प्राग यात्रा: एक शहर जिसकी फिजाओं में घुला है इतिहास
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इस वक्त रात के कोई साढ़े बारह बजे हैं। लेकिन प्राग शहर का यह मध्यकालीन हिस्सा नीम अंधेरे में भी धड़क रहा है, शायद इसलिए प्राग के 'ओल्ड टाउन स्क्वायर' को प्राग का दिल कहते हैं। बारहवीं सदी का यूरोप यहां जीवन्त है।
ये स्क्वायर सैलानियों की भीड़ को हमेशा से आकर्षित करता रहा है। पुरानी ऊंची इमारतों के बीच एक दूसरे को काटती, चौड़ी शानदार गलियां। उन पर पहाड़ी चट्टानों को तराशकर बिछाई गई टाइल्स की एक लम्बी श्रृंखला। ऊपर खम्बों पर टंगी पीली रोशनियां, उन गलियों को और भी रहस्यमय बना रही हैं।
गोथिक कैथेड्रल और पुराने चर्च की चमकीली दीवारें इस रहस्य को और गहरा देती हैं। काले लिबास में एक दुबली-पतली खूबसूरत-सी टूरिस्ट गाइड हाथ में जलती हुई लालटेन लेकर आगे चल रही है। उसके चेहरे का आधा हिस्सा लंबे काले कोट के हुड से ढका है और उसके पीछे टूरिस्टों का एक छोटा-सा दल है।
टूरिस्ट गाइड कहानी शुरू करती है- "यहां वो खूबसूरत बला रहती थी''
"इस लालटेन की रोशनी के पीछे चलते रहिए।" वह गहरे लिपस्टिक लगे होटों से धीमी, लेकिन रहस्यमय आवाज में अंग्रेजी में बुदबुदाती है। वह दल खामोशी से उसके पीछे हो लेता है। वह अंधेरे में डूबे काली नुकीली मीनारों के बने टाइन चर्च के किनारे की एक इमारत के पास जाकर ठहर जाती है। "ये बेसमेंट आप देख रहे हैं।"
टूरिस्ट गाइड लालटेन नीचे रखकर कहानी शुरू करती है- "यहां वो खूबसूरत बला रहती थी। पूरा प्राग उसके सौंदर्य का दीवाना था। लेकिन वह किसी से प्रेम नहीं करती थी, सिवाए खुद के। लेकिन एक दिन उसे एक युवा तुर्क व्यापारी से उसे प्रेम हो गया।
ये पहली नजर का प्यार था। दोनों मिलने लगे। और एक दिन विदाई का वक्त आ गया। जाते वक्त उस तुर्क ने कहा- मैं वापस आऊंगा, तुम मेरा इंतजार करना। चाहे कितना वक्त क्यों न बीत जाए। मैं आऊंगा जरूर।
दिन, महीने और साल बीतने लगे। वह सुंदरी उदास रहने लगी। फिर एक स्थानीय युवक उसकी जिंदगी में आया। दोनों में प्रेम हुआ। दोनों की शादी इसी चर्च में होनी थी। लेकिन ठीक शादी के दिन वह तुर्क वहां पहुंच गया। वह उससे अंतिम बार बात करना चाहता था। तुर्क उसे तहखाने के एक अलग कमरे में ले गया। फिर क्या हुआ किसी को नहीं मालूम।
"यूरोपीय देशों की टूरिस्ट महिलाएं सांस रोके ये कहानी सुन रही हैं। उस खूबसूरत गाइड ने नाटकीय शक्ल बनाते हुए कहानी को क्लाइमेक्स तक ले गई-"फिर वे दोनों कभी, किसी को नहीं दिखे। उन्हें साथ जाते किसी ने नहीं देखा। उन दोनों के शव भी कहीं नहीं मिले। उन दोनों का क्या हुआ ये आज तक किसी को नहीं मालूम। लेकिन प्यार में डूबे उस स्थानीय युवक ने इस टाइन चर्च की ऊंची मीनार से कूदकर जान दे दी। तब यहां पुराना चर्च हुआ करता था। वह अभिशप्त हो गया। उसी जगह यह नया चर्च बनाया गया। लेकिन उसकी आत्मा यहां आज भी भटकती है।"
