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अंत:करण की निर्मलता और दिव्य सौंदर्य: भीतर की दीपावली की तैयारी करें, अंतःकरण में फैलेगा शांति का प्रकाश

Sat, 07 Nov 2026 09:45 AM IST
ज्योति भास्कर स्वामी अवधेशानंद गिरी।
स्वामी अवधेशानंद गिरी। Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 07 Nov 2026 09:45 AM IST
सार

अनियंत्रित कामना, क्रोध और लोभ का त्याग भीतर की दीपावली की तैयारी है। क्षमा, संयम और उदारता से अंतःकरण में शांति का प्रकाश फैलता है। 

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Purity of inner self and divine beauty Prepare for inner Diwali light of peace will spread within your soul
जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी - फोटो : अमर उजाला एआई

विस्तार

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
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कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम्॥

भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य से परंपरागत रूप से संबंद्ध सौन्दर्यलहरी के इस श्लोक में जगज्जननी के अनुपमेय सौंदर्य की स्तुति है। ‘हे हिमालयपुत्री! ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ कवि भी आपके सौंदर्य का सादृश्य खोजने में असमर्थ हैं। आपके दर्शन की उत्कंठा से देवांगनाएं भी मन द्वारा शिवसायुज्य की उस अवस्था की कामना करती हैं, जो कठोर तप से भी दुर्लभ है।’ यह स्तुति सौंदर्य की अनुभूति को दिव्य उपासना की ऊंचाई प्रदान करती है। इसी भावभूमि में रूप चतुर्दशी का चिंतन अत्यंत सार्थक है। दीपावली के उत्सवक्रम में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और छोटी दीपावली के नाम से जाना जाता है। अमांत मासगणना में यही तिथि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है। इस पर्व का प्रमुख शास्त्रीय आचार अभ्यंग स्नान है।

धर्मसिंधु में नरक चतुर्दशी पर तैलाभ्यंग और प्रातः कालीन स्नान का विधान मिलता है। पद्मपुराण में भी इस तिथि के प्रत्यूषकालीन स्नान की महिमा कही गई है। रूप चौदस की लोकपरंपरा में उबटन, अभ्यंग और स्वच्छ वस्त्रों द्वारा सौंदर्य एवं आरोग्य की कामना की जाती है। इसका आध्यात्मिक विस्तार हमें अंत:करण की ओर ले जाता है। नरक चतुर्दशी की उत्सव परंपरा श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय से भी जुड़ी है। इस विजय का मनन करते हुए हम अपने अंतर्मन के विकारों को पहचान सकते हैं। अहंकार, क्रोध, लोभ और द्वेष जीवन में अशांति पैदा करते हैं। भगवान की स्मृति, आत्मनिरीक्षण व सदाचरण, इन प्रवृत्तियों से ऊपर उठने की शक्ति देते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता भी सचेत करती है:

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द्वारं नाशनमात्मनः।त्रिविधं नरकस्येदं
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

अनियंत्रित कामना, क्रोध और लोभ का त्याग भीतर की दीपावली की तैयारी है। क्षमा, संयम और उदारता से अंतःकरण में शांति का प्रकाश फैलता है। इस अवसर पर यमतर्पण तथा दीपदान की परंपराएं भी जीवन की रक्षा और उसके उत्तरदायित्व का स्मरण कराती हैं।

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छोटी दीपावली की ज्योति हमें प्रेरित करे कि हम किसी के दुख को कम करें, टूटे संबंधों में स्नेह जगाएं और अपने व्यवहार से आशा का संचार करें। जगज्जननी की आराधना से हमारा हृदय श्रद्धा, करुणा और विवेक से सुशोभित हो। स्वच्छता साधना बने, सौंदर्य सद्गुणों में प्रकट हो और उत्सव लोकमंगल का अवसर बने। परमात्मा हमारे अंतःकरण के विकारों का हरण करें और मां भगवती जीवन को पवित्रता, प्रसन्नता एवं आत्मबोध से आलोकित करें। रूप चौदस, नरक चतुर्दशी और छोटी दीपावली सबके लिए शुभ एवं कल्याणकारी हो।

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