गांधी की अवधारणा वाली पंचायतें ही अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचा सकती हैं
महात्मा गांधी ने कहा था, भारत की आत्मा गांवों में बसती है। उनका मानना था कि,'जब पंचायत राज की स्थापना पूरी तरह से हो जाएगी, तो जनमत के जरिए वह सब किया जा सकेगा जो हिंसा के द्वारा कभी संभव नहीं है। उनका इशारा निश्चित रूप से स्वराज की ओर था।
- हिमाचल-महाराष्ट्र के पंचायत चुनाव
अभी हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में पंचायत के चुनाव संपन्न हुए हैं। देश के पहले मतदाता हिमाचल के किन्नौर जिले के कल्पा गांव के मास्टर श्याम शरण नेगी ने 103 वर्ष की उम्र में 17 जनवरी को माइनस 6