मैं मुड़ कर देखता हूं चर्च के दक्षिणी कोने में एक दूसरा टूरिस्ट गाइड सिर तक काले लिबास में अपने साथ के सैलानी दस्ते को इसी तरह के झूठे-सच्चे किस्से सुना रहा है। उसके हाथ में भी एक जलती हुई लालटेन है। शायद ये यहां के टूरिस्ट गाइड का ड्रेस कोड है जो पूरे वातावरण को और दिलचस्प बनाता है।
टाइन चार्म एक चेक शब्द है जिसका अर्थ है- ईश्वर की मां का चर्च।
मैं टाइन चर्च की तरफ बढ़ जाता हूं। ये 11वीं सदी से इस महान शहर का हिस्सा है। पहले यहां विदेशी व्यापारियों के लिए एक चर्च हुआ करता था जैसा कि उस टूरिस्ट गाइड ने बताया था।
चौदहवीं सदी में इसका रूप बदलकर नया चर्च बना। इसे चर्च ऑफ ऑवर लेडी बीफोर टाइन का नाम दिया गया। टाइन चार्म एक चेक शब्द है जिसका अर्थ है- ईश्वर की मां का चर्च। ईश्वर, यहां ईसा मसीह को कहा गया है। हालांकि वे खुद को ईश्वर का बेटा कहते थे।
इसके भीतर शिशु क्राइस्ट को गोद में लिए उनकी मां वर्जिन मेरी की प्रसिद्ध प्रतिमा है। यह शायद किसी गिरजे में पत्थर की पहले पहल बनी प्रतिमा है। ये प्रतिमा दुनिया भर के अर्टिस्टों में 'मैडौना एंड चाइल्ड' के नाम से प्रसिद्ध है।
'मैडोना' इटेलियन शब्द है जिसका अर्थ है- 'मॉय लेडी।" लियोनार्डो द विंची ने भी इसका एक चित्र पन्द्रहवी सदी में बनाया। ये चर्च तकरीबन 80 मीटर ऊंचा है। दिन में इसे देखें तो लगेगा चट्टानी पत्थरों से बनी दो इमारतों को किसी ने काले रंग का ताज पहना दिया हो। गोथिक शैली में बने इस चर्च की चार छोटी -छोटी मीनारें काले पत्थरों की बनी हैं।
मीनारें प्राग वास्तुकला की पहचान हैं। चर्च के सामने ही एक ऊंचे टॉवर पर कई डायल वाली एक विशालकाय खगोलीय घड़ी लगी है। ये अद्भुत घड़ी सैलानियों के कौतुहल का केन्द्र है। कहते हैं ये घड़ी प्राग के इतिहास की गवाह है।
ये घड़ी यहां 1410 में लगी थी। इसे हनस नाम के एक घड़ीसाज ने बनाया था। कथा है, प्राग काउंसलरों को डर था कि कहीं हनस ऐसी ही घड़ी किसी और देश में न बना दे। यह शर्त पहले ही रख दी गई थी कि हनस ऐसी घड़ी कहीं और नहीं बनाएगा।
हनस ने कहा भी था कि ' मैं एक जैसी घड़ी दोबारा कभी नहीं बनाता। ये मेरा अपने से ही कमिटमेंट है, इसलिए आप लोग निश्चिंत रहें।' लेकिन काउंसलरों को यकीन नहीं था। उन्होंने कुछ किराए के अपराधी भेजकर हनस की आंखें लोहे की गर्म सलाखों से फोड़ दीं। उसकी ऊंगलियां भी काट दीं ताकि वह अपने जीवन में कोई दूसरी घड़ी न बना सके। ये एक कलाकार घड़ीसाज के लिए तकलीफदेह था।
प्राग में इस घड़ी को लेकर है अनोखी किंवदंती
कहानी कहती है कि हनस ने अपने एक शार्गिद की मदद से ये घड़ी खराब कर दी। इसकी मशीनरी कोई और नहीं समझ सकता था। नतीजतन अगले सौ साल तक घड़ी बंद पड़ी रही। बाद में एक अन्य घड़ी साज ने इसे दुरूस्त किया। सदियों के लम्बे कालखण्ड में इस ऐतिहासिक घड़ी की सुईयां कई बार थमी।
