फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Public Sentiment Smoldering Across Screens: The New Wave of Social Media A Movement or Digital Mobocracy

स्क्रीन पर सुलगता जनमत: सोशल मीडिया का नया उबाल, आंदोलन या डिजिटल भीड़तंत्र?

Sat, 06 Jun 2026 07:02 PM IST
Girish Upadhyay गिरीश उपाध्याय
Updated Sat, 06 Jun 2026 07:02 PM IST
सार

हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप की एक टिप्पणी पर ऑनलाइन शिक्षकों और कोचिंग जगत की तीखी प्रतिक्रिया ने देश के डिजिटल परिदृश्य को हिलाकर रख दिया।

विज्ञापन
Public Sentiment Smoldering Across Screens: The New Wave of Social Media A Movement or Digital Mobocracy
स्क्रीन पर सुलगता जनमत: सोशल मीडिया का नया उबाल, आंदोलन या डिजिटल भीड़तंत्र? - फोटो : AI

विस्तार

एक समय था जब सार्वजनिक विमर्श कॉफी हाउसों, चौपालों, विश्वविद्यालयों के प्रांगणों और समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठों के गेटकीपर संपादकों से छनकर आकार लेता था। लेकिन आज की डिजिटल दुनिया ने इस पूरी व्यवस्था को उलट दिया है। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप की एक टिप्पणी पर ऑनलाइन शिक्षकों और कोचिंग जगत की तीखी प्रतिक्रिया ने देश के डिजिटल परिदृश्य को हिलाकर रख दिया। देखते ही देखते एक एंकर बनाम शिक्षक विवाद लाखों विद्यार्थियों, शिक्षकों और आम नागरिकों के सामूहिक स्वाभिमान का मुद्दा बन गया।

विज्ञापन


यह घटना कोई अकेला अपवाद नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के उस नए सामाजिक-संचार तंत्र (Social Communication Ecosystem) का साक्ष्य है, जिसमें कोई एक वाक्य, कोई एक कटाक्ष या कोई एक 15-सेकंड की असंतुलित वीडियो क्लिप मिनटों में ध्रुवीकरण पैदा कर सकती है। सवाल यह नहीं है कि किसने क्या कहा, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि भारतीय समाज का एक विशाल हिस्सा अब किसी सूचना को सिर्फ सुनता नहीं है, बल्कि तत्काल डिजिटल मोर्चेबंदी में तब्दील हो जाता है। इंटरनेट अब केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहा, वह त्वरित संगठन निर्माण और सामूहिक आक्रोश का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
विज्ञापन


शिक्षा का लोकतंत्रीकरण बनाम व्यावसायिक साम्राज्य

इस विवाद की जड़ों को समझने के लिए हमें पिछले एक दशक में भारत के शैक्षणिक ढांचे में आए युगांतकारी बदलाव को देखना होगा। ऐतिहासिक रूप से, दिल्ली के मुखर्जी नगर, करोल बाग या कोटा जैसे शहरों में स्थित महंगी ऑफलाइन कोचिंग व्यवस्था निम्न-मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवेश के बच्चों की पहुँच से बाहर थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


कोविड काल का बदलाव: महामारी के संकट काल में जब देश के सभी भौतिक संस्थान बंद थे, तब यूट्यूब और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने शिक्षा के नए द्वार खोले। इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने भारत के सुदूर कस्बों के उन लाखों विद्यार्थियों को देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की रेस में ला खड़ा किया जो महंगी फीस नहीं दे सकते थे।

इसलिए, जब किसी मुख्यधारा के मीडिया मंच से पूरे ऑनलाइन शिक्षक समुदाय को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है, तो प्रतिक्रिया का हिंसक या आक्रामक होना स्वाभाविक है। यह रोष या प्रतिक्रिया केवल अपनी नौकरी अथवा रोजगार बचाने का नहीं है, बल्कि यह उस 'शैक्षणिक अस्मिता' और शिक्षा के लोकतंत्रीकरण (एजुकेशन डेमोक्रेटाइजेशन) की रक्षा का प्रयास भी है, जिसने पारंपरिक अभिजात्यवर्गीय शैक्षणिक एकाधिकार को तोड़ा है।

