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शिक्षा समानता और न्याय के पैरोकार: महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी

Fri, 25 Dec 2020 09:53 AM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Fri, 25 Dec 2020 09:53 AM IST
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pandit madan mohan malviya birth anniversary 25 december biography and life achievements of pandit madan mohan malaviya
भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में पंडित बृजनाथ और मूना देवी जी के घर 25 दिसंबर 1861 में को हुआ था - फोटो : अमर उजाला

'जब मैं मालवीय जी से मिला ....वो मुझे गंगा की धारा की तरह निर्मल और पवित्र लगे। मैंने तय किया मैं उसी निर्मल धारा में गोता लगाऊंगा।'

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                                   "महात्मा गांधी "


भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में पंडित बृजनाथ और मूना देवी जी के घर 25 दिसंबर 1861 में को हुआ था। पिता बृजनाथ जी संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। अतः प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत भाषा में पंडित हर देव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई। म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों से शिक्षा हासिल करके एक कुशल अधिवक्ता, निर्भीक पत्रकार, संवेदनशील समाजसुधारक, भारत की भावी पीढ़ी को भारतीयता का पाठ पढ़ाने वाले एक सफल शिक्षक के रूप में जाने गए।
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ब्रिटिश साम्राज्य के उस दौर में मालवीय जी ने सामाजिक न्याय और समानता पर मजबूती से अपना पक्ष रखा। अस्पृश्यता, अशिक्षा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर खुल कर प्रहार किया। समाज की रूढ़िवादी परंपराओं का न सिर्फ विरोध किया अपितु जीवन भर उन्हें दूर करने का प्रयास करते रहे। उनके सरल स्वभाव का प्रभाव ही था कि वे उस दौर के सबसे लोकप्रिय शख्सियत बन गए। सहज ही लोग उनकी बातों को अनसुना कर पाते थे। फिर वो ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत हो या भारतीय जनमानस का असाधारण नुमाइंदा। संभवतः इसीलिए उन्हें आज भी उदारवादी और राष्ट्रवादियों के मध्य सेतु के रूप में जाना जाता है।
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हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान को समर्पित उनके जीवन में समाज के प्रत्येक तबके को जोड़ कर रखने की गजब की शक्ति थी। उन्होंने 'सत्यमेव जयते' के नारे को जन जन तक लोकप्रिय बनाया। 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव डाल कर भारतीयों को अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी का एक विषय के रूप में अध्यापन आरंभ कराया। भारत में शिक्षा की क्रांति की मशाल जगाई। उन्होंने स्वयं 'मकरंद ' उपनाम से रचनाएं लिखी, जो उस दौर में बेहद पसंद की जाने लगी। हिंदी को प्रोत्साहन देने में आपका अप्रतिम योगदान है। मालवीय जी की भविष्यवाणी थी, कि हिंदी एक दिन राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित होगी। 
   
तत्कालीन ब्रिटिश शासन में कालाकांकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर हिंदी, अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान का 1887 से संपादन किया, इंडियन ओपीनियन के संपादन में सहयोग दिया साथ ही वर्ष 1907 में साप्ताहिक अभ्युदय को निकालकर कुछ समय तक संपादित किया, वर्ष 1909 में लीडर एवं मर्यादा पत्रिका निकालकर लोगों  को जागरूक करने का काम किया। भारत की पत्रकारिता के क्षेत्र में आज भी उनका स्थान सर्वप्रथम है। स्वतंत्रता संग्राम में इन अखबारों का अहम रोल रहा है।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष चुने गए, वर्ष 1909 में लाहौर, 1918 और 1930 में दिल्ली तथा 1932 में कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। मालवीय जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 वर्ष तक कांग्रेस की सेवा की और राष्ट्र सेवा में अपना योगदान दिया।

जब ब्रिटिश सरकार ने चौरी-चौरा कांड में लगभग 170 लोगों को फांसी की सजा सुनाई तब पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने मुकदमें की पैरवी करके लगभग 151 लोगों को बचाया। उनकी योग्यता का लोहा अंग्रेजी हुकूमत भी मानती थी। वर्ष 1920 में असहयोग आंदोलन, लाला लाजपतराय के साथ साइमन कमीशन का विरोध, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाई। मालवीय जी ने वर्ष 1931 में पहले गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया और वर्ष 1937 में राजनीति से सन्यास लेकर समाज सेवा से जुड़ गए।

महामना असमानता और तुष्टिकरण की नीतियों के विरुद्ध थे। उन्होंने 1916 के लखनऊ पैक्ट के दौरान मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का पुरजोर विरोध किया। वो नहीं चाहते थे कि भारत विभाजन हो इसलिए उन्होंने महात्मा गांधी जी से आग्रह किया था कि वे देश के विभाजन को किसी कीमत में स्वीकार न करें।

उनके बारे में एनी बेसेंट जी ने कहा था कि 'मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि विभिन्न मतों के बीच केवल मालवीय जी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।' पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने भारत के स्वराज के लिए अपनी अंतिम सांस तक तपस्या और संघर्ष किया लेकिन अफसोस आजादी मिलने के कुछ समय पूर्व 12 नवंबर सन् 1946 को आपका निधन हो गया।


महामना की देशभक्ति से प्रभावित होकर महात्मा गांधी उन्हें बड़े भाई और  भारत निर्माता की संज्ञा देते थे। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी का योगदान अमर है, उनकी तपस्या औऱ संघर्ष के इतिहास को पढ़ कर हर भारतीय हमेशा प्रेरणा लेता रहेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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