घड़ी कई दशकों तक बंद पड़ी रही। लेकिन हर बार देर सबेर उसे दुरुस्त करने के लिए कोई इंजीनियर मिल ही जाता। प्राग इस घड़ी की उपेक्षा नहीं कर सकता था। घड़ी में डायल के तीन सेट हैं, जो तीन तरह से अलग अलग वक्त बताते हैं। एक सेट मध्ययुगीन इटेलियन टाइम बताता है जिसका इस्तेमाल मध्ययुगीन चेकवासी करते थे। दूसरा सेट आधुनिक यूरोपियन टाइम का है, जो सूर्य के चढ़ने और उतरने के आधार पर एक से 24 घंटे का वक्त मापता है। तीसरा सेट बेबीलोन सभ्यता की समय गणना का है। डायल का रंग गहरा नीला है जो अनंत आसमान का प्रतीक है।
घड़ी को कुछ ऐसा डिजाइन किया गया है कि हर एक घंटे पर जीजस के प्रसिद्ध बारह धर्म प्रचारक संतों की मूर्तियां एक खिड़की से बाहर निकल कर परेड करती हुई फिर खिड़की से अंदर चली जाती हैं। यही पहली ईसवी सदी के वही 12 धर्म प्रचारक हैं, जिनका जिक्र ओल्ड टेस्टामन और कुरान में है। इन्हीं के साथ ईसा ने अपनी मृत्यु से पहले अंतिम बार भोज किया था जिसकी प्रसिद्ध पेटिंग महान चित्रकार लियोनार्डो द विंची ने 'द लास्ट सपर' के नाम से बनाई है।
प्राग में इस घड़ी को लेकर किंवदंती है कि जिस दिन इस घड़ी की उपेक्षा होगी, 12 देवदूतों की जगह एक भूत इस घड़ी की खिड़की से बाहर आएगा और ये शहर तबाह हो जाएगा। उम्मीद की अंतिम किरण सिर्फ वह नन्हा यीशु होगा, जिसने सदी के नए साल की पूर्व संध्या पर जन्म लिया है। घड़ी के इर्द-गिर्द और भी कई रहस्मय मूर्तियां हैं। हर मूर्ति की एक मध्ययुगीन कहानी है। घड़ी के किनारे के हिस्से में एक मूर्ति के साथ एक आदमकद मानव कंकाल लटका है। उस कंकाल के एक हाथ में रेत घड़ी और दूसरे हाथ में घंटी है। उसके बगल की मूर्ति हाथ में वायलन लिए एक संगीतकार की है।
प्राचीन समय में इसका इस्तेमाल जर्मनवासी करते थे। वक्त की गणना का ये दिलचस्प तरीका था। जो बारह महीने के हिसाब से तय होता था। जिसमें गर्मियों में दिन बड़े और जाड़े में दिन छोटे होते हैं। इस घड़ी में सभी ग्रह दिखाए गए हैं जो वक्त के साथ अपनी दिशा बदलते हैं। ये घड़ी ये भी बताती है महीने में चन्द्रमा कब आधा और पूर्ण होगा। हर महीना किसी न किसी राशि से जुड़ा है।
ये दुनिया की तीसरी पुरानी खगोलीय घड़ी है जो आज तक सही वक्त बता रही है। दुनिया में इससे पुरानी कोई और घड़ी नहीं बची जो चालू हालत में हो। ये घड़ी अन्य खगोलीय जानकारियों और वक्त के साथ-साथ अंतरिक्ष में सूर्य और चन्द्रमा की स्थति भी बताती है।
