फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Punjab Ex-MLAs will get a pension for only one term, a matter of new debate

पंजाब: मान सरकार का साहसिक फैसला, जनप्रतिनिधियों की पेंशन कटौती से उठी नई बहस

Tue, 29 Mar 2022 06:10 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Tue, 29 Mar 2022 06:10 PM IST
सार

पंजाब में मान सरकार ने सभी वर्तमान व पूर्व  विधायकों की पेंशन पर कैंची चला दी है। इसके तहत अब सभी वर्तमान और पूर्व विधायकों को केवल एक कार्यकाल के लिए पेंशन मिलेगी, चाहे वे कितनी भी बार चुनाव जीत कर विधायक बने हों।

विज्ञापन
Punjab Ex-MLAs will get a pension for only one term, a matter of new debate
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के फैसले - फोटो : ANI

विस्तार

पंजाब की नई भगवंत मान सरकार ने प्रदेश के वर्तमान और पूर्व विधायकों की पेंशन व भत्तों में कटौती का सराहनीय फैसला कर इस देश में जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन और भत्तों आदि के औचित्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

विज्ञापन


दो साल पहले कोविड काल में केन्द्र की मोदी सरकार ने सांसदों के वेतन भत्तों में 30 फीसदी कटौती का अध्यादेश लाकरअनुकरणीय मिसाल पेश की थी। पंजाब सरकार के फैसले को उसी की अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।
विज्ञापन

 

जनप्रतिनिधियों की पेंशन और भत्तों को लेकर राज्यों में अलग-अलग नियम हैं, लेकिन जो जानकारी सामने आ रही है, उससे लगता है कि इस मामले में पंजाब में सबसे ज्यादा गड़बड़ घोटाला है। वहां अफसरों ने विधायकों को खुश करने के लिए मनमाने तरीके से पेंशन और भत्तों की गणना की। चूंकि इससे सभी विधायकों को आर्थिक फायदा हो रहा था, इसलिए किसी ने भी इस पर सवाल उठाना जरूरी नहीं समझा। मान सरकार ने इस सुविचारित चुप्पी पर भी चोट की है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

 

जनप्रतिनिधियों और शासकीय कर्मचारियों के वेतन भत्तों आदि के नियमों में बुनियादी फर्क है। निर्वाचित प्रतिनिधि नौकर न होकर जनसेवक हैं। उन्हें पारिश्रमिक नहीं, मानदेय दिया जाता है। अममून निर्वाचित सरकारें अपने कर्मचारियों के वेतन भत्तों व पेंशन के लिए आयोग या कमेटियां गणित करती हैं और उनकी सिफारिशों के आधार पर ही कर्मचारियों के वेतनमान, अन्य भत्ते व पेंशन तय होती है।


वेतन-भत्ते को लेकर नियम कायदे

निर्वाचित प्रतिनिधियों को संविधान के अनुच्छेद 106 के सांसद वेतन,भत्ते, पेंशन अधिनियम 1954 के तहत खुद ही वेतन भत्ते तय करने का अधिकार है। लिहाजा हर पांच साल में वेतन, भत्ते पेंशन आदि पुनरीक्षित होते हैं। इसकी सिफारिश सांसदों की संयुक्त समिति करती है।

यह समिति लोकसभा अध्यक्ष नियुक्त करते हैं, जिसमें 10 सदस्य लोकसभा के और 5 राज्य सभा के होते हैं। समिति की बढ़ती महंगाई के आलोक में ज्यादा वेतन भत्तों आदि की सिफारिशों को अक्सर जस का तस स्वीकार कर संसद में विधेयक पारित कर लिया जाता है। 

अक्सर महंगाई को लेकर संसद में सरकार की आलोचना करने वाले सांसद विधायक अपने वेतन भत्तों व पेंशन में भरपूर बढ़ोतरी के सवाल पर एक पाले में नजर आते हैं।  

सांसद के वेतन भत्तों व पेंशन से सम्बन्धित पिछला संशोधन विधेयक संसद में 2020 में पारित हुआ था। इसके मुताबिक पूर्व सांसदों को प्रतिमाह 25 हजार पेंशन तथा प्रति वर्ष 2000 रु. प्रति माह अतिरिक्त पेंशन मिलता है। 

Punjab Ex-MLAs will get a pension for only one term, a matter of new debate
पंजाब में जनप्रतिनिधियों की पेंशन को लेकर बड़ा फैसला - फोटो : ANI

मान सरकार का फैसला

पंजाब में मान सरकार ने सभी वर्तमान व पूर्व  विधायकों की पेंशन पर कैंची चला दी है। इसके तहत अब सभी वर्तमान और पूर्व विधायकों को केवल एक कार्यकाल के लिए पेंशन मिलेगी, चाहे वे कितनी भी बार चुनाव जीत कर विधायक बने हों।

