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नेता प्रतिपक्ष बने राहुल गांधी के लिए अगले 60 महीने बड़ा अवसर, पर बेहद चुनौतियों भरी है राह

Thu, 27 Jun 2024 12:55 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Thu, 27 Jun 2024 12:55 PM IST
सार

वर्ष 2013 में राहुल गांधी को जयपुर में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में उपाध्यक्ष चुना गया था। तब उन्होंने मार्मिक भाषण दिया था और सत्ता को जहर तक बताया था। कांग्रेस ने उन्हें भविष्य के नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया। हालांकि, कांग्रेस वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव में अपना सबसे न्यूनतम प्रदर्शन कर 44 सीटों पर सिमट गई थी।

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Rahul Gandhi who became the leader of opposition has a big opportunity and also many challenges
राहुल गांधी ने 18वीं लोकसभा में बतौर सांसद शपथ ग्रहण के दौरान संविधान की प्रति भी दिखाई - फोटो : एएनआई

विस्तार

संसद में लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक नए अंदाज में दिखे। उन्होंने एक बार फिर सफेद कुर्ता-पजामा पहन लिया। दाढ़ी सलीके से सेट कराई। एक रात पहले उन्हें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष चुना गया था। अपने 20 साल लंबे राजनीतिक करियर में पहली बार राहुल गांधी कोई संवैधानिक पद संभालेंगे। चूंकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने तीसरे कार्यकाल में पूर्ण बहुमत नहीं मिला है और वो गठबंधन की सरकार चला रहे हैं तो राहुल गांधी के पास खुद को स्थापित और साबित करने का बड़ा अवसर है।

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कई बार री-लॉन्च किए जा चुके राहुल गांधी क्या नई जिम्मेदारी को बखूबी निभा पाएंगे? जिन उम्मीदों के साथ जनता ने उनकी पार्टी को 99 सीटें दी हैं, उन पर खरा उतार पाएंगे? इन सवालों के जवाब अगले कुछ महीनों में मिल जाएंगे।
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वर्ष 2013 में राहुल गांधी को जयपुर में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में उपाध्यक्ष चुना गया था। तब उन्होंने मार्मिक भाषण दिया था और सत्ता को जहर तक बताया था। कांग्रेस ने उन्हें भविष्य के नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया। हालांकि, कांग्रेस वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव में अपना सबसे न्यूनतम प्रदर्शन कर 44 सीटों पर सिमट गई थी। तब कांग्रेस ने यह कहकर बचाव किया था कि मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।
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उन्होंने देशभर में कांग्रेस के प्रचार का नेतृत्व किया, लेकिन पार्टी एक बार फिर बुरी तरह हारी। उसे 52 सीटें मिलीं। कुल मिलाकर राहुल गांधी के नेतृत्व को जनता ने नकार दिया और राहुल गांधी ने भी अध्यक्ष पद को छोड़ दिया। वर्ष 2019 के बाद राहुल गांधी कुछ समय के लिए अज्ञातवास में चले गए। पार्टी उनसे नेतृत्व का गुहार लगाती रही, पर काफी मान-मनौव्वल के बावजूद वो नहीं माने। 

केंद्र में लगातार 10 साल पूरे कर रही नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एक बार फिर सत्ता विरोधी लहर का लाभ लेने के लिए कांग्रेस ने राहुल गांधी की ओर देखा। करीब-करीब सभी विपक्षी पार्टियों को जोड़कर एक बड़ा गठबंधन बनाया। यह बात और है कि इस बार विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व किसी एक चेहरे पर नहीं था, क्योंकि कोई भी राहुल गांधी के आगे रखकर चुनाव नहीं लड़ना चाहता था।



फिर कुछ क्षेत्रीय दलों की अपनी प्रतिबद्धताएं हैं। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और अरविंद केजरीवाल पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े। हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने पूरे चुनाव में यह साफ कर दिया था कि उनके नेता राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी ने भी देशभर में जमकर प्रचार किया। 

कांग्रेस पार्टी पिछले कुछ सालों में राहुल गांधी की जबरदस्त ब्रांडिंग करती आई है। भारत जोड़ो यात्रा हो या भारत जोड़ो न्याय यात्रा, राहुल गांधी ने देश को दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक सड़क से नापा है। वो पिछले कुछ महीनो में सरकार के खिलाफ काफी उत्तेजित नजर आए हैं। बड़ी हुई दाढ़ी, सफेद टी-शर्ट और ब्लैक पेंट, यह उनकी पहचान बन गई थी।