परीक्षा व्यवस्था का ढहता ढांचा और युवाओं का अविश्वास

लेकिन इस चमकती तस्वीर का एक स्याह और डरावना पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आत्मघाती होगा। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का ढांचा इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर विभिन्न राज्यों की परीक्षाओं में लगातार हो रहे पेपर लीक, साल्वर गैंग की सक्रियता, दलालों का संगठित नेटवर्क और तकनीकी सेंधमारी ने देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे को तोड़कर रख दिया है। युवा वर्षों तक पसीना बहाते हैं, और अंत में परीक्षा निरस्त होने की खबर आती है।

इस पृष्ठभूमि में, यदि कोई खोजी पत्रकार या विश्लेषक इस बात पर सवाल उठाता है कि क्या इस अरबों रुपये के कोचिंग उद्योग का कोई हिस्सा इस संगठित भ्रष्टाचार नेटवर्क में शामिल है, तो उस प्रश्न को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता। अग्निपथ योजना के विरोध के दौरान भी कुछ कोचिंग संस्थानों द्वारा युवाओं की असुरक्षा और गुस्से को भड़काने के आरोप जांच एजेंसियों ने लगाए थे। संकट तब शुरू होता है जब पत्रकारिता अपनी भाषाई मर्यादा खो देती है। जब सवाल किसी 'संस्थागत जवाबदेही' पर न होकर पूरे 'शिक्षक समुदाय' की अवमानना में बदल जाता है, तो निष्पक्ष विमर्श की जगह केवल डिजिटल युद्ध शेष रह जाता है।

डिजिटल आक्रोश का मनोविज्ञान

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो डिजिटल मंचों पर आक्रोश अब सिर्फ एक मानवीय भावना नहीं रह गया है, यह एक 'प्रदर्शन' (Performance) बन चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में व्यक्ति सिर्फ नाराज नहीं होता, वह अपनी नाराजगी को 'लाइक', 'शेयर', 'रीपोस्ट' और 'कमेंट' के जरिए सामाजिक स्वीकृति दिलाना चाहता है।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ (APA) के विभिन्न शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं जो नकारात्मकता, गुस्से और ध्रुवीकरण वाले कंटेंट को सबसे अधिक दृश्यता (Visibility) प्रदान करते हैं। इसे जनसंचार की भाषा में 'फ्रेमिंग' (Framing) और 'एजेंडा सेटिंग' (Agenda Setting) का नया दौर कहा जाता है। पहले संपादक तय करता था कि देश क्या सोचेगा (Gatekeeping); आज इन्फ्लुएंसर्स, ट्रोल्स, ट्रेंड्स और अदृश्य एल्गोरिद्म तय करते हैं कि समाज किस मुद्दे पर चौबीसों घंटे लड़ेगा। परिणाम यह होता है कि मुद्दे का मूल संदर्भ पीछे छूट जाता है और भावनात्मक गुटबाजी जीत जाती है।
 

Public Sentiment Smoldering Across Screens: The New Wave of Social Media A Movement or Digital Mobocracy
स्क्रीन पर सुलगता जनमत: सोशल मीडिया का नया उबाल, आंदोलन या डिजिटल भीड़तंत्र? - फोटो : एआई

मीम से आंदोलन तक: प्रतीकात्मक प्रतिरोध का बदलता स्वरूप

इंटरनेट संस्कृति का एक और दिलचस्प उदाहरण 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसे प्रतीकों का उदय है। मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के बाद युवाओं के बीच उभरी इस प्रतिक्रिया ने डिजिटल व्यंग्य और वास्तविक राजनीतिक संगठन के बीच की महीन रेखा को धुंधला कर दिया। जो बात कल तक महज एक 'मीम' या सोशल मीडिया का लतीफा थी, वह आज डिजिटल अभियानों में बदल रही है, ऑनलाइन याचिकाओं की शक्ल ले रही है या फिर प्रवक्ताओं और सुगठित गुटों के माध्यम से एक नए आंदोलन का रूप ले रही है।

यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि डिजिटल भीड़ अब केवल अनियंत्रित शोर नहीं है, उसके पास अपना एक अनूठा संगठनात्मक ढांचा है जो कुछ ही घंटों में किसी भी व्यवस्था के सामने समानांतर दबाव समूह (Pressure Group) बनकर खड़ा हो सकता है।

चुनौतियां और अनुत्तरित प्रश्न

डिजिटल भीड़तंत्र के इस नए उभार ने लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं जैसे- 

भीड़-मानसिकता (Mob Mentality) का खतरा: जब प्रतिक्रिया की गति विवेक की गति से कहीं तेज हो जाए, तो भीड़ बिना किसी प्रामाणिक तथ्य के किसी का भी डिजिटल लिंचिंग कर सकती है। तो क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सत्य केवल वह है जो ट्रेंड कर रहा है?

