पंजाब चुनाव 2022: दलित वोटों पर सबकी नजर, आखिर कौन रहेगा प्रभावी?
पंजाब में विधानसभा चुनाव के मुहाने पर जिस तरह की राजनीतिक उठापटक मची है, उससे इस बात की संभावना बढती जा रही है कि चुनाव में किसी भी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत शायद ही मिल सके। राज्य में मुख्य लड़ाई 31 फीसदी दलित वोटों को लुभाने की है, जिसकी शुरूआत पहले शिरोमणि अकाली दल ( शिअद) ने बसपा के साथ चुनावी गठबंधन करके और राज्य में दलित डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा से की थी।
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पंजाब में विधानसभा चुनाव के मुहाने पर जिस तरह की राजनीतिक उठापटक मची है, उससे इस बात की संभावना बढती जा रही है कि चुनाव में किसी भी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत शायद ही मिल सके। राज्य में मुख्य लड़ाई 31 फीसदी दलित वोटों को लुभाने की है, जिसकी शुरुआत पहले शिरोमणि अकाली दल ( शिअद) ने बसपा के साथ चुनावी गठबंधन करके और राज्य में दलित डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा से की थी।
जवाब में कांग्रेस ने दलित कार्ड चलते हुए चरणजीत सिंह चन्नी के रूप में राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की तो उधर आम आदमी पार्टी (आप) संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो दलित बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जाएगी।
पंजाब के मुद्दे और पार्टियां
भाजपा और नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन वो दूसरी पार्टियों ने चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकते हैं, क्योंकि प्रदेश में सत्ता के अब इतने हितधारक हो गए हैं कि मतदाता का रुझान क्या होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल है।
इधर, राज्य में दूसरी स्पर्द्धा लोकलुभावन घोषणाओं की है। विवादित तीन कृषि कानून भी बड़ा मुद्दा था, लेकिन उनकी वापसी के बाद भी बेरोजगारी, आतंकवाद का बढ़ता खतरा, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, ड्रग्स माफिया, बढ़ते अपराध, दलित अत्याचार जैसे मुद्दे बकरार हैं। इसके अलावा सिखों के पवित्र ग्रंथ की बेअदबी का मामला भी अहम है।
बरसों तक कांग्रेस बनाम अकाली भाजपा गठबंधन की राजनीति वाले इस राज्य में कई नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं। जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस में अंतर्कलह के चलते पार्टी टूट रही है तो अकाली दल भाजपा गठबंधन भी बिखर चुका है। सत्तारूढ़ कांग्रेस में चन्नी सिद्धू लड़ाई अब सार्वजनिक हो चुकी है।
इसका ताजा उदाहरण पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी को कोई मौका नहीं देना चाहते और खुद को भावी सीएम के रूप प्रोजेक्ट करते रहना चाहते हैं। जबकि चन्नी खुद को असरदार सीएम सिद्ध करने की कोशिश में लगे हैं। जबकि चन्नी को सीएम बनाने वाला कांग्रेस हाईकमान सिद्धू की हरकतों पर मौन है।
क्या है कांग्रेस की स्थिति? कैप्टन कितना नुकसान पहुंचाएंगे?
