पेशावर सैन्य विद्रोह 1930: राष्ट्र प्रेम और साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल, पर नायक के वंशज आज भी भुगत रहे हैं 'देशप्रेम की सजा'
देशप्रेम की मिसाल पेश करने और अदम्य साहस दिखाने पर अंग्रेज सरकार ने चन्द्रसिंह की जमीन जायदाद जब्त कर ली थी। आजादी के बाद तो उनकी जायदाद वापस मिलनी ही चाहिए थी। लेकिन यह सोचने की फुरसत किसको है?
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विश्व में शायद ही कोई ऐसा सैन्य विद्रोह हुआ हो जिसमें विद्रोही सैनिकों द्वारा हथियार उठाने के बजाय हथियार गिरा दिए हों। ऐसी मिसाल गढ़वाली सैनिकों ने पेशावर में 23 अप्रैल 1930 को पेश की थी। यही नहीं इस काण्ड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में इन कट्टर हिन्दू विद्रोही सैनिकों ने निहत्थे पठानों पर गोलियां बरसाने के बजाय गोरों के सैनिकों के आगे अपने सीने तान लिए थे।
विडम्बना देखिए कि बहादुरी के साथ ही राष्ट्र प्रेम और साम्प्रदायिक सौहार्द की ऐसी मिसाल पेश करने वाले वे सभी गढ़वाली सैनिक गुमनामी में खो गए। जबकि राजनीतिक नेताओं की यादों को अक्षुण बनाए रखने के लिए सारे ही देश में नामकरणों की होड़ लगी हुए है।
विद्रोह के नायक चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ को चुनावी मजबूरी के चलते यदाकदा याद तो किया जाता है, लेकिन उनके बंशजों को ऐसी दो गज जमीन आज नसीब नहीं हो पाई जिसे वे अपना कह सकें और सिर ढकने के लिए एक स्थाई आशियाना बना सकें। विद्रोह के कारण ‘‘गढ़वाली’’ की जमीन जायदाद जब्त हो गई थी। चन्द्रसिंह के उन 32 गुमनाम देशभक्त सैनिकों का तो भारत ही नहीं बल्कि उत्तराखण्ड में भी कोई नाम लेवा नहीं है।
देश प्रेम, सौहार्द और बलिदान की मिसाल
1 अक्टूबर को पेशावर काण्ड के हीरो चन्द्रसिंह ‘‘गढ़वाली’’ की पुण्य तिथि है। इसी दिन 1979 को दिल्ली के एक अस्पताल में वीर चन्द्रसिंह ‘‘गढ़वाली’’ का निधन हो गया था। इस अवसर पर चन्द्रसिंह ‘‘गढ़वाली’’ को तो याद किया ही जाना चाहिए लेकिन उनके साथ ही 2/18 रॉयल गढ़वाल रायफल्स के उन बहादुर सैनिकों को भी अवश्य ही नमन किया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन और नौकरी की परवाह न कर चन्द्रसिंह के आदेश पर 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में निहत्थे स्वाधीनता प्रेमी पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया था। इस घटना ने सारे देश में स्वाधीनता आन्दोलन में एक नया उन्माद पैदा किया।
माना जाता है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने इन्हीं गढ़वाली सेनिकों से प्रेरणा लेकर आजाद हिन्द फौज का गठन किया था और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गढ़वाली सैनिकों और अफसरों को उनके देश प्रेम और बलिदान के लिए सहर्ष तत्पर रहने की भावना से प्रभावित हो कर उन्हें आजाद हिन्द फौज में महत्वपूर्ण पदों पर रखा। नेताजी की आइएनए में ढाई हजार से ज्यादा गढ़वाली सैनिक थे।
सैन्य विद्रोह जिसमें बहादुरों ने बन्दूकें झुका दीं
पेशावर काण्ड सन् 1857 के बाद भारतीय सैनिकों का पहला विद्रोह था। मगर विद्रोह भी ऐसा कि किसी पर बंदूक उठा कर नहीं बल्कि बंदूक झुका कर। इस घटना से सारे देश में आजादी के आन्दोलन को नई स्फूर्ति मिली। भारत से लेकर ब्रितानियां तक गढ़वालियों का नाम हुआ।
मोती लाल नेहरू के आह्वान पर देश के प्रमुख नगरों में ‘‘गढ़वाली दिवस’’ मनाया गया। इस काण्ड में चन्द्रसिंह एवं अन्य गढ़वाली सैनिकों को मृत्युदण्ड भी मिल सकता था, लेकिन बैरिस्टर मुकन्दीलाल की जबरदस्त पैरवी से उन्हें फांसी की सजा नहीं हुई, मगर सारी उम्र कालापानी की सजा अवश्य मिली।
अंग्रेजों की गुलामी से हिन्दुस्तान को आजाद कराने की मांग को लेकर 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में भारी संख्या में प्रदर्शन कर रहे पठानों पर गोली चलाने के अंग्रेज अफसर के हुक्म की नाफरमानी करने के आरोप में चन्द्रसिंह सहित सभी गढ़वाली सैनिकों पर एबटाबाद (इसी एबटाबाद सैन्य छावनी क्षेत्र में बिन लादेन अमरीकी कमाण्डो द्वारा मारा गया था) में कोर्ट मार्शल की अदालती कार्यवाही चली।
