा करते, ‘मेरे अलावा किसी और को न देखना।’
इसी कारण साथ वालों का किसी दूसरे के साथ काम करना उन्हें रास नहीं आता था। नर्गिस, राधु करमाकर आदि को किसी और के साथ काम करते नहीं देख सकते थे। राधू को रोकने केलिए राज कपूर ने उन्हें ‘इस देश में गंगा बहती है’ का निर्देशन सौंपा। बाद की फ़िल्मों में नायिका (डिम्पल, अभिनेत्री जीनत अमान, मंदाकिनी) की सुंदरता दर्शकों की आँख सेंकने की सामग्री सिद्ध हुई, हाँ, राज कपूर इन फ़िल्मों द्वारा भी बड़ा संदेश दे रहे थे।
राज कपूर में उदारता थी, टीम के सदस्यों से वे परिवार की तरह बरताव करते थे, उनके न रहने पर उनके परिवार की खोजखबर रखते। ऐसा न होता तो शैलेंद्र के गुजरने के बाद (वे राज कपूर के जन्मदिन वाले दिन गुजरे थे) बराबर उनके परिवार से मिलने न जाते। आर. के. की होली का हुड़दंग प्रसिद्ध था। खुश होते तो कार उपहार में दे देते। फ़िल्म की सफ़लता का टीम के साथ समारोह धूमधाम से मनाते। सबको दिल खोल कर उपहार देते। ऐसे भव्यता के प्रेमी की भव्य शताब्दी देश मना रहा है।