उधर कांग्रेस से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नवोदित पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और भाजपा ने नया गठबंधन बना लिया है तो चंडीगढ़ नगर निगम का चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद आम आदमी पार्टी के हौसले बुलंद हैं, लेकिन उसके पास कोई दमदार चेहरा नहीं है।
उधर अकाली दल ने बसपा से समझौता कर राज्य में नया जाट- दलित गठजोड़ बनाने की कोशिश की है, लेकिन उसे इसका कितना फायदा मिलेगा, कहा नहीं जा सकता, क्योंकि कांग्रेस ने राज्य में पहली बार दलित मुख्यमंत्री बनाकर दलितों को उलझन में डाल दिया है।
भाजपा के लिए खोने के लिए कुछ खास नहीं है, कैप्टन के साथ अपनी नाव खेते हुए उसकी कुछ ताकत बढ़ जाए, यही काफी है। अलबत्ता कल को शिअद-बसपा-भाजपा-पलोका जैसा कोई व्यापक गठबंधन बन जाए तो तस्वीर बदल सकती है।
पंजाब विधानसभा में 117 सीटें हैं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में 77 सीटें जीतकर सत्ता में जबरदस्त वापसी की थी और राज्य में दस साल से जारी शिअद भाजपा राज को खत्म किया था। दूसरे, राज्य में नवोदित आप ने शिअद भाजपा गठबंधन को तीसरे स्थान पर धकेलते हुए 20 सीटें जीतकर प्रतिपक्ष का स्थान हथिया लिया। जबकि शिअद-भाजपा गठबंधन को महज 18 सीटों पर जीत मिली, जिनमें से 3 सीटें भाजपा की थीं।
जहां तक वोट प्रतिशत की बात है तो कांग्रेस और अकाली गठबंधन के वोटों में करीब 8 फीसदी का अंतर रहा। जबकि आप का वोट शेयर 23.80 फीसदी था। ऐसे में आप को सत्ता हासिल करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी, लेकिन शिअद- बसपा गठबंधन काम कर गया तो वो सत्ता तक पहुंच सकता है।
इसमें दिक्कत यह है कि शहरों में हिंदू वोटों के समर्थन के बगैर शिअद का सत्ता पाना मुश्किल है। यह वोट अगर भाजपा- पलोक गठबंधन को मिला तो तस्वीर बिल्कुल अलग होगी। दूसरे, दलित को सीएम बनाने से राज्य में जाट सिख नाखुश हैं। ऐसे में जाट और दलित साथ आएंगे, इसकी संभावना कम है।
पंजाब में देश की सबसे ज्यादा यानी 31 .9 फीसदी दलित आबादी है। जबकि जाट सिखों की संख्या 21 प्रतिशत है। कागज पर यह समीकरण मजबूत दिखता है, लेकिन हकीकत में वैसा होना बहुत कठिन है।
वोटर्स की स्थिति और कांग्रेस
उधर सत्तारूढ़ कांग्रेस में कैप्टन के जाने के बाद जाट सिखों का दबदबा कुछ कम हुआ है। हालांकि सिद्धू भी जाट हैं। लेकिन पार्टी लगातार अंतर्कलह से जूझ रही है। मुख्यमंत्री बनने के आकांक्षी सिद्धू की तमाम कोशिशों के बाद भी पार्टी नेतृत्व ने कैप्टन को हटाने के बाद दलित कार्ड चलते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बना दिया। पहले सिद्धू को लगा कि वो बैक सीट ड्राइविंग कर लेंगे, लेकिन वैसा न होता देख वो कोप भवन में चले गए।
अब पार्टी में फिर दो खेमे हैं। एक चन्नी का दूसरा सिद्धू का। पहले चन्नी ने किसानों के बिजली बिल माफ कर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश की। लेकिन सिद्धू यहां भी सवा सेर साबित हुए। उन्होने एक कदम आगे जाकर बरनाला के शैहणा की जनसभा में ऐलान कर डाला कि कांग्रेस सत्ता में आई तो पांचवीं पास छात्राओं को पांच हजार रुपये, दसवीं पास को 15 हजार और 12वीं पास छात्राओं को 20 हजार रुपये दिए जाएंगे। कॉलेज जाने वाली लड़कियों को स्कूटी दी जाएगी। साथ ही उच्च शिक्षा के लिए लड़कियों के टैबलेट, लड़कियों के नाम पर रजिस्ट्री करवाने के लिए कोई स्टांप ड्यूटी नहीं लगेगी।
सिद्धू के बोलने का अंदाज ऐसा था मानों अगले सीएम वही बनने वाले हैं। सिद्धू के इस बड़बोलेपन पर पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने कहा कि सिद्धू अपनी जुबान पर लगाम रखें। हर बात में ‘मैं’ कहने से बचें।
जाहिर है कि चुनाव में पार्टी एक होकर नहीं उतरने जा रही है। उधर शिरोमणि अकाली दल को उम्मीद है कि बसपा से गठबंधन के बाद राज्य के दलित उसे ही वोट देंगे। शिअद ने 93 सीटों पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा भी कर दी है।
दूसरी तरफ राज्य में सत्ता के दावेदारों ने लोक लुभावन घोषणाओं की बरसात शुरू कर दी है। आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो राज्य भर के सभी अनुसूचित जाति के बच्चों को शिक्षा दी जाएगी। अस्थाई सफाई कर्मचारियों को स्थायी किया जाएगा। जो लोग सीवर में काम करते हैं उन्हें मशीनें दी जाएंगी। उधर कृषि कानूनों की वापसी के बाद भाजपा की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। कई विधायक उसमें शामिल हो रहे हैं।
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