असुरक्षा का व्यावसायिक दोहन: कोचिंग उद्योग युवाओं के भविष्य, नौकरी की चाहत और उनकी असुरक्षा से सीधे जुड़ा है। जहाँ लाखों युवाओं का जीवन अनिश्चितता के भंवर में हो, वहाँ एक छोटी सी अफवाह या उकसावा भी हिंसक कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा कर सकता है।

संवादहीनता का संकट: मुख्यधारा का मीडिया और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे हैं। यदि समाज के दो सबसे प्रबुद्ध अंग पत्रकार और शिक्षक ही गरिमापूर्ण संवाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं, तो आम नागरिक से संयम की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

सचेत नागरिकता और भाषाई संयम

इस डिजिटल अराजकता का समाधान न तो सेंसरशिप में है और न ही हर डिजिटल असहमति को 'देशविरोधी' या 'संदिग्ध' मान लेने के संकीर्ण दृष्टिकोण में। डिजिटल आक्रोश दरअसल एक सामाजिक संकेत (Social Indicator) है, जो यह बताता है कि समाज के भीतर बेरोजगारी, पारदर्शिता की कमी और व्यवस्थागत अविश्वास का गहरा लावा उबल रहा है। 

यदि इस स्थिति में सुधार लाना है तो इस घटनाक्रम से जुड़े तीनों पक्षों को अपनी अपनी भूमिका का पुनरीक्षण करना होगा। 

मीडिया: मुख्यधारा के पत्रकारों को समझना होगा कि उनके हाथ में जो माइक है, उसकी ताकत के साथ 'भाषाई संयम' और सम्मान अनिवार्य है। सवाल तीखे और कठोर हों, लेकिन वे अपमानजनक या सामान्यीकरण से ग्रसित न हों।

शिक्षक: ऑनलाइन गुरुओं को यह याद रखना होगा कि डिजिटल स्पेस में उनकी एक बहुत बड़ी ब्रांड वैल्यू और व्यावसायिक हित भी जुड़े हैं। इसलिए, किसी भी विमर्श का उत्तर देते समय उनके शब्दों में 'अकादमिक गरिमा' और परिपक्वता झलकनी चाहिए, न कि व्यूज बटोरने की ललक।

विद्यार्थी: युवा पीढ़ी को प्रत्येक वायरल वीडियो क्लिप को अंतिम सत्य मानने की भूल से बचना होगा। उन्हें 'क्लिकबेट' और 'कंटेंट' के बीच का अंतर समझना होगा ताकि वे किसी के व्यावसायिक या राजनीतिक एजेंडे का मोहरा न बनें।

कुल मिलाकर आज की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर शोर बढ़ गया है, बल्कि त्रासदी यह है कि इस शोर में विवेक की आवाज़ मद्धम हो गई है। जनसंचार के पुराने सिद्धांत अब बेअसर हो रहे हैं। अब फ्रेमिंग स्टूडियो में नहीं, बल्कि क्लिपिंग्स काटकर, कैप्शन लगाकर और हैशटैग बनाकर आपके और हमारे मोबाइलों में की जा रही है।

हमें यह समझना होगा कि हर उठती हुई डिजिटल लहर कोई वास्तविक जन-आंदोलन नहीं होती, हर सोशल मीडिया ट्रेंड देश का जनमत नहीं होता और स्क्रीन पर दिखने वाली हर भीड़ जागरूक नागरिक नहीं होती। सोशल मीडिया के इस नए युग में न तो हमें डरकर पीछे हटना है और न ही इसकी चकाचौंध में अंधा होना है। लोकतांत्रिक गरिमा तभी बचेगी जब हम एक 'डिजिटल भीड़' का हिस्सा बनने के बजाय एक 'सजग और विवेकशील नागरिक' के रूप में सोचना शुरू करेंगे।

-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed