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राष्ट्रपति चुनाव: सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक और आदिवासी उत्थान की प्रणेता बनेंगी द्रौपदी मुर्मू

Shivraj singh chouhan शिवराज सिंह चौहान
Updated Sat, 16 Jul 2022 01:04 PM IST
सार

भाजपा को अपने शासन काल में तीन अवसर प्राप्त हुए और तीनों अवसरों पर उसने समाज के तीन अलग-अलग समुदायों से राष्ट्रपति का चयन किया। सर्वप्रथम अल्पसंख्यक वर्ग से महान वैज्ञानिक और कर्मयोगी डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, फिर दलित समुदाय के माननीय श्री रामनाथ कोविंद जी और अब जनजातीय समुदाय से माननीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी।

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Presidential Election 2022 Draupadi Murmu to be the Chariot of social change
द्रौपदी मुर्मू समाज में सेवा का अमृत बांटती रही हैं। - फोटो : पीआईबी

विस्तार

भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने जनजातीय गौरव द्रौपदी मुर्मू को भारत के सर्वोच्च, राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी घोषित कर न केवल समाज के सभी वर्गों के प्रति सम्मान के भाव को पुनः सिद्द किया है अपितु कांग्रेस शासन के उस अंधे युग के अंत की भी घोषणा भी कर दी है, जिसमें सम्मान और पद अपने-अपने लोगों को पहचान कर बांटे जाते थे। 

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सर्वोच्च पद को सुशोभित करेंगी द्रौपदी मुर्मू

भारतीय लोकतंत्र में यह पहली बार होगा जब कोई आदिवासी और वह भी महिला, इस सर्वोच्च पद को सुशोभित करेगी। भारतीय जनता पार्टी की सोच हमेशा से ही भेदभाव रहित, समरस तथा समानतामूलक समाज की स्थापना की रही है।

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भाजपा को अपने शासन काल में तीन अवसर प्राप्त हुए और तीनों अवसरों पर उसने समाज के तीन अलग-अलग समुदायों से राष्ट्रपति का चयन किया। सर्वप्रथम अल्पसंख्यक वर्ग से महान वैज्ञानिक और कर्मयोगी डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, फिर दलित समुदाय के माननीय श्री रामनाथ कोविंद जी और अब जनजातीय समुदाय से माननीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी।
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हमें यह कहते हुए प्रसन्नता है कि अभी हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा के लिए चुनाव में मध्यप्रदेश से हमने दो बहनों को राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित किया है जिसमें वाल्मीकि समाज की बहन सुमित्रा वाल्मीकि भी हैं। भारतीय जनता पार्टी अद्वैत दर्शन के एकात्म मानववाद को मानती है, जिसमें कहा गया है - 'तत्वमसि' अर्थात् 'तू भी वही है'।

पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन भी अद्वैत पर ही आधारित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 'सबका साथ, सबका विकास' का संकल्प भी एकात्म मानववाद की भावना से ही निकला हुआ है। मोदी जी के निर्णयों में उनकी दूरदृष्टि और संवेदनशीलता हर भारतीय को स्पष्ट महसूस होती है।


कठिनाइयों से भरा रहा है द्रौपदी मुर्मू जी का जीवन
 

मुझे याद आता है कि द्रौपदी मुर्मू जी को उड़ीसा विधानसभा में सर्वश्रेष्ठ विधायक के सम्मान से सम्मानित किया था और इस सम्मान का नाम था- नीलकंठ सम्मान। द्रौपदी मुर्मू समाज में सेवा का अमृत बांटती रही हैं। उड़ीसा के बैदापैसी आदिवासी गांव में जन्मीं द्रौपदी मुर्मू जी ने अपने जीवन में कठोरतम परीक्षाएं दी हैं। उनके विवाह के कुछ वर्ष बाद ही पति का देहान्त हुआ और फिर दो पुत्र भी स्वर्गवासी हो गए। 

उन्होंने विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में संघर्ष का मार्ग चुना और अपनी एक मात्र पुत्री के पालन पोषण के लिए शिक्षक और लिपिक जैसी नौकरियां कीं। उन्होंने कड़ी मेहनत से पुत्री को योग्य बनाया। जनसेवा की भावना से ओतप्रोत द्रौपदी जी ने रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद का चुनाव जीत कर सक्रिय राजनीति की शुरुआत की।

