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पितृ पक्ष: मौन होती मुंडेरें और कौवे की लौटती याद, विज्ञान भी कौवे को साधारण पक्षी मानने से कहीं आगे जाता है

Yogesh kumar Goel योगेश कुमार गोयल
Updated Tue, 29 Sep 2026 09:02 AM IST
सार

पितृ पक्ष में कौवे को अन्न अर्पित करने की परंपरा सदियों पुरानी है, पर आज हमें कौवे व शहरी प्रकृति के बीच का बदलता रिश्ता भी देखना चाहिए। कौवे और अन्य कॉर्विड पक्षियों को मृत्यु, दूरदर्शिता, रहस्य, बुद्धि व स्मृति जैसे प्रतीकों से जोड़ा गया है। विज्ञान भी कौवे को साधारण पक्षी मानने से कहीं आगे जाता है।

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Pitru Paksha Silent rooftop returning memory of crow science goes far beyond viewing crow merely ordinary bird
पितृ पक्ष - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी सुबह की शुरुआत घड़ी के अलार्म से नहीं, मुंडेर पर बैठे कौवे की कांव-कांव से होती थी। खाना बनता, तो उसका एक हिस्सा कौवे के लिए भी अलग रख दिया जाता। पितृ पक्ष आते ही कौवा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति के केंद्र में आ जाता है। श्राद्ध का अन्न तैयार होता है, उसका एक अंश अलग रखा जाता है और प्रतीक्षा होती है कि कौवा आए तथा भोजन ग्रहण करे। भारतीय परंपरा में कौवे को पितरों से जोड़ने की मान्यता पुरानी है और श्राद्ध में उसे भोजन अर्पित करना पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण व कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है।

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कौवे को लेकर मान्यताएं भारत तक सीमित नहीं हैं। कई अन्य संस्कृतियों में कौवे और अन्य कॉर्विड पक्षियों को मृत्यु, रहस्य, बुद्धि, स्मृति तथा दूरदर्शिता जैसे प्रतीकों से जोड़ा गया है। आधुनिक विज्ञान भी कौवे को साधारण पक्षी मानने से कहीं आगे जाता है। कॉर्विड पक्षियों की अनुकूलन क्षमता उन्हें मानव-प्रभावित परिवेश में रहने में सक्षम बनाती है। भारत का ‘हाउस क्रो’ इसका उदाहरण है। लेकिन, क्या कौवे सच में तेजी से गायब हो रहे हैं?
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स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स 2025 के अनुसार, भारत में हाउस क्रो की दीर्घकालिक प्रवृत्ति स्थिर आंकी गई है, जबकि वर्तमान वार्षिक प्रवृत्ति में गिरावट दर्ज की गई है। दिल्ली के लिए उपलब्ध आंकड़े हाउस क्रो की दीर्घकालिक तथा वर्तमान, दोनों प्रवृत्तियों को ‘अपर्याप्त आंकड़े’ की श्रेणी में रखते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में कौवों की संख्या तेजी से घट रही है।
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कौवे के संरक्षण का अर्थ केवल उसे भोजन देना नहीं, बल्कि उस शहरी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखना है, जिसमें अनेक प्रजातियां एकसाथ रह सकें। शायद पितृ पक्ष की सबसे सुंदर सीख यही है कि पूर्वजों का स्मरण केवल अतीत की ओर देखना नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति जिम्मेदारी स्वीकारना भी है। कौवा आए, अन्न ग्रहण करे और हम इसे पितरों की स्वीकृति का संकेत मानें, यह परंपरा अपनी जगह अच्छी है, पर उससे भी सुंदर वह सुबह होगी, जब पितृ पक्ष बीत जाने के बाद भी हमारी मुंडेर पर उसकी कांव-कांव सुनाई देती रहे।

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