इसके लिए पेंशन फार्मूला बदला जा रहा है। इससे राज्य सरकार को हर साल लगभग 15 करोड़ रु. की बचत होगी। बताया जाता है कि पंजाब में विधायकों की पेंशन की मनमानी गणना के चलते जो विधायक जितनी बार चुना गया, उसे उसी अनुपात में ज्यादा पेंशन मिलती रही है।

मसलन छह बार विधायक रहीं पूर्व सीएम राजिंदर कौर भट्ठल, लाल सिंह, सरवन सिंह फिल्लौर को हर महीने 3 लाख 25 हजार रुपये मिलते हैं तो वहीं 10 बार के विधायक की पेंशन छह लाख 62 हजार प्रतिमाह है। नए नियम के तहत अब सभी पूर्व व मौजूदा विधायकों को सिर्फ 75 हजार रुपये पेंशन मिलेगी।  


यहां सवाल यह है कि देश में सांसदों और राज्यों में विधायकों के पेंशन व भत्तों के नियमों में एकरूपता क्यों नहीं है? क्या जनप्रतिनिधियो को सरकारी कर्मचारी की तरह महंगाई राहत आदि मिलनी चाहिए? और यह भी कि क्या सांसदो/विधायकों को मिलने वाले वेतन, भत्ते, पेंशन आदि जन सेवा के लिए हैं या फिर यह उनकी ‘कमाई’ है?

कितना वेतन लेते हैं मुख्यमंत्री?

जहां तक राज्यों में विधायकों के वेतन-भत्तों की बात है तो यह हर राज्य की आर्थिक परिस्थिति पर निर्भर है। यह फर्क मुख्यमंत्रियों की पगार में भी साफ झलकता है। मसलन तेलंगाना जैसे तुलनात्मक रूप से छोटे राज्य के मुख्यमंत्री का वेतन और भत्ते देश में सबसे ज्यादा है। वहां के सीएम के.चंद्रशेखर राव हर माह 4 लाख 10 हजार रु. वेतन लेते हैं जबकि आकार में बहुत छोटे दिल्ली राज्य के सीएम अरविंद केजरीवाल  का मासिक वेतन 3 लाख 90 हजार रु. है। 

देश के आबादी के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  का मासिक वेतन 3 लाख 65 हजार है जबकि मप्र के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हर माह 2 लाख 55 हजार वेतन ही लेते हैं। यही विषमता विधायकों के वेतन भत्तों और पेंशन में भी है।

पंजाब जैसे राज्य में वर्तमान और पूर्व विधायकों के पेंशन और भत्तों की गणना और भुगतान जिस बेलगाम तरीके से किया जाता रहा है, उसने अन्य राज्यों को भी आत्म निरीक्षण पर विवश कर दिया है। कायदे से पेंशन एक ही कार्यकाल की दी जाए तथा बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए विधायकों को एक निश्चित राशि अतिरिक्त पेंशन के रूप में दी जाए।

यह इसलिए भी मौजूं है, क्योंकि देश में ज्यादातर राज्यों की माली हालत खराब है। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों को मन माफिक पेंशन भत्ते आदि दिए जाएं, यह युक्ति संगत नहीं लगता। 

सांसदों/पूर्व सांसदों और देश भर के 29 राज्यों के विधान सभा और विधान परिषद सदस्यों के पेंशन भत्तों पर कितना पैसा हर माल खर्च होता है, इसका एकजाई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह राशि अरबों में होनी चाहिए।

इस समय देश में लोकसभा और राज्यसभा के वर्तमान सांसदों की कुल संख्या 800 है। पूर्व सांसदों की संख्या भी सैंकड़ों में है। इसी तरह देश के सभी 29 राज्यों में कुल विधायक 3988 हैं और विधान परिषद सदस्यों की संख्या 426 है। ये कुल मिलाकर 4414 होते है। इनमें पूर्व विधायकों की संख्या मिला ली जाए तो यह संख्या भी लाख के आसपास पहुंचती है।


इनके पेंशन भत्तों पर हर साल होने वाला खर्च करोड़ो में है। इसका अर्थ यह नहीं कि सांसदों और विधायकों को पेंशन न दी जाए। बेशक दी जाए, लेकिन उसकी गणना और भुगतान तर्क संगत होना चाहिए। खासकर तब कि जब अधिकांश कर्ज के बोझ तले डूबे हुए हैं, इस तरह के खर्च कम होने से कुछ राहत मिल सकती है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed