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दुर्गम इलाकों तक पहुंच आसान करेगा अरुणाचल प्रदेश का सेला टनल

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Sat, 09 Mar 2024 02:52 PM IST
सार

सेला टनल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके भीतर से गुजरने की स्थिति में चीन वहां ट्रैफिक की आवाजाही की निगरानी नहीं कर सकेगा। राज्य की 1,080 किमी लंबी सीमा चीन से लगी है। इसके अलावा 520 किमी लंबी सीमा म्यांमार और 217 किमी लंबी सीमा भूटान से भी लगी है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सेना इसी इलाके से भारत में घुस कर असम के तेजपुर शहर के करीब पहुंच गई थी।

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सेला टनल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके भीतर से गुजरने की स्थिति में चीन वहां ट्रैफिक की आवाजाही की निगरानी नहीं कर सकेगा। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नौ मार्च को अरुणाचल प्रदेश में सामरिक रूप से बेहद अहम सेला टनल का उद्घाटन कर दिया। चीनी सीमा से लगा तवांग इलाका खासकर सर्दी के दिनों में भारी बर्फबारी के कारण देश के बाकी हिस्सों से कट जाता है। लेकिन अब इस टनल के जरिए वह बारहों महीने जुड़ा रहेगा। इससे न सिर्फ सेना और सैन्य उपकरणों को आपात स्थिति में मौर्चे पर भेजा जा सकेगा, बल्कि आम लोगों का जीवन आसान हो जाएगा और इलाके में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

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पहले राजधानी ईटानगर या असम के तेजपुर से तवांग इलाके तक पहुंचने के लिए करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित सेला दर्रे से होकर गुजरना पड़ता था। लेकिन यह सड़क साल में करीब तीन महीने बंद रहती थी। इसके अलावा बरसात के सीजन में भी अक्सर जमीन धंसने के कारण इस पर आवाजाही ठप हो जाती है।

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आखिर क्यों महत्व है इस टनल का?

चीन शुरू से ही भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा मानते हुए इस पर अपना दावा करता रहा है। हाल के वर्षों में उसने सीमावर्ती इलाको में अपनी गतिविधियां काफी बढ़ा दी हैं। इसके तहत इलाके में नए गांव बसाना और आधारभूत सुविधाएं विकसित करना शामिल है।

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इन गतिविधियों से चिंतित केंद्र सरकार ने भी अब बड़े पैमाने पर इससे निपटने की कवायद शुरू कर दी है। इसके तहत सीमा से सटे इलाकों में बसे दुर्गम गांवों तक सड़कों का जाल बिछाना, मॉडल गांव विकसित करना और इलाके में बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएं शुरू करना शामिल है। सेला टनल का निर्माण इसी कवायद का सबसे अहम हिस्सा है।
 

सेला टनल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके भीतर से गुजरने की स्थिति में चीन वहां ट्रैफिक की आवाजाही की निगरानी नहीं कर सकेगा। राज्य की 1,080 किमी लंबी सीमा चीन से लगी है। इसके अलावा 520 किमी लंबी सीमा म्यांमार और 217 किमी लंबी सीमा भूटान से भी लगी है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सेना इसी इलाके से भारत में घुस कर असम के तेजपुर शहर के करीब पहुंच गई थी।


एक सरकारी अधिकारी आंकड़ों के हवाले बताते हैं-
केंद्र सरकार इलाके में आधारभूत सुविधाओं के विकास के प्रति बेहद गंभीर है। बीते साल सितंबर में करीब 2900 करोड़ की परियोजनाओं के उद्घाटन से पहले वर्ष 2022 में भी 2900 करोड़ लागत वाली 103 परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया था। 

एक अन्य अहम परियोजना के तहत विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे 15।6 किलोमीटर लंबी जुड़वां सुरंगों का निर्माण किया जाना है। इससे असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच यात्रा में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा। सरकार ने सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी बेहतर बनाने के लिए 40 हजार करोड़ की लागत वाली दो हजार किमी लंबी फ्रंटियर हाइवे के निर्माण की भी योजना बनाई है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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अरुणाचल प्रदेश में पीएम मोदी - फोटो : ANI

यह सड़क अरुणाचल में मांगों से शुरू होकर राज्य के सीमावर्ती इलाकों से गुजरते हुए म्यांमार सीमा से सटे विजयनगर तक जाएगी। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के एक अधिकारी बताते हैं कि यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी और कठिन सड़क परियोजना है। यह मैकमोहन लाइन को कवर करते हुए नियंत्रण रेखा से करीब 25 किमी भीतर बनेगी।

फिलहाल तेजपुर या ईटानगर से तवांग को जोड़ने वाली सड़क सेला पास से होकर गुजरती है। अरुणाचल की राजधानी ईटानगर से तवांग के बीच की 447 किमी दूरी तय करने में फिलहाल करीब 14 घंटे का समय लगता है। इसी तरह तेजपुर से तवांग के बीच की 327 किमी दूरी तय करने में नौ घंटे से ज्यादा का समय लग जाता है।
 

यह दुनिया में दोहरी सड़क वाली सबसे लंबी टनल है। इस परियोजना के तहत कुल तीन टनल बनाए गए हैं। पहला टनल 993 मीटर लंबा है। दूसरा टनल जुड़वां हैं। इसमें मुख्य टनल 1591 मीटर लंबी है और उससे सटी एक और एस्केप टनल भी बनाई गई है जो आपात स्थिति में राहत और बचाव के काम आ सके।


इस परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस दुर्गम इलाके में ऐसी टनल का निर्माण काफी चुनौती भरा था। मौसम भी बेहद प्रतिकूल था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2019 में इसकी आधारशिला रखी थी। टनल में ट्रैफिक पर निगरानी के लिए आधुनिकतम उपकरण लगाए गए हैं। इसमें सुरक्षा का भी खास ध्यान रखा गया है। तवांग में पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि इस टनल के शुरू होने से इलाके में आने वाले पर्यटकों की तादाद दोगुनी होने का अनुमान है।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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