ये वह दौर था जब समझा जाता था कि पृथ्वी इस ब्रह्माड के केन्द्र में है। और सारे ग्रह उसे इर्द गिर्द चक्कर लागते हैं। तब तक निकोलस कापरनिक्स नहीं आया था जिसने पहली बार कहा कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। सोचता हूं हम वक्त नापने का सिर्फ एक चौबीस घंटे का आधुनिक तरीका जानते हैं जबकि उस प्राचीन युग में वक्त के पैमाने के कितने ही तरीके मौजूद थे। गलियों के किनारे बने ओपन रेस्त्रां, काफी घर और बॉर टूरिस्टों से गुलजार हैं।
चांद की रोशनी से आसमान में बादल दिख रहे हैं
गर्मियों की इस गुलाबी ठंडी रात में सैलानी ठंडी बियर और वाइन के सिप ले रहे हैं। मैं अकेला एक चेयर पर बैठ जाता हूं। अपने लिए रेड वाइन ऑर्डर करता हूं। साथ में कुछ खाने का मन है लेकिन मैन्यू कार्ड बताता है कि उनके हर व्यंजन में पोक और बीफ है। दूर चर्च के पास टूरिस्ट गाइड अपने रोचक किस्सों से सैलानियों का मन बहला रहे हैं। घड़ी का एक घंटा बजता है। उन बारह देवदूतों की परेड़ शुरू हो जाती है। रात काफी हो चली है। चांद की रोशनी से आसमान में बादल दिख रहे हैं।
ठंड बढ़ गई है। शायद बारिश होगी। मुझे अब अपने कमरे की तरफ लौटना चाहिए। पुराने शहर के इस हिस्से में न ट्रामें चलती हैं न बस। उन गलियों से दस मिनट पैदल निकलने के बाद ही कोई साधन मिलेगा। वहां से सबसे करीब अंडर ग्रांउड मेट्रो स्टेशन जरूर है। स्टेशन का नाम है-स्टारोमेस्टका। शहर के सारे बस, मेट्रो, रेलवे स्टेशनों के नाम चेक में हैं। अंग्रेजी के अक्षर मिलाकर आप इसका उच्चारण नहीं कर पाएंगे। कुछ महत्वपूर्ण स्टेशनों के नामों का उच्चारण मैंने अपने मेजबान एडम से सीख कर अपने मोबाइल नोट्स में हिंदी में दर्ज कर लिए हैं। इसलिए रास्ता पूछने में कहीं कोई दिक्कत नहीं आती।
सोचता हूं इंसान कैसे अपनी जरूरतों के हिसाब से किसी निपट अंजान देश में भी सरवाइवल का रास्ता खोज ही लेता है। मेट्रो स्टेशन पर मैं अपनी घड़ी देख रहा हूं। रात के दो बज गए हैं। मेरे देश में इस समय सुबह के छह बज रहे होंगे। वो खगोलीय घड़ी मेरे दिमाग में घूम रही है। ग्रह नक्षत्र धीमें-धीमें आगे खिसक कर वक्त के साथ अपनी जगह बदल रहे हैं। आखिर ये समय क्या है? एक शून्य से घिरे एक खाली स्पेस को हमने अपनी सहूलियत के हिसाब से काल खंडों में विभाजित कर दिया है। साल, महीने, हफ्ते, घंटे, मिनट से लेकर सेंकेंड तक। कल हम सेकेंड के टुकड़े कर लेंगे। लेकिन वक्त कभी नहीं रुकेगा।
इस अनंत ब्रह्मांड में हमारे इस वक्त की कोई हैसियत नहीं है। लेकिन हमारे लिए वह अहम है क्योंकि हमारा जीवन सीमित और उपयोगी है। इसीलिए मनुष्य ने घड़ी का आविष्कार किया। हनस ने ये अनोखी घड़ी बनाई, क्योंकि वक्त बहुत कीमती है। मुझे लगता है कि प्राग की ये मध्ययुगीन खगोलीय घड़ी दरअसल, पुनर्जन्म में यकीन न करने वाले यूरोप के समय के दर्शन की एक प्रतीक है। जो मानता है कि इस अनंत कायनात में हमारी जिन्दगी कितनी छोटी है और हम अपना वक़्त बर्बाद कर इसे और भी छोटा बना देते हैं।
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