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राजस्थान: नेटबंदी का कोई ठोस उपाय क्यों नहीं खोज रही सरकार?

Tue, 28 Feb 2023 06:58 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 28 Feb 2023 06:58 PM IST
सार

सवाल यह उठता है कि आज लाइफ लाइन बन चुके मोबाइल नेट को कैसे रोका जा सकता है? क्या सरकार के पास यही एकमात्र उपाय रह गया है कि जब कुछ न सूझे तो मोबाइल का नेट बंद कर दिया जाए? नेटबंदी करने के दौरान यह नहीं देखा जाता कि इससे कितनी बड़ी जनसंख्या प्रभावित हो रही है।

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paper leak in rajasthan and internet shutdown, a review on it
इंटरनेट बैन के कारण राजस्थान में प्रभावित हुआ जनजीवन - फोटो : iStock

विस्तार

तीन दिन बाद राजस्थान के 11 जिलों के लाखों लोगों ने राहत की सांस ली है। शिक्षक भर्ती परीक्षा के कारण तीन दिन से जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर जैसे बड़े शहरों समेत 11 जिलों में मोबाइल पर नेटबंदी की गई थी। राजस्थान सरकार यह कदम बार-बार भर्ती परीक्षाओं के पेपरलीक होने के कारण उठाती रहती है। राज्य सरकार के पास इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि पहले परीक्षाओं के दौरान नेटबंदी के बावजूद पेपरलीक कैसे हुए?

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दरअसल, राजस्थान में पेपरलीक होना एक आम सी बात हो गई है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में 16 बार प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपरलीक हो चुके हैं और विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है। युवाओं में आक्रोश है, लेकिन सरकार के पास नेटबंदी के अलावा कोई ठोस उपाय नहीं है।
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आज डिजिटल क्रांति के युग में सबकुछ मोबाइल डाटा के सहारे चल रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें कुछ बाराती दूल्हे के ऊपर मोबाइल घुमाकर ढोल वाले को क्यूआर कोड स्कैन करके पैसे दे रहे थे। यह डिजिटल की ताकत है और यही ताकत पिछले तीन दिनों से राजस्थान के लाखों लोगों से छिनी हुई थी या ये कहें की अक्सर छीन ली जाती है।
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नेटबंदी के मामले में राजस्थान देश में दूसरे नंबर पर है। पिछले 10 वर्षों की बात करें तो सबसे अधिक नेटबंदी केंद्र शासित जम्मू और कश्मीर में 418 बार दर्ज की गई है, जबकि राजस्थान में यह आंकड़ा 93 का है। यदि राजस्थान के पड़ोसी राज्यों को देखें तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 30 बार, हरियाणा में 18, पंजाब में 5, गुजरात में 11 और मध्यप्रदेश में 7 बार नेटबंदी की गई है। दक्षिण में केरल में तो एक बार भी नेटबंदी नहीं हुई।

सवाल यह है कि क्या इन राज्यों में प्रतियोगी परीक्षा नहीं हो रही हैं? सच यह है कि राजस्थान सरकार नेटबंदी को एक तरह से अपने बचाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। कई जिलों में हल्के तनाव पर भी नेटबंदी कर दी जाती है।


नेटबंदी के कारण जन-जीवन पर असर 

नेटबंदी करने के दौरान यह नहीं देखा जाता कि इससे कितनी बड़ी जनसंख्या प्रभावित हो रही है। आज खाना मंगाने से लेकर टैक्सी में सफर करने तक, छोटे से छोटे दुकानदार को पेमेंट करने तक, सबकुछ मोबाइल नेट से जुड़ा हुआ है। 11 जिलों में 12-12 घंटे की तीन दिन की नेटबंदी के कारण न तो खाना डिलीवरी हो सका, न लोग टैक्सी या बाइक सर्विस का उपयोग कर पाए, ई-वे बिल बनने में दिक्कत से सामान का ट्रांसपोर्टेशन प्रभावित हुआ। 

राजस्थान में इन दिनों पर्यटन का सीजन भी चल रहा है। पर्यटकों को समझ नहीं आया कि मोबाइल नेट कैसे बंद हो गया? जिन लोगों की ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा के चलते कैश रखने की आदत नहीं है, वे अपने घरों तक से नहीं निकल पाए। कुछ लोग एटीएम खंगालते रहे। इतना ही नहीं, जो परीक्षार्थी दूरदराज से शहरों में परीक्षा देने पहुंचे थे, वो नेटबंदी के कारण सेंटरों को खेजते रहे। गूगल मैप बंद होने से उन्हें खुद परीक्षा सेंटर पर पहुंचने में दिक्कतें आईं।

सवाल यह उठता है कि आज लाइफ लाइन बन चुके मोबाइल नेट को कैसे रोका जा सकता है? क्या सरकार के पास यही एकमात्र उपाय रह गया है कि जब कुछ न सूझे तो मोबाइल का नेट बंद कर दिया जाए? सच्चाई तो यह है कि आज अपराधी इतने शातिर हो गए हैं कि वह पेपरलीक के नए-नए तरीके खोज रहे हैं। नेटबंदी हो या न हो, अपराधियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। 

सरकार अपनी चंद परेशानियों से बचने के लिए एक बड़े वर्ग को क्यों परेशान करना चाहती है? सरकार को चाहिए कि पेपरलीक या अन्य घटनाओं की मूल समस्याओं का निदान करे। नेटबंदी जैसे बड़े कदमों से परहेज किया जाए। इससे न केवल जनता परेशान होती है, बल्कि सरकार की छवि भी कहीं न कहीं प्रभावित होती है।





डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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