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कानों देखी: माल्या जी दोनों हाथों में खेल रहे
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Updated Mon, 17 Sep 2018 04:31 PM IST
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माल्या जी दोनों हाथों में खेल रहे
भारतीय राजनीति की विडंबना और राजनीतिक नेताओं की कमजोरी हमेशा खेलबाजों के हाथ की कठपुतली बन जाती है। विजय माल्या जी फिलहाल इसका भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। ढाई साल से भगोड़े की जिंदगी जी रहे विजय माल्या की हाल में उम्मीदों को नया पंख लग चुका है। ऐशो-आराम की लत के मालिक माल्या ने देश में रखकर सिस्टम का भरपूर लाभ लिया। शानदार अय्याशी से भरा कलेंडर, बेटे के जन्मदिन पर किंगफिशर एयरलाइंस का गिफ्ट, संसद सदस्यों को शानदार केस में नायाब तरह का लिक्विड का तोहफा, बिजनेस क्लास के टिकट सब उनके नामदार होते जाने के लिए अपनाए गए नमूने रहे। इसी की बिनाह पर वह लोन पर लोन, दर लोन लेकर घी पीते रहे। अब माल्या की लुक आऊट नोटिस का चिट्ठा खुल रहा है। लंदन की अदालत में भारतीय बैंक और राजनेताओं की कारस्तानी खुल रही है। दिल्ली में हमने ही नहीं तुमने भी मदद का खेल खुल रहा है। रायसीना हिल्स का यह तापमान देखकर माल्या के देश में पैरोकारों को अब सब कुछ उम्मीद के अनुसार लग रहा है। वहीं ऐजेंसी के अधिकारियों के होठ सिले हुए हैं। शानदार चुप्पी छाई है। कुछ नया अवसर पाने के खेल में व्यस्त हैं और कुछ आगे की राह बना रहे हैं। मानना यही है कि 2019 के प्रस्तावित लोकसभा चुनाव से पहले माल्या के भारत आने की फिलहाल संभावना बस चर्चा के बराबर है।
फूट डालो, राज करो
अंग्रेज इस कूटनीति को पहले सिखा गए हैं। उनके जाने के बाद भारतीय राजनीति से लेकर हर स्तर पर इसका अच्छा खासा प्रयोग हुआ। भाजपा के मौजूदा रणनीतिकारों की टीम भी इसे करीब से समझ रही है। समझ ही नहीं रही है, बल्कि महसूस भी कर रही है। बताते हैं इसी रणनीति से समाजवादी पार्टी कुनबे का कबाड़ा कर दिया। लोगों को तब यह बात तेजी से समझ में आई, जब प्रधानमंत्री जी ने खुद अपने एक कार्यक्रम में अमर सिंह का नाम ले लिया। नाम लिए जाने के बाद से ही अमर सिंह हरकत में आ गए। भाजपा को उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक तौर पर लोगों की कुंडली मिलाने वाला सूत्रधार मिल गया है। इतना ही नहीं अब तो शिवपाल सिंह यादव की नई पार्टी बन गई है। यह पार्टी बनते ही अखिलेश यादव का महागठबंधन की बारगेन संभावना में वजन भी कम होने लगा है। रालोद के चौधरी अजीत सिंह थोड़ा अश्वस्त जरूर चल रहे हैं, लेकिन राजनीति की बिसात पर बिछ रहे सभी मोहरों को समझ रहे हैं। इस गाड़ी का यही आखिरी रेलवे स्टेशन तो है नहीं। अभी हाल में भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण छूट गए हैं। बसपा की मायावती आने वाले पैंतरे को बखूबी समझ रही हैं। तेलंगाना में चंद्र शेखर राव और केटीआर, आंध्र प्रदेश में चंद्र बाबू नायडू, जगन मोहन रेड्डी, ओड़ीसा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में ओपीएसईपीएस, डीमके के अलागिरी सच पूछिए तो संभावनाएं अपार हैं। महागठबंधन की कोशिश भी चल रही है, लेकिन नया प्रयोग भी तरीके से अपना काम कर रहा है।
वसुंधरा जी समझिए
