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जनधन योजना के 6 साल: बीस करोड़ वयस्कों के लिए बैंक अब भी बहुत दूर

Fri, 28 Aug 2020 03:22 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 28 Aug 2020 03:22 PM IST
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pradhan mantri jan dhan yojana completes six years pmjdy importance significance bank accounts in india
लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2014 को विश्व की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन योजना प्रधानमंत्री जन-धन योजना (पीएमजेडीवाइ) की घोषणा कर 28 अगस्त से संपूर्ण देश में अभियान शुरू कर दिया था - फोटो : social media

औपचारिक वित्तीय या बैंकिंग सेवाओं से दूर रहने के कारण लाखों भारतीय परिवार गरीबी के चक्र में फंसे रह जाते हैं। लोग अपनी जमा पूंजी को असुरक्षित माध्यमों में रखते हैं जो कि अक्सर डूब जाती है। गरीब लोग मित्रों और रिश्तेदारों को पैसे भेजने के लिए अनौपचारिक माध्यमों का सहारा लेते हैं और जब मुश्किल पड़ती है तो पैसे के लिए महाजनों या आर्थिक बिचैलियों का रुख कर उनके चंगुल में फंस जाते हैं।

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इसीलिए लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2014 को विश्व की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन योजना प्रधानमंत्री जन-धन योजना (पीएमजेडीवाइ) की घोषणा कर 28 अगस्त से संपूर्ण देश में अभियान शुरू कर दिया था जिसके परिणामस्वरूप आज करोड़ों परिवार बैंक सेवाओं से जुड़ गए फिर भी अभी 20 प्रतिशत से अधिक वयस्कों के पास बैंक खाते नहीं हैं और जिन लोगों ने खाते खोले भी हैं उनमें से भी कुछ बंद हो गये और लगभग 19 प्रतिशत खाते निष्कृय हैं।
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विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट (फिंडेक्स-2018) में कहा है कि वर्ष 2014 में देश में केवल 53 प्रतिशत वयस्कों के पास बैंक खाते थे, जो बढ़ कर 2017 में 80 प्रतिशत तक पहुंच गए। चीन में भी 80 प्रतिशत लोगों के पास ही बैंक खाते हैं।
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विश्व बैंक ने प्रधानमंत्री जनधन योजना के माध्यम से वित्तीय समावेशन में आई तेजी का उल्लेख करते हुए फिंडेक्स रिपोर्ट में कहा है कि 2011 में देश में केवल 35 प्रतिशत वयस्कों के पास बैंक खाते थे जो कि 2017 तक 80 प्रतिशत तक पहुंच गये। मोदी जी की इस महत्वाकांक्षी योजना में बायोमीट्रिक पहचान के उपयोग से वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में सहायता मिली है।

मार्च 2017 में देश में 28.17 करोड़ जन धन खाते थे जो कि मार्च 2018 तक 31.44 करोड़ तक पहुंच गए। रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक स्तर वर्ष 2014 से लेकर 2017 तक कुल 51.4 करोड़ खाते खोले गए, जिनमें 28.17 करोड़ खाते याने कि विश्व के कुल 55 प्रतिशत खाते जन धन योजना के थे जो कि बैंक शाखाओं से बाहर विशेष कैंप लगा कर बिना अनावश्यक औपचारिकता के शून्य बैलेंस पर खोले गए।
 
19 अगस्त 2020 तक देश में प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खाताधारकों की संख्या 40.35 करोड़ तक पहुंच गई थी और इन खातों में 130701.05 करोड़ की राशि जमा थी। गरीबों की यह रकम आज राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अंग है। इनमें से 29.75 करोड़ खाताधारकों को रूपे डेविट कार्ड भी जारी हो चुके हैं।

इन खाताधारकों में 22.27 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में योजना के खाताधारकों की संख्या 26,45,447 तक पहुंच चुकी है। जिनके खातों में 1345.42 करोड़ की राशि जमा हो गई है।

केरल और गोवा में तो शतप्रतिशत आबादी खाताधारक हो गई है। जम्मू-कश्मीर जैसे अशांत रहे राज्य में ऐसे जीरो बैंलेस से खुले खातों की संख्या 23,44,505 तक पहुंच गई, जिनमें 1285.25 करोड़ की रकम जमा है और 17,75,466 खाताधारकों को रूपे डेविड कार्ड जारी हुए हैं।

इसी प्रकार अंडमान-निकोबार जैसे केंद्र शासित क्षेत्र में 48,378 जन धन खाते खुले जिनमें 30.93 करोड़ रुपये जमा हैं। सुदूर अरुणाचल जैसे राज्य में भी 3,44,876 खाते खुले और उनमें 197.42 करोड़ की जमा राशि मौजूद है।

जनधन योजना निश्चित रूप से गरीबी उन्मूलन और समावेशी विकास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण योजना है, लेकिन तमाम सरकारी दावों के बावजूद इस योजना को भी पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बैंक ऐसे खातों में पांचवी निकासी होते ही इस नो-फ्रिल खाते को नियमित खाते में बदल दे रहे हैं...

