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भारत के इस कदम से बेचैन हुआ चीन, टेंशन में ड्रैगन की रेड आर्मी

Wed, 26 Dec 2018 04:23 PM IST
Prabhunath Shukla प्रभुनाथ शुक्ल
Updated Wed, 26 Dec 2018 04:23 PM IST
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pm modi inaugurates bogibeel bridge in north east power of indian army china alert
यह देश का सबसे चौड़ा पुल है। पूर्वोंत्तर भारत के विकास एवं राष्ट्र की सुरक्षा के लिहाज से यह सबसे अहम कड़ी माना जा रहा है। - फोटो : File Photo

भारत की सामरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम बोगीबील सेतु को लंबी प्रतीक्षा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसम्बर यानी अटल जी के जन्म दिवस पर देश को सौंप दिया। इसके साथ ही देश के विकास में एक और नया इतिहास जुड़ गया है। आसाम के डिब्रूगढ़ जिले में ब्रहमपुत्र नदी पर बने इस सेतु से अरुणांचल प्रदेश की दूरी रेल और सड़क मार्ग से बेहद कम हो जाएगी। एशिया का यह दूसरा सबसे बड़ा रेलरोड ब्रिज होगा, जिसमें पुल के उपरी हिस्से में तीन लेन की सड़क और नीचे डबल रेल ट्रैक होगा। पीएम मोदी पहली रेलगाड़ी को हरीझड़ी दिखा कर रवाना किया। इसके पूर्व मालगाड़ी चलाकर रेलपथ का परीक्षण किया गया था। 

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क्या है इस पुल की खासियत 
यह देश का सबसे चौड़ा पुल है। पूर्वोंत्तर भारत के विकास एवं राष्ट्र की सुरक्षा के लिहाज से यह सबसे अहम कड़ी माना जा रहा है। देश की सामरिक सुरक्षा के लिहाज से इसका निर्माण बेहद पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन हमारी सरकारी नीतियों की वजह से 21 साल बाद यह संभव हो पाया। यह भी एक चिंता का विषय है, जबकि यह प्राथमिकता में होना चाहिए।
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भारत का सबसे बड़ा दुश्मन चीन हमेशा अरुणांचल पर अपने दावे ठोंकता रहता है। चीनी फौज कितनी बार अरुणांचल की सीमा में घुसकर अपनी ताकत दिखाती रहती है। 1962 में चीन से हमारी पराजय का मुख्य कारण सैन्य पहुंच और उससे जुड़ी समस्याएं थी। पुल के निर्माण से चीन की नींद उड़ गई है, क्योंकि चीन के साथ भारत की 4,000 हजार किलोमीटर की सीमा हैं, जिसका 75 फीसदी हिस्सा अरुणांचल प्रदेश में पड़ता है। सेतु के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह सिर्फ सेतु नहीं पूर्वोतर भारत की लाइफ लाइन है। लेकिन एक बात हमें बार-बार कचोटती है कि सामरिक महत्व के मसलों पर हम कुम्भकर्णी नींद से कब जागेंगे।
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देवगौड़ा सरकार में मिली थी मंजूरी 
दिल्ली में जब एचडी देवगौड़ा की सरकार थी तो उसी दौरान 1997 में इसकी मंजूरी मिली थी। जबकि निर्माण 2002 में तब शुरु हुआ जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई। लेकिन 21 सालों तक कई बार इस सेतु का निर्माण बजट या फिर दूसरी तकनीकी दिक्कतों की वजह से प्रभावित हुआ। पुल के सामरिक महत्व को देखते हुए इसका निर्माण काफी पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। इसकी दूसरी वजह ब्रहमपुत्र में सतत जलप्रवाह भी है, क्योंकि यहां रेल इंजीनियरों को सिर्फ पांच माह का वक्त होता था उसी दौरान सेतु निर्माण किया जाता था, क्योंकि सेतु के पीलरों की गहराई भी बहुत है। यह भारतीय रेल और उसकी इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है।

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बोगीबील ब्रिज से आसाम-अरुणाचल प्रदेश के बीच की जो दूरी 500 किमी से 100 किमी रह जाएगी। - फोटो : File Photo

कितना आया खर्च? कितनी दूरी होगी कम? 
सेतु के निर्माण पर तकरीबन 59,00 करोड़ का खर्च आया है। पुल के निर्माण से आसाम और अरुणाचल प्रदेश के बीच की जो दूरी 500 किलोमीटर थी वह महज 100 किमी रह जाएगी। डिब्रूगढ़ से ईंटानगर की दूरी में 150 किमी कम हो जाएगी, जिस दूरी को तय करने में लगभग 24 घंटे का वक्त जाया होता था, अब यह सिर्फ तीन घंटे में तय हो जाएगी। सेतु के वीम निर्माण के लिए इटली से मशीने मंगाई गई  थी। पांच किमी लंबे पुल में 42 खंभे बनाए गए हैं जो भूकंप के झटकों को भी सहने लायक हैं। सेतु में 80 हजार टन स्टील प्लेटों का इस्तेमाल किया गया है। इसकी उम्र 120 साल निर्धारित की गई हैं

चीन के हमले के वक्त उठी थी मांग  
चीन ने 1962 में जब भारत पर हमला किया था, उसी दौरान 1965 में आसाम के डिब्रूगढ़ में राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए सेतु निर्माण की मांग उठाई गई थी, क्योंकि उस दौरान चीनी सेना असम के तेजपुर तक पहुंच गई  थी। जिसकी वजह से भारत को काफी नुसान उठाना पड़ा था। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस राज में केंद्रीय कृषिमंत्री जगजीवन राम जब आसाम दौरे पर आए थे तो ईस्टर्न असम चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्टी ने सेतु की मांग उठाई  थी, क्योंकि चीन सैन्य गतिविधियों की पहुंच बेहद आसान थी। लेकिन अब इस पुल के माध्यम से भारत चीन की आंख में आंख डाल कर चुनौती दे सकता है।

इस पुल के निर्माण की वजह से चीन की सीमा भारत आसानी से सैन्य साजो-सामान और रसद सामाग्री पहुंचा सकता है। सेतु का निर्माण युद्ध की स्थिति को ध्यान में पर रख कर बनाया गया है। क्योंकि चीन से मुकाबला करने और उसकी बंदरघुड़की से निपटन के लिए इस सेतु का निर्माण हमारे लिए बेहद अहम था। दूसरी तरफ दिल्ली और डिब्रूगढ़ की दूरी तीन घंटे कम हो जएगी। ब्रहमपुत्र के दोनों उत्तरी - दक्षिणी सिरे पर रेल और रोड अब इस सेतु से सीधे जुड़ जाएंगे।

पूर्वोत्तर भारत के विकास में यह बेहद अहम कड़ी 
पूर्वोत्तर भारत के विकास में यह बेहद अहम कड़ी होगा। युद्ध की स्थिति में भारत बेहद आसानी से अरुणांचल में चीन की सीमा में सैन्य सामान अधिक तेजी से पहुंचा सकता है। 1100 अर्जुन टैंक को इस पर से गुजारा जा सकता है, जिसकी वजह से हमारी सैन्य कूटनीति मजबूत होगी। हमारी सेना की स्थिति काफी सुदृढ़ होगी। हम सेतु का उपयोग युद्ध के दौरान लड़ाकू विमानों के लिए भी कर सकते हैं।

हमारी पूर्वी भारत की सीमा को सुरक्षित रखने में इसका विशेष योगदान होगा। हम चीन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकते हैं। 1962 की पराजय की वजह से चीन भारत को हमेशा अपनी सैन्य गतिविधियों डराता रहता है। भारत से जुड़ी सीमा पर वह अपनी सैन्य व्यवस्था को लगातार मजबूत करता आ रहा है। 

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चीन पहले से ही भारत से सटी सीमाओं पर सैन्य एयरबेस, सड़क मार्ग का निर्माण करता आ रहा है। - फोटो : File photo

चीन से निपटने के लिए तैयार रहना होगा 
भारत से सटी सीमाओं पर सैन्य एयरबेस, सड़क मार्ग का निर्माण करता आ रहा है। जिसकी वजह से हमारी तैयारियां भी उस आधार की होनी चाहिए, क्योंकि चीन भारत को अपना दुश्मन नम्बर वन मानता है। जबकि यही स्थिति भारत के लिए भी है। कूटनीतिक तौर पर दोनों एक दूसरे पर आंख बंद कर भरोसा नहीं कर सकते हैं। सरकार को राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा को देखते हुए इस तरह के सेतुओं के निर्माण पर नीतिगत फैसला करना चाहिए। रेल, परिवहन और गृहमंत्रालय  के साथ सैन्य विभाग को मिलकर इस दिशा में एक साथ काम करना चाहिए। सेना को भी सरकार को भी इस तरह के सेतु या दूसरी जरुरत के लिए सरकार को  रिपोर्ट सौंपनी चाहिए। 

भारत को रहना होगा तैयार 
सरकार को उन रपटों पर गंभीरता से विचार कर त्वरित निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि निर्माण में बिलंब की वजह से बोगीबील की लागत में 85 फीसदी बढ़ गयी। जबकि शुरुवाती दौर में इसकी लागत 3, 200 हजार करोड़ से अधिक रखी गई थी जो बाद में बढ़कर 5,960 करोड़ पहुंच गई। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज को देखते हुए 2007 में मनमोहन सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया था, जिसके बाद इसके लिए विशेष बजट उपलब्ध कराया गया और निर्माण में तेजी आई। सेतु के निर्माण के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा और उसकी चुनौतियों को विशेष ध्यान में रख कर इसे बनाया गया है।

देश में अगर और बोगीबील जैसे सेतुओं की आवश्यकता है तो उस पर जल्द फैसला लेना चाहिए। लेकिन इसके निर्माण में जिस तरह 21 सालों का वक्त जाया हुआ और लागत दोगुना पहुंच गई वह नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इस तरह के बोगीबील जैसे सेतु हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सेतु के उद्घाटन के जरिए पूर्वोत्तर भारत के विकास में एक नया इतिहास रचा है। पूर्वोत्तर में भाजपा के बढ़ते जनाधार के लिहाज से भी एक कूटनीतिक जीत होगी जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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