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को रेगिस्तान के जहाज ऊंट की सही ऊंचाई थोड़ा समझ में आने लगी है। दिन में गरम और शाम होते ही ठंडी तासीर वाले जयपुर समेत आधे राजस्थान के मिजाज को भाजपा अध्यक्ष धीरे-धीरे बताने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। राजस्थान में एंटी वसुंधरा वेव है, लेकिन इसकी तुलना में एंटी मोदी वेव नहीं है। वसुंधरा के पार्टी में विरोधियों की कमी नहीं है, लेकिन सब मोदी -शाह की भाजपा के नीचे उम्मीद के साथ ठंडक महसूस कर रहे हैं। ऐसे में शाह यह समझाने में सफल हो रहे हैं कि पहले सत्ता में आओ। मिलकर आओ। सत्ता में रहने पर ही कुछ हो सकेगा, होमगार्ड भी सैल्यूट मारेगा। यह प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और टीम वसुंधरा की मेहनत से ही संभव है। बताते हैं राख के नीचे तो आग लंबे समय तक जिंदा रहती है। भाजपा का वसुंधरा विरोधी खेमा इसे बखूबी समझ रहा है। वसुंधरा जी को भी पता है। इसलिए आगे की लाइन तय करने के लिए वसुंधरा का रह-रहकर विरोध भी जरूरी है। मानवेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी, घनश्याम तिवाड़ी का कुनबा, भैरो सिंह शेखावत की लिगेसी उठाने वाले लोग, लोकेन्द्र सिंह कलवी जैसे शख्स, गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल....ओम माथुर...यह सूची भी कोई छोटी सी तो है नहीं।
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भारतीय राजनीति की विडंबना और राजनीतिक नेताओं की कमजोरी हमेशा खेलबाजों के हाथ की कठपुतली बन जाती है। विजय माल्या जी फिलहाल इसका भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। ढाई साल से भगोड़े की जिंदगी जी रहे विजय माल्या की हाल में उम्मीदों को नया पंख लग चुका है। ऐशो-आराम की लत के मालिक माल्या ने देश में रखकर सिस्टम का भरपूर लाभ लिया। शानदार अय्याशी से भरा कलेंडर, बेटे के जन्मदिन पर किंगफिशर एयरलाइंस का गिफ्ट, संसद सदस्यों को शानदार केस में नायाब तरह का लिक्विड का तोहफा, बिजनेस क्लास के टिकट सब उनके नामदार होते जाने के लिए अपनाए गए नमूने रहे। इसी की बिनाह पर वह लोन पर लोन, दर लोन लेकर घी पीते रहे। अब माल्या की लुक आऊट नोटिस का चिट्ठा खुल रहा है। लंदन की अदालत में भारतीय बैंक और राजनेताओं की कारस्तानी खुल रही है। दिल्ली में हमने ही नहीं तुमने भी मदद का खेल खुल रहा है। रायसीना हिल्स का यह तापमान देखकर माल्या के देश में पैरोकारों को अब सब कुछ उम्मीद के अनुसार लग रहा है। वहीं ऐजेंसी के अधिकारियों के होठ सिले हुए हैं। शानदार चुप्पी छाई है। कुछ नया अवसर पाने के खेल में व्यस्त हैं और कुछ आगे की राह बना रहे हैं। मानना यही है कि 2019 के प्रस्तावित लोकसभा चुनाव से पहले माल्या के भारत आने की फिलहाल संभावना बस चर्चा के बराबर है।
फूट डालो, राज करो
अंग्रेज इस कूटनीति को पहले सिखा गए हैं। उनके जाने के बाद भारतीय राजनीति से लेकर हर स्तर पर इसका अच्छा खासा प्रयोग हुआ। भाजपा के मौजूदा रणनीतिकारों की टीम भी इसे करीब से समझ रही है। समझ ही नहीं रही है, बल्कि महसूस भी कर रही है। बताते हैं इसी रणनीति से समाजवादी पार्टी कुनबे का कबाड़ा कर दिया। लोगों को तब यह बात तेजी से समझ में आई, जब प्रधानमंत्री जी ने खुद अपने एक कार्यक्रम में अमर सिंह का नाम ले लिया। नाम लिए जाने के बाद से ही अमर सिंह हरकत में आ गए। भाजपा को उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक तौर पर लोगों की कुंडली मिलाने वाला सूत्रधार मिल गया है। इतना ही नहीं अब तो शिवपाल सिंह यादव की नई पार्टी बन गई है। यह पार्टी