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इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश की गरीब से गरीब जनता को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना भी है - फोटो : social media

ताजा आकड़ों के अनुसार अभी तक 20 प्रतिशत वयस्क आबादी के पास बैंक खाते नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 15 जनवरी 2020 को जनधन योजना के 37.87 करोड़ खाते थे जिनमें से केवल 30.78 खाते ही सक्रिय थे। इन 19 प्रतिशत निष्कृय खातों में उत्तर प्रदेश के 23 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 25.15 प्रतिशत, तमिलनाडू के 21.95 प्रतिशत और कर्नाटक के 20.82 प्रतिशत खाते शामिल थे।

इन खातों में से 2 प्रतिशत खाते तो बंद ही हो चुके हैं, क्योंकि बिना बैलेंस के खाते रखना भी घाटे का सौदा है। मीजोरम जैसे सीमावर्ती और सुदूर जनजाति बहुल राज्य में जन धन खातों की संख्या में गिरावट की शिकायतें भी रहीं है। मीजोरम में 10 नवंबर 2016 को 3.7 लाख जन धन खाते थे जो कि 4 जनवरी 2017 को 1.8 लाख ही रह गए। 

इस महत्वपूर्ण योजना में आंकड़े बढ़ाने की हड़बड़ी में कई अन्य कमियों पर ध्यान नहीं दिया गया। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार इन ‘नो-फ्रिल’ बैंक खाता धारकों को महीने में चार बार निकासी की सीमा पार करते ही जुर्माने का सामना भी करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बैंक ऐसे खातों में पांचवी निकासी होते ही इस नो-फ्रिल खाते को नियमित खाते में बदल दे रहे हैं। नोटबंदी के दौरान ऐसे कई खातों में करोड़ों रुपए जमा हुए हैं और गरीब लोग लालच में आकर या जानकारी के अभाव में काला धन छिपाने वालों के चुगुल में फंस गए।

8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा के कुछ ही हफ्तों के अंदरी 30 नवंबर 2016 को जनधन खातों में कुल 74,322 करोड़ रुपए जमा थे जो कि 4 जनवरी 2017 तक 70,070.8 करोड़ ही रह गए।

बिजनेस स्टेंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार 8 नवंबर 2016 से लेकर 30 दिसंबर 2016 तक 3.74 जनधन खातों में 42,200 करोड़ की भारी भरकम राशि का जमा होना हो कुछ ही सप्ताह के अंदर हजारों करोड़ की रकम का निकल जाना जनधन खातों के दुरुपयोग का ही संकेत है।

कारोना महामारी के समय गरीबों को राहत देने के लिए उनके जन धन खातों में 500 रुपये की एक-एक किश्त डालने का विचार तो नेक ही था लेकिन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और दूर-दराज के दुर्गम इलाकों में यह राशि गरीबों को महंगी पड़ी।

समावेशी विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए कमजोर वर्गों को बैंकिंग सेवा से जोड़ना सदैव राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। इसी उदे्श्य से भारत सरकार ने 2011 में ‘‘स्वाभिमान’’ जैसे अभियान भी चलाए। इस अभियान के तहत 2001 की जनगणना के आधार पर 2000 से अधिक आबादी वाले 74,000 गावों को बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ा गया।

यह अभियान पहुंच और कवरेज के मामले में सीमित था। यह संपूर्ण राष्ट्र के बजाए केवल 2000 से अधिक आबादी वाले गावों तक ही सीमित था। इसमें आज की तरह बैंक खाते खोलने, डिजिटल मनी तक पहुंच, माइक्रो क्रेडिट, बीमा और पेंशन का लाभ आदि शामिल नहीं थे। यह परिवारों पर केंद्रित न होकर जनसंख्या पर केंद्रित था।

नतीजतन इससे वांछित लाभ हासिल नहीं किया जा सका। पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए प्रधानमंत्री ने भविष्य के भारत के समावेशी विकास के लिए जनधन योजना की घोषण की जो कि 28 अगस्त से देश में लागू हुई।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश की गरीब से गरीब जनता को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना भी है। मौजूदा समय में सरकार तमाम स्कीम का लाभ सीधे बैंक खाते के जरिए दे रही है। बैंक खाता होने से प्रत्येक परिवार की पहुंच बैंकिंग तथा ऋण सुविधा तक होती है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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