वे भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा से जुड़ी रहीं और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रहीं। उड़ीसा में बीजू जनता दल एवं भाजपा की सरकार में मंत्री रहीं और 2015 में झारखण्ड की पहली महिला राज्यपाल बनीं।

Presidential Election 2022 Draupadi Murmu to be the Chariot of social change
हम सम भाव को शिरोधार्य करते हैं और ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा के लिए वचनबद्ध हैं। - फोटो : PTI

समाज के लोग लेते हैं प्रेरणा

आदिवासी हितों की रक्षा के लिए वे इतनी प्रतिबद्ध रहीं कि तत्कालीन रघुवरदास सरकार के आदिवासियों की भूमि से संबंधित अध्यादेश पर इसलिए हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि उन्हें संदेह था कि इससे आदिवासियों का अहित हो सकता है।

वे किसी भी प्रकार के दबाव के आगे नहीं झुकीं। यही कारण है कि उड़ीसा में लोग उन्हें आत्मबल, संघर्ष, न्याय तथा मूल्यों के प्रति समर्पित ऐसी सशक्त महिला के रूप में देखते हैं जिनसे समाज के लोग प्रेरणा लेते हैं।
 

भारतीय जनता पार्टी, प्राचीन भारत में महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को जो गौरव और सम्मान प्राप्त था उसे पुनर्स्थापित करना चाहती है। विदेशी आक्रान्ताओं और स्वतंत्रता के पश्चात स्वार्थी राजनीतिक दलों ने इन वर्गों को सेवक या वोट बैंक बना दिया था, भाजपा उन्हें पुन: सामाजिक सम्मान और आत्मगौरव प्रदान करना चाहती है। 


हम चाहते हैं कि भारत में फिर अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महिलाओं के ऋषित्व की पूजा हो। मनुष्य का जन्म से नहीं, कर्म से मूल्यांकल हो, जैसे वाल्मीकि, कबीर या रैदास का होता रहा है। सामाजिक सोच और व्यवहार में महिलाओं, आदिवासी और दलितों को पर्याप्त सम्मान प्राप्त हो। इसी लक्ष्य को सामने रख कर श्री रामनाथ कोविंद या श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जैसे इन वर्गों के नेताओं को शीर्ष सम्मान देना भारतीय जनता पार्टी का उद्देश्य रहा है। 


सामाजिक सोच को सही दिशा देने का संकल्प

भारतीय जनता पार्टी सत्ता में केवल शासन करने के लिए नहीं है। हमारा उद्देश्य है कि भ्रमित हो चुकी सामाजिक सोच को सही दिशा दी जाए। हम भारतीय आदर्श जीवन मूल्यों को पुनर्स्थापित करने के लिए सत्ता में हैं। हम ऋग्वेद के इस मंत्र कि "ज्योतिस्मत: पथोरक्ष धिया कृतान्" अर्थात् जिन ज्योतिर्मय (ज्ञान अथवा प्रकाश) मार्गों से हम श्रेष्ठ करने में समर्थ हों सकते हैं, उनकी रक्षा की जाए। 

हम समभाव को शिरोधार्य करते हैं और ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा के लिए वचनबद्ध हैं। हम राजनीतिक आडम्बर के माध्यम से भोली और भावुक जनता को भ्रमित करने वाले लोगों से जनता को बचाने और उसे अंधेरे कूप से निकालने और गिरने वालों को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम जनता को वहां से बचाना चाहते हैं, जहां परिवारवाद का अजगर कुण्डली मार कर उनका शोषण करने को जीभ लपलपा रहा है।

जहां लोकतंत्र का सामन्तीकरण हो गया है और ठेके पर राजनीतिक जागीरें दी जा रही थीं। अब वह समय चला गया जब चापलूसी करने वालों को सम्मानों और पुरस्कारों से अलंकृत किया जाता था। स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रोत्थान का आह्वान "उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरन्निबोधत'' हमारे प्राणों में गूंजता है। हम इसे जन-जन की रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाले रक्त की ऊष्मा बना देना चाहते हैं।

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पीएम मोदी ने अपनी दूरदृष्टि से वास्तविक लोगों को पहचाना। - फोटो : अमर उजाला