बनते ही अखिलेश यादव का महागठबंधन की बारगेन संभावना में वजन भी कम होने लगा है। रालोद के चौधरी अजीत सिंह थोड़ा अश्वस्त जरूर चल रहे हैं, लेकिन राजनीति की बिसात पर बिछ रहे सभी मोहरों को समझ रहे हैं। इस गाड़ी का यही आखिरी रेलवे स्टेशन तो है नहीं। अभी हाल में भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण छूट गए हैं। बसपा की मायावती आने वाले पैंतरे को बखूबी समझ रही हैं। तेलंगाना में चंद्र शेखर राव और केटीआर, आंध्र प्रदेश में चंद्र बाबू नायडू, जगन मोहन रेड्डी, ओड़ीसा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में ओपीएसईपीएस, डीमके के अलागिरी सच पूछिए तो संभावनाएं अपार हैं। महागठबंधन की कोशिश भी चल रही है, लेकिन नया प्रयोग भी तरीके से अपना काम कर रहा है।
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वसुंधरा जी समझिए
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को रेगिस्तान के जहाज ऊंट की सही ऊंचाई थोड़ा समझ में आने लगी है। दिन में गरम और शाम होते ही ठंडी तासीर वाले जयपुर समेत आधे राजस्थान के मिजाज को भाजपा अध्यक्ष धीरे-धीरे बताने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। राजस्थान में एंटी वसुंधरा वेव है, लेकिन इसकी तुलना में एंटी मोदी वेव नहीं है। वसुंधरा के पार्टी में विरोधियों की कमी नहीं है, लेकिन सब मोदी -शाह की भाजपा के नीचे उम्मीद के साथ ठंडक महसूस कर रहे हैं। ऐसे में शाह यह समझाने में सफल हो रहे हैं कि पहले सत्ता में आओ। मिलकर आओ। सत्ता में रहने पर ही कुछ हो सकेगा, होमगार्ड भी सैल्यूट मारेगा। यह प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और टीम वसुंधरा की मेहनत से ही संभव है। बताते हैं राख के नीचे तो आग लंबे समय तक जिंदा रहती है। भाजपा का वसुंधरा विरोधी खेमा इसे बखूबी समझ रहा है। वसुंधरा जी को भी पता है। इसलिए आगे की लाइन तय करने के लिए वसुंधरा का रह-रहकर विरोध भी जरूरी है। मानवेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी, घनश्याम तिवाड़ी का कुनबा, भैरो सिंह शेखावत की लिगेसी उठाने वाले लोग, लोकेन्द्र सिंह कलवी जैसे शख्स, गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल....ओम माथुर...यह सूची भी कोई छोटी सी तो है नहीं।
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narendra modi
फूलकर गोलगप्पा क्यों हो रही है कांग्रेस
यह बात कांग्रेस के पुराने गढ़बाज कांग्रेसियों को जरा कम समझ में आ रही है। उन्हें पता नहीं है कि उन्हें हाशिए पर रखकर चल रही उनकी पार्टी इन दिनों फूलकर गोलगप्पा क्यों हुई जा रही है? एक पुराने महासचिव का कहना है कि वह जो देख पा रहे हैं, अच्छा नहीं है। कांग्रेस एक रणनीतिक भूल की तरफ बढ़ रही है। पार्टी के नेता मानकर चल रहे हैं कि देश में मोदी सरकार का विरोध बढ़ रहा है। राहुल गांधी की छवि ठीक हो रही है और एंटी मोदी वेव तेजी से बन रही है। कांग्रेस के आधुनिक मंच पर सजे नेताओं की अपना नंबर बढ़ाने वाली एक जमात लगातार इस उत्साह से कांग्रेस अध्यक्ष को लबरेज कर रही है कि सारा मोदी विरोध कांग्रेस के ही खाते में गिरने वाला है। इसलिए 2019 चुनाव के बाद शपथ ग्रहण के लिए नये कुर्ते सिलवा लिए जाएं। सूत्र का कहना है कि यह कोटरी कांग्रेस के माथे को पगड़ी की तरह ढंकती जा रही है। ऐसे में पार्टी का अंदरुनी झमेला बढ़ेगा। इन सबकी (पुराने नेता) परेशानी यह भी है कि इस रणनीतिक भूल का असर महागठबंधन जैसी संभावना पर पड़ना तय है। प्रधानमंत्री मोदी जी अब भी प्रधानमंत्री पद के सबसे लोकप्रिय नेता में बने हुए हैं। ऐसे में इसकी पूरी संभावना मौजूद है कि हम साथ आएं, ठीक से न आएं और अंत में ताकते रह जाएं। दुविधा यह है कि सोनिया गांधी का दफ्तर ऐन-केन मौकों पर खबर ले लेता है, लेकिन सोनिया जी कुछ ,सुनती नहीं। राहुल जी को काम के बोझ से फुरसत ही नहीं है।
ठोको, बजाओ तब आगे बढ़ो
एक मिट्टी की हांडी बिना ठोके बजाए नहीं ली जाती। बसपा की प्रमुख मायावती इसे शिद्दत से समझती हैं। इसलिए वह महागठबंधन को लेकर फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं। वह किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। राजनीति और दबाव की राजनीति का खेल सीखकर मैच्योर हो चुकी मायावती को पता है कि समय सबसे अच्छा समाधान लेकर आता है। इसलिए वह किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। न राष्ट्रीय स्तर के महागठबंधन के मामले में और न ही अपनी गोल्डन चाबी उ.प्र. के बारे में। इसलिए अभी वह राज्यों में पार्टी के गठबंधन की तस्वीर चमका रही हैं। बताते हैं कांग्रेस के नेताओं को भी उन्होंने नवंबर के बाद राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ का समय समझा रखा है। तबतक चार राज्यों के चुनाव नतीजे आ जाएंगे। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि तब तक जांच एजेंसियों का असर भी कम हो जाएगा। ठीक ही है। क्योंकि तब तक समाजवादी पार्टी की कुछ बारगेनिंग पावर घट जाएगी। तब तक राहुल गांधी की छवि भी थोड़ी बन सकती है और कांग्रेस का ग्राफ भी अच्छा हो सकता है। यानी संसद के शीतकालीन सत्र तक होमवर्क हो जाएगा।
एक धक्का और दो...
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी फिलहाल खुश हैं। उनकी खुशी का कारण भी है। मोदी सरकार उनके तीखे आरोपों, सवालों पर तिलमिला भी रही है और कुछ बोल भी नहीं पा रही है। भाजपा के नेता, मंत्री, प्रवक्ता अजब-गजब बयान देकर आरोप लगा रहे हैं। एक खुशी यह भी है कि राहुल गांधी के पास एक चैंपियन प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला, चतुर सलाहकार अशोक गहलोत हैं। शरद पवार के पास वह गाहे-बेगाहे राजनीति का गुर सीखने जाते रहते हैं। उनकी टीम के लोगों को लग रहा है कि पार्टी के आंतरिक समाधान को कांग्रेस अध्यक्ष ने साध लिया है। कमलनाथ, ज्योतिरादित्य, दिग्विजय सिंह को म.प्र. में सीपी जोशी, गिरजा व्यास, सचिन पायलट राजस्थान में, भूपेन्द्र हु्डा, अशोक तंवर, कु. शैलजा, रणदीप सुरजेवाला को हरियाणा में अपने-अपने राज्य में एकजुट होकर पूरा ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंप दी है। कांग्रेस मुख्यालय में भी काफी कुछ ठीक कर दिया है। खुद भी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दस दिन समय देने की रणनीति बना रहे हैं तो प्रचार के लिए रोड शो, जनता के बीच बैठक, संपर्क अभियान, सोशल मीडिया समेत सारे प्रयोग अपनाने की रणनीति बना रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अब बस बारी मोदी सरकार को एक धक्का और देने की है।
बस एक मंत्र राजकोषीय घाटा
मध्यवर्ग, किसान पेट्रोल-डीजल के बढ़ रहे दाम समेत अन्य दुश्वारियों से पकौड़े की तरह तलकर दोहरा हुआ जा रहा है, लेकिन मोदी सरकार अपने मंत्र को मूल मानकर चल रही है। सरकार वित्तीय घाटे के लक्ष्य को 3.3 प्रतिशत तक बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखना मूल मंत्र में है। ऐसा करके मोदी सरकार देश के हित में कड़े फैसले लेने से न हिचकने का संदेश देने की राजनीतिक लड़ाई लड़ रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली की यह राय प्रधानमंत्री मोदी को भी ठीक लग रही है। धर्मेन्द्र प्रधान समेत अन्य मंत्री इसी मंत्र का अनुसरण करते हुए लगातार बताने में लगे हैं कि पेट्रोल डीजल से होने वाली आमदनी सरकार गरीबों और विकास पर खर्च कर रही है। यह तब है जब संघ भी लगातार पेट्रोल डीजल की कीमत पर काबू पाने की सलाह दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में तमाम चिंताओं के बाद भी उन्होंने इसी मंत्र पर आगे रकने में सहमति जताई। इससे कुछ केन्द्रीय मंत्री बाद में चिंतित नजर आए, लेकिन......सब चल रहा है। भाजपा में मोदीनॉमिक्स की वकालत करने वाले एक रणनीतिकार का कहना है कि आप इसका असर तो देखिए। नोटबंदी के नतीजे का नकारात्मक असर कम हो रहा है। साढ़े चार साल की सरकार के बाद प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कोई खास गिरावट नहीं नजर आ रही है। सूत्र सरकार विरोधी वेव के बनने से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले सब ठीक हो जाएगा। यह भरोसा उन्हें ही नहीं सबकुछ ठीक करने की सोच रखने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी है।
जहां से चले थे, वहीं अटक गए
मुलायम सिंह यादव ने जीवन में राजनीति ही की। जमकर की। कांट-छांट के महारथी मुलायम अब बढ़ती उम्र खराब स्वास्थ्य के आगे पस्त हैं। पस्त मुलायम के सामने चुनौतियां उम्र और सुस्ती से कई गुणा बड़ी है। कांग्रेस का साथ मुलायम को पसंद नहीं है, लेकिन साथ मजबूरी है। बसपा और समाजवादी पार्टी का मेल चीनी और नमक के खट्टे-मीठे शरबत जैसा है। समय के साथ अमर सिंह नई नाव पर सवार हैं। अमर सिंह मुलायम सिंह के बारे में कहा करते हैं कि उनके दिल में कुछ, दिमाग में कुछ और मन में कुछ और रहता है। कभी का सहारा रहे शिव पाल सिंह यादव उनका सम्मान करते हुए अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। चचेरे भाई राम गोपाल की अपनी दुविधा है। सबकुछ सोच-समझकर ही मुलायम सिंह ने 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले नई पार्टी का गठन नहीं होने दिया था, लेकिन अब यह भी नई मजबूरी बन रही है। एक संक्षिप्त मुलाकात में नेता जी की आंखो में दर्द तो दिखा, लेकिन होंठ कुछ बुदबुदा न पाए। आम तौर पर बोलने को लेकर मुलायम का नियंत्रण काफी अच्छा रहता है। वह राजनीतिक मामलों में तोल-मोलकर बोलते हैं। विरोधियों को भी बुरा नहीं कहते। लेकिन साधकों को भी साध लेने की क्षमता में माहिर मुलायम सिंह यादव को देखकर लगता है कि वह पार्टी, परिवार और राजनीतिक स्थिति के इसी दर्द को नहीं पचा पा रहे हैं। रह-रहकर दर्द छलक आता है। करीबी बताते हैं कि इस समय नेता जी नई भूमिका में हैं। सब ठीक रहा तो फिर कुछ बोलेंगे, अपना रुतबा दिखाएंगे।
यह बात कांग्रेस के पुराने गढ़बाज कांग्रेसियों को जरा कम समझ में आ रही है। उन्हें पता नहीं है कि उन्हें हाशिए पर रखकर चल रही उनकी पार्टी इन दिनों फूलकर गोलगप्पा क्यों हुई जा रही है? एक पुराने महासचिव का कहना है कि वह जो देख पा रहे हैं, अच्छा नहीं है। कांग्रेस एक रणनीतिक भूल की तरफ बढ़ रही है। पार्टी के नेता मानकर चल रहे हैं कि देश में मोदी सरकार का विरोध बढ़ रहा है। राहुल गांधी की छवि ठीक हो रही है और एंटी मोदी वेव तेजी से बन रही है। कांग्रेस के आधुनिक मंच पर सजे नेताओं की अपना नंबर बढ़ाने वाली एक जमात लगातार इस उत्साह से कांग्रेस अध्यक्ष को लबरेज कर रही है कि सारा मोदी विरोध कांग्रेस के ही खाते में गिरने वाला है। इसलिए 2019 चुनाव के बाद शपथ ग्रहण के लिए नये कुर्ते सिलवा लिए जाएं। सूत्र का कहना है कि यह कोटरी कांग्रेस के माथे को पगड़ी की तरह ढंकती जा रही है। ऐसे में पार्टी का अंदरुनी झमेला बढ़ेगा। इन सबकी (पुराने नेता) परेशानी यह भी है कि इस रणनीतिक भूल का असर महागठबंधन जैसी संभावना पर पड़ना तय है। प्रधानमंत्री मोदी जी अब भी प्रधानमंत्री पद के सबसे लोकप्रिय नेता में बने हुए हैं। ऐसे में इसकी पूरी संभावना मौजूद है कि हम साथ आएं, ठीक से न आएं और अंत में ताकते रह जाएं। दुविधा यह है कि सोनिया गांधी का दफ्तर ऐन-केन मौकों पर खबर ले लेता है, लेकिन सोनिया जी कुछ ,सुनती नहीं। राहुल जी को काम के बोझ से फुरसत ही नहीं है।
ठोको, बजाओ तब आगे बढ़ो
एक मिट्टी की हांडी बिना ठोके बजाए नहीं ली जाती। बसपा की प्रमुख मायावती इसे शिद्दत से समझती हैं। इसलिए वह महागठबंधन को लेकर फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं। वह किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। राजनीति और दबाव की राजनीति का खेल सीखकर मैच्योर हो चुकी मायावती को पता है कि समय सबसे अच्छा समाधान लेकर आता है। इसलिए वह किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। न राष्ट्रीय स्तर के महागठबंधन के मामले में और न ही अपनी गोल्डन चाबी उ.प्र. के बारे में। इसलिए अभी वह राज्यों में पार्टी के गठबंधन की तस्वीर चमका रही हैं। बताते हैं कांग्रेस के नेताओं को भी उन्होंने नवंबर के बाद राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ का समय समझा रखा है। तबतक चार राज्यों के चुनाव नतीजे आ जाएंगे। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि तब तक जांच एजेंसियों का असर भी कम हो जाएगा। ठीक ही है। क्योंकि तब तक समाजवादी पार्टी की कुछ बारगेनिंग पावर घट जाएगी। तब तक राहुल गांधी की छवि भी थोड़ी बन सकती है और कांग्रेस का ग्राफ भी अच्छा हो सकता है। यानी संसद के शीतकालीन सत्र तक होमवर्क हो जाएगा।
एक धक्का और दो...
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी फिलहाल खुश हैं। उनकी खुशी का कारण भी है। मोदी सरकार उनके तीखे आरोपों, सवालों पर तिलमिला भी रही है और कुछ बोल भी नहीं पा रही है। भाजपा के नेता, मंत्री, प्रवक्ता अजब-गजब बयान देकर आरोप लगा रहे हैं। एक खुशी यह भी है कि राहुल गांधी के पास एक चैंपियन प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला, चतुर सलाहकार अशोक गहलोत हैं। शरद पवार के पास वह गाहे-बेगाहे राजनीति का गुर सीखने जाते रहते हैं। उनकी टीम के लोगों को लग रहा है कि पार्टी के आंतरिक समाधान को कांग्रेस अध्यक्ष ने साध लिया है। कमलनाथ, ज्योतिरादित्य, दिग्विजय सिंह को म.प्र. में सीपी जोशी, गिरजा व्यास, सचिन पायलट राजस्थान में, भूपेन्द्र हु्डा, अशोक तंवर, कु. शैलजा, रणदीप सुरजेवाला को हरियाणा में अपने-अपने राज्य में एकजुट होकर पूरा ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंप दी है। कांग्रेस मुख्यालय में भी काफी कुछ ठीक कर दिया है। खुद भी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दस दिन समय देने की रणनीति बना रहे हैं तो प्रचार के लिए रोड शो, जनता के बीच बैठक, संपर्क अभियान, सोशल मीडिया समेत सारे प्रयोग अपनाने की रणनीति बना रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अब बस बारी मोदी सरकार को एक धक्का और देने की है।
बस एक मंत्र राजकोषीय घाटा
मध्यवर्ग, किसान पेट्रोल-डीजल के बढ़ रहे दाम समेत अन्य दुश्वारियों से पकौड़े की तरह तलकर दोहरा हुआ जा रहा है, लेकिन मोदी सरकार अपने मंत्र को मूल मानकर चल रही है। सरकार वित्तीय घाटे के लक्ष्य को 3.3 प्रतिशत तक बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखना मूल मंत्र में है। ऐसा करके मोदी सरकार देश के हित में कड़े फैसले लेने से न हिचकने का संदेश देने की राजनीतिक लड़ाई लड़ रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली की यह राय प्रधानमंत्री मोदी को भी ठीक लग रही है। धर्मेन्द्र प्रधान समेत अन्य मंत्री इसी मंत्र का अनुसरण करते हुए लगातार बताने में लगे हैं कि पेट्रोल डीजल से होने वाली आमदनी सरकार गरीबों और विकास पर खर्च कर रही है। यह तब है जब संघ भी लगातार पेट्रोल डीजल की कीमत पर काबू पाने की सलाह दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में तमाम चिंताओं के बाद भी उन्होंने इसी मंत्र पर आगे रकने में सहमति जताई। इससे कुछ केन्द्रीय मंत्री बाद में चिंतित नजर आए, लेकिन......सब चल रहा है। भाजपा में मोदीनॉमिक्स की वकालत करने वाले एक रणनीतिकार का कहना है कि आप इसका असर तो देखिए। नोटबंदी के नतीजे का नकारात्मक असर कम हो रहा है। साढ़े चार साल की सरकार के बाद प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कोई खास गिरावट नहीं नजर आ रही है। सूत्र सरकार विरोधी वेव के बनने से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले सब ठीक हो जाएगा। यह भरोसा उन्हें ही नहीं सबकुछ ठीक करने की सोच रखने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी है।
जहां से चले थे, वहीं अटक गए
मुलायम सिंह यादव ने जीवन में राजनीति ही की। जमकर की। कांट-छांट के महारथी मुलायम अब बढ़ती उम्र खराब स्वास्थ्य के आगे पस्त हैं। पस्त मुलायम के सामने चुनौतियां उम्र और सुस्ती से कई गुणा बड़ी है। कांग्रेस का साथ मुलायम को पसंद नहीं है, लेकिन साथ मजबूरी है। बसपा और समाजवादी पार्टी का मेल चीनी और नमक के खट्टे-मीठे शरबत जैसा है। समय के साथ अमर सिंह नई नाव पर सवार हैं। अमर सिंह मुलायम सिंह के बारे में कहा करते हैं कि उनके दिल में कुछ, दिमाग में कुछ और मन में कुछ और रहता है। कभी का सहारा रहे शिव पाल सिंह यादव उनका सम्मान करते हुए अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। चचेरे भाई राम गोपाल की अपनी दुविधा है। सबकुछ सोच-समझकर ही मुलायम सिंह ने 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले नई पार्टी का गठन नहीं होने दिया था, लेकिन अब यह भी नई मजबूरी बन रही है। एक संक्षिप्त मुलाकात में नेता जी की आंखो में दर्द तो दिखा, लेकिन होंठ कुछ बुदबुदा न पाए। आम तौर पर बोलने को लेकर मुलायम का नियंत्रण काफी अच्छा रहता है। वह राजनीतिक मामलों में तोल-मोलकर बोलते हैं। विरोधियों को भी बुरा नहीं कहते। लेकिन साधकों को भी साध लेने की क्षमता में माहिर मुलायम सिंह यादव को देखकर लगता है कि वह पार्टी, परिवार और राजनीतिक स्थिति के इसी दर्द को नहीं पचा पा रहे हैं। रह-रहकर दर्द छलक आता है। करीबी बताते हैं कि इस समय नेता जी नई भूमिका में हैं। सब ठीक रहा तो फिर कुछ बोलेंगे, अपना रुतबा दिखाएंगे।