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देव की डायरी: देश दौड़ रहा है, बस आगे नहीं बढ़ रहा

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 05 Jun 2026 10:18 PM IST
सार

ट्रेडमिल पर दौड़ते चेट्टी जी उस समाज का प्रतीक हैं जो लगातार व्यस्त तो दिखता है, लेकिन वास्तविक बदलाव और प्रगति की दिशा में बहुत कम आगे बढ़ पाता है। जिम, प्रोटीन शेक, फिटनेस ऐप और सेल्फी के बीच यह रचना सवाल उठाती है कि क्या केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों और दिखावटी सक्रियता से देश का विकास संभव है?

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political satire on indian development vishwaguru bharat
राष्ट्र निर्माण जारी है... - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

आजकल देश में दो ही तरह के लोग बचे हैं। एक वे जो जिम जाते हैं और दूसरे वे जो कल से जाने वाले हैं। 'कल से' जाने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि यदि वे सचमुच जिम पहुंच जाएं तो देश की कई समस्याएं खुद शर्म से कम हो जाएं। सुबह पांच बजे शहर का दृश्य बडा प्रेरक होता है। सड़क पर दौडते हुए लोग दिखाई देते हैं। हवा में धूल है, धुआं है और वाहनों की महत्वाकांक्षाएं हैं। आदमी इन सबको फेफडों में भरकर जिम की ओर दौड रहा है। यह शायद दुनिया का अकेला देश है जहां लोग प्रदूषण में सांस लेने की क्षमता बढाने के लिए व्यायाम करते हैं।
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जिम हमारे समय का नया तीर्थ है। पहले लोग शरीर त्यागने के लिए तपस्या करते थे, अब शरीर दिखाने के लिए करते हैं। अंदर मशीनें लगी हैं। मशीनों को मालूम है कि उन्हें क्या करना है। मनुष्य अभी भी खोज रहा है।
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हमारे पडोसी चेट्टी जी भी इन दिनों तपस्या में लगे हुए हैं। पहले वे सिर्फ पडोसी थे। सुबह चाय पीते थे, अखबार पढते थे और देश की चिंता करते थे। अब भी देश की चिंता करते हैं, लेकिन अब जिम जाने वाले पड़ोसी हैं। पहले बाइसेप्स बनाते हैं, फिर देश के बारे में चिंता करते हैं। उनका मानना है कि कमजोर आदमी देश के बारे में क्या सोचेगा? पहले अपनी छाती तो चौडी करे। यह एक किस्म का राष्ट्र निर्माण है। इसलिए रोज सुबह छह बजे उठकर जिम जाते हैं।  
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मैंने एक दिन पूछा, "चेट्टी जी, इस उम्र में इतनी मेहनत?"
बोले, "देश के लिए।"
मैंने कहा, "देश को क्या जरूरत पड गई?"
बोले, "देश को नहीं, मुझे पड गई है। लेकिन आजकल अपनी हर चीज को देश से जोड दो तो उसका महत्व बढ जाता है।"
बात में वजन था। लगभग उतना ही, जितना वे इन दिनों उठाने लगे हैं।

पहले दिन जिम जाकर उन्होंने सबसे पहले अपनी एक तस्वीर खिंचवाई थी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। उसके बाद तपस्या शुरू की। हमारे समय का आदमी पसीना कम बहाता है, पसीने की पोस्ट ज्यादा डालता है। चेट्टी जी अक्सर बताते हैं कि जिम में बहुत त्याग करना पडता है। मैंने देखा, त्याग सचमुच कठिन है। जिम में एक घंटा बिताने के बाद वे घर लौटे और सीधे रसोई में घुस गए,"चार परांठे देना।" पत्नी ने कहा, "डाक्टर ने दो कहे हैं।"
 
चेट्टी जी बोले, "डाक्टर ने जिम जाने को भी नहीं कहा था। आदमी कुछ अपने विवेक से भी करता है।"
मुझे लगा, यह तर्क भारतीय लोकतंत्र की कई समस्याओं का समाधान कर सकता है।
मैंने पूछा, "अभी तो कैलोरी जलाई थीं?"
बोले, "नई कैलोरी भी तो आनी चाहिए। व्यवस्था में प्रवाह बना रहना चाहिए।"
चेट्टी जी की सोच दूरदर्शी है। वे मानते हैं कि शरीर भी एक व्यवस्था है। उसमें उत्पादन भी होना चाहिए और खपत भी। केवल उत्पादन से मंदी आ जाती है।

फिर कैलोरी और घी के बीच वार्ता शुरू हुई। कोई किसी को पूरी तरह हराना नहीं चाहता था। यह व्यवस्था मुझे लोकतांत्रिक लगी। एक घंटे में जो कैलोरी जलाई गई थी, उसे दस मिनट में पुनर्वास पैकेज के तहत वापस बसा दिया गया। चेट्टी जी कहते हैं, "देखिए, शरीर को कष्ट दिया है तो मुआवजा भी देना पडेगा। लोकतंत्र में त्याग एकतरफा नहीं होता। जिम जाना अगर कर्तव्य है तो परांठा खाना मौलिक अधिकार है।"

मुझे लगता है कि संविधान सभा को इस विषय पर पर्याप्त विचार करना चाहिए था। हम सुबह इसलिए नहीं भागते कि स्वस्थ रहें। हम इसलिए भागते हैं कि शाम को समोसा खाते समय आत्मा अदालत में गवाही न दे। हम वजन कम नहीं करते, खाने के लिए जगह खाली करते हैं। यह पेट और अंतरात्मा के बीच हुआ एक ऐतिहासिक समझौता है। शरीर अब सरकारी दफ्तर की तरह हो गया है। सुबह दबाव डालिए, शाम को कुछ खिलाइए, काम चलता रहेगा। और राष्ट्र निर्माण? वह पूरे तो जोर शोर से जारी है। मेरे पडोसी चेट्टी जी की सबसे बडी उपलब्धि यह है कि वे ट्रेडमिल पर रोज पांच किलोमीटर दौडते हैं। पांच दिन से दौड रहे हैं। अभी तक वहीं हैं। ट्रेडमिल भी वहीं है।

मैंने कहा, "कुछ आगे बढने का विचार है?" बोले, "देश में कौन आगे बढ रहा है? सब अपनी अपनी ट्रेडमिल पर दौड रहे हैं।" उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। मेरे मोहल्ले में ढेर सारे 'चेट्टी जी' हैं। आपको भी अपने मोहल्ले में मिल जाएंगे।


अब हाल यह है कि सुबह और शाम पार्कों और जिमों में मुझे राष्ट्र निर्माण का विराट दृश्य दिखाई देता है। कोई पेट घटा रहा है। कोई कमर नाप रहा है। कोई सेल्फी ले रहा है। कोई प्रोटीन शेक पी रहा है। और सबको विश्वास है कि वे देश को बेहतर बना रहे हैं। एक हाथ में डम्बल है, दूसरे हाथ में परांठा। कंधे पर प्रोटीन पाउडर है और जेब में गैस की दवा। फेफडों में प्रदूषण है, मोबाइल में फिटनेस ऐप है और चेहरे पर आत्मविश्वास कि देश सही दिशा में जा रहा है। हम जैसे मध्यमवर्ग को पूरा भरोसा है कि जिस दिन घी और प्रोटीन पाउडर मिलकर आत्मनिर्भर हो जाएंगे, उस दिन भारत सचमुच विश्वगुरु बन जाएगा। तब तक राष्ट्र निर्माण जारी रहे, ऐसा विचार है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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