हर वर्ग का सम्मान हमारी प्रवृत्ति

भारतीय जनता पार्टी ने न केवल दलित, आदिवासी और महिलाओं को शीर्ष पद पर पहुंचा कर इन वर्गों का सम्मान किया है अपितु राष्ट्र के सर्वोच्च पद्द्म सम्मानों को भी ऐसे लोगों के बीच पहुंचाया जो उनके सच्चे हकदार थे। मोदी जी ने अपनी दूरदृष्टि से वास्तविक लोगों को पहचाना। अब पद्म पुरस्कार राष्ट्र की संस्कृति, परंपरा और प्रगति के लिए महान कार्य करने वाले वास्तविक व्यक्तियों, तपस्वियों, साहित्यकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को दिए जा रहे हैं।

पिछले पद्म सम्मान समारोह में, 30 हज़ार से अधिक पौधे लगाने और जड़ी बूटियों के पारंपरिक ज्ञान को बांटने वाली कर्नाटक की 72 वर्षीय आदिवासी बहन तुलसी गौड़ा को दिया गया। उन्हें नंगे पांव पद्म पुरस्कार लेते देखकर किसका मन भावुक नहीं हुआ होगा? किसका मस्तक गर्व से ऊंचा नहीं हुआ होगा?

हजारों लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले अयोध्या के भाई मोहम्मद शरीफ हों या फल बेच कर 150 रुपये प्रतिदिन कमा कर भी अपनी छोटी सी कमाई से एक प्रायमरी स्कूल बना देने वाले मंगलोर के भाई हरिकेला हजब्बा हों, क्या ये पहले कभी पद्म पुरस्कार पा सकते थे। 


योग्य व्यक्तियों को किया सम्मानित

आदिवासी किसान भाई महादेव कोली, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देशी बीजों के संरक्षण एवं वितरण में लगा दिया। उन्होंने कभी पद्म पुरस्कार की कल्पना भी की होगी क्या? जनजातीय परंपराओं को अपनी चित्रकारी में उकेरने वाली हमारे मध्य प्रदेश की बहन भूरी बाई हों या मधुबनी पेंटिंग कला को जीवित रखने वाली बिहार की बहन दुलारी देवी या कलारी पयट्टू नामक प्राचीन मार्शल आर्ट्स को देश में जीवित रखने वाले केरल के भाई शंकर नारायण मेनन या गांवों और झुग्गी बस्तियों में घूम-घूम कर सफाई का संदेश देने और सफाई करवाने वाले तमिलनाडु के भाई एस. दामोदरन, मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के श्रीराम सहाय पाण्डे।


इनमें से किसी के बारे में पहले हम लोग सोच भी नहीं सकते थे कि उन्हें पद्म सम्मान मिलेगा, किन्तु इन सभी भाई-बहनों को पद्म पुरस्कार मिले, क्योंकि यह भाजपा सरकार राष्ट्रवाद की जड़ों को सींचने वालों की पहचान करना और उन्हें सम्मानित करना अपना कर्तव्य समझती है।
 

अब सम्मान मांगे नहीं जाते हैं अब सम्मान स्वयं योग्य लोगों तक पहुंचते हैं, ऐसे लोग जो उसे पाने के अधिकारी हैं, फिर चाहे वे कितने ही सुदूर क्षेत्र में गुमनाम जीवन ही क्यों न बिता रहे हों।  

    
राष्ट्रपति का चुनाव हो अथवा पद्म पुरस्कारों का वितरण, मोदी जी की दूरदृष्टि, संवेदनशीलता उन्हें राजनीतिक समझौतों या स्वार्थों से बाहर निकालकर पवित्रता प्रदान करती है। भाजपा दलित, आदिवासी या महिलाओं को सम्मान देकर उन्हें उनके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाकर समाज को जागृत करने और एक वैचारिक सामाजिक क्रांति करने का प्रयत्न कर रही है।

जागृत जनता ही श्रेष्ठ राष्ट्र का, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर सकती है। ऐतरेय ब्राह्मण में सदियों पूर्व लिख दिया गया था- राष्ट्रवाणि वैविश: अर्थात् जनता ही राष्ट्र को बनाती है।    

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना भाजपा द्वारा समस्त आदिवासी और महिला समाज के भाल पर गौरव तिलक लगाने की तरह होगा। हमें अभी तक उपेक्षित और शोषित रहे वर्ग को समर्थ तथा सशक्त बनाना है। एक आदिवासी महिला का राष्ट्रपति बनना सामाजिक सोच को अंधकार से निकालकर प्रकाश में प्रवेश कराना है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक और आदिवासी उत्थान की प्रणेता बनेंगी।

नोट: लेखक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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