सफेद टी-शर्ट और ब्लैक पेंट के लिए तो उन्होंने यहां तक कहा कि मैं सदा लिबास में रहना पसंद करता हूं। इसलिए सफेद टी-शर्ट पहन लेता हूं। ये और बात है कि इस सफेद टी-शर्ट की कीमत को लेकर सत्ताधारी भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी पर तंज कसा, लेकिन राहुल गांधी इस बार रुकते नहीं दिखे।

भले यह तथ्य सही है कि कांग्रेस ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अपना तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन किया, लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में 99 सीटें लाकर कांग्रेस अपनी वापसी का डंका बजा रही है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष बनने लायक सीटें नहीं ला रही थी तो इस कामयाबी से एक नए उत्साह का संचार उसमें देखने को मिल रहा है।

कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल्स पर अगर नजर डाली जाए तो यह साफ दिखता है कि कांग्रेस राहुल गांधी को अभी से प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने की मंशा से आगे बढ़ रही है। उन्हें जननायक बताया जा रहा है। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष खड़ा करने की पूरी कोशिश की जा रही है।

राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी देने के पीछे कांग्रेस का यही यह गेम प्लान है। पूरी कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट नजर आ रही है। हालांकि, इन चुनावों में कांग्रेस को जो 99 सीटें मिली हैं, वो केवल राहुल गांधी के प्रचार या चेहरे की बदौलत नहीं मिली हैं। यह कांग्रेस पार्टी को बखूबी पता है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे राज्यों में कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनाव लड़ी। यहां तक की राजस्थान में कांग्रेस को हनुमान बेनीवाल, भारतीय आदिवासी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता करना पड़ा, जहां वो भाजपा से दो-दो हाथ करती है। यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि इंडी अलायंस की अधिकांश पार्टियां कांग्रेस की जमीन छीनकर अपने-अपने राज्यों में खड़ी हुई हैं।

राहुल गांधी की असली चुनौतियां अब शुरू हुई है। अब तक वो बिना संवैधानिक जिम्मेदारी के राजनीति कर रहे थे। हालांकि, उनके पास वर्ष 2004 से 2014 के बीच मंत्री और प्रधानमंत्री तक बनने का अवसर था, जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया, यानी वो कोई संवैधानिक पद लेने से बचते रहे थे। राहुल गांधी के पास अगले 5 साल नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने का अच्छा अवसर है। राहुल गांधी इस बार पहले से थोड़े अधिक परिपक्व नजर आ रहे हैं।

लोकसभा के भीतर और बाहर वो थोड़ा फॉर्म में दिखे, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों को थोड़ा संभलकर चलना होगा, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर अपनी पहली परीक्षा में राहुल गांधी कोई बड़ा इंपैक्ट नहीं छोड़ पाए हैं। सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष चुनने के बजाय उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से प्रत्याशी खड़ा कर दिया, जिसे विपक्ष का प्रत्याशी बताया गया, जिसे लेकर ममता बनर्जी ने नाराजगी जता दी। इंडी अलायंस की एकता में पहली दरार साफ दिखी।

जब लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव में मत विभाजन का मौका आया तो राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष पीछे हट गया। शायद कांग्रेस को डर था कि जिन 233 सीटें के नंबर को लेकर वो उत्साहित है, वो गुबारा फुस्स न हो जाए। यदि राहुल गांधी सर्वसम्मति पर अध्यक्ष पद के लिए मान जाते तो बहुत संभव था कि डिप्टी स्पीकर का पद वो सरकार से ले लेते, लेकिन अब यह बेहद मुश्किल नजर आता है।

अब राहुल गांधी केवल आरोप-प्रत्यारोप लगाकर राजनीतिक खेल नहीं खेल सकते हैं। उन्हें पूरे तथ्यों और नियमों के साथ सरकार को घेरना होगा। नरेंद्र मोदी सरकार का एक अल्टरनेटिव जनता के समक्ष पेश करना होगा। राहुल गांधी के पास अगले 60 महीने बहुत बड़ा अवसर होगा। यदि एनडीए गठबंधन सरकार पूरे 5 साल अपना कार्यकाल पूरा लेती है तो वर्ष 2029 में राहुल गांधी मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना सकते हैं।


बड़ा सवाल यह है कि क्या तब तक राहुल गांधी इंडी अलायंस को एकजुट रख पाएंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिश यही होगी कि विपक्षी एकता में दरार पड़े। राहुल गांधी को आगे बढ़ता देख कांग्रेसी जमीन पर खड़ी हुई क्षेत्रीय पार्टियों का रुख क्या रहेगा? यह देखना होगा। इस बार मिले अवसर को राहुल गांधी कितना भुना पाएंगे? इस पर जनता की नजर अवश्य बनी रहने वाली है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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