चन्द्र सिंह ‘‘गढ़वाली’’ को आजन्म कालापानी की सजा, 16 सैनिकों को सख्त लम्बे कारावास की सजा, 9 को नौकरी से बर्खास्तगी की सजा के साथ उनके सारे संचित वेतन को भी जब्त किया गया और 7 अन्य गढ़वाली सैनिकों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। चन्द्रसिंह भण्डारी ‘‘गढ़वाली’’ को जिन्दगी भर कालापानी की सजा के साथ ही उनकी सारी जमीन जायदाद जब्त, हवलदार पद से डिमोशन कर सिपाही का दर्जा और सिपाही पद से भी बर्खास्तगी हुई।
चन्द्रसिंह के वंशज आज भी भुगत रहे हैं देशप्रेम की सजा
चन्द्रसिंह गढ़वाली के वंशज आज भी देश प्रेम की सजा भुगत रहे हैं। 1 अक्तूबर, 1979 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की मौत के बाद उनके दोनों बेटों आनंद गढ़वाली और कुशलचंद्र गढ़वाली का भी असामयिक निधन हो गया। 21 जनवरी, 1975 को अविभाजित यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने कोटद्वार भाबर के हल्दूखाता गांव से सटी बिजनौर जिले के साहनपुर रेंज में दस एकड़ जमीन 90 साल की लीज पर उन्हें दी है, जिसमें गढ़वाली के बड़े बेटे स्व. आनंद गढ़वाली के परिवार में उनकी विधवा कपोत्री देवी और दो बेटे आलोक और रुपेश गढ़वाली का परिवार रहता है।
लीज का नवीनीकरण न होने के कारण उत्तर प्रदेश वन विभाग पूर्व में उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए जमीन खाली करने का नोटिस थमा चुका है। उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में आने के बाद मामला रुक गया, लेकिन परिजन अब उक्त जमीन को अपने नाम पर कराने या उत्तराखंड में जमीन दिलाने की मांग कर रहे हैं।
उनकी मांग जायज इसलिए है कि देशप्रेम की मिसाल पेश करने और अदम्य साहस दिखाने पर अंग्रेज सरकार ने चन्द्रसिंह की जमीन जायदाद जब्त कर ली थी। आजादी के बाद तो उनकी जायदाद वापस मिलनी ही चाहिए थी। लेकिन यह सोचने की फुरसत किसको है?
इन बहादुर सैनिकों को हुई सजा, जिनका नामलेवा कोई नहीं
हवलदार मेजर चन्द्र सिंह के अलावा हवलदार नारायण सिंह गुसाईं, नायक जीत सिंह रावत, नायक भोला सिंह बुटोला, नायक केशर सिंह रावत, नायक हरक सिंह धपोला, लांस नायक महेन्द्र सिंह, लांस नायक भीमसिंह बिष्ट, लांस नायक रतन सिंह नेगी, लांस नायक आनन्द सिंह रावत, लांस नायक आलम सिंह फरस्वाण, लांस नायक भवान सिंह रावत, लांस नायक उमराव सिंह रावत, लांस नायक हुकम सिंह कठैत, और लांस नायक जीतसिंह बिष्ट को लम्बी सजाएं हुईं।
इनके अलावा पाती राम भण्डारी, पान सिंह दानू, रामसिंह दानू, हरक सिंह रावत, लछमसिंह रावत, माधोसिंह गुसाईं चन्द्र सिंह रावत, जगत सिंह नेगी, ज्ञानसिंह भण्डारी, शेरसिंह भण्डारी, मानसिंह कुंवर, बचन सिंह नेगी, रूपचन्द सिंह रावत, श्रीचन्द सिंह सुनार, गुमान सिंह नेगी, माधोसिंह नेगी, शेरसिंह महर, बुद्धिसिंह असवाल, जूरासंध सिंह रमोला, रायसिंह नेगी, किशन सिंह रावत, दौलत सिंह रावत, करम सिंह रौतेला, डबल सिंह रावत, हरकसिंह नेगी, रतन सिंह नेगी, हुक्म सिंह सुनार, श्यामसिंह सुनार, सरोप सिंह नेगी, मदनसिंह नेगी, प्रताप सिंह रावत, खेमसिंह गुसाईं एवं रामचन्द्र सिंह चौधरी को कोटमार्शल द्वारा सेना की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
त्रिलोक सिंह रावत, जैसिंह बिष्ट, गोरिया सिंह रावत, गोविन्द सिंह बिष्ट, दौलत सिंह नेगी, प्रताप सिंह नेगी और रामशरण बडोला को सेना से डिस्चार्ज किया गया।
चन्द्र सिंह गढ़वाली के गढ़वाल प्रवेश पर रोक थी
1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिए ऐबटाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद उन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर उनकी सजा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। परन्तु कम्युनिस्ट होने के कारण उनका गढ़वाल में प्रवेश प्रतिबंधित रहा।जिस कारण इन्हें यहां-वहां भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये गांधी जी के पास चले गए।
गांधी जी इनसे बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रह कर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिए गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया। जिस गढ़वाली ने हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की थी उसी के गढ़वाल में साम्प्रदायिक तत्व राजनीतिक लाभ के लिए कभी लव जिहाद तो कभी भूमि जिहाद के नाम पर वैमनस्यता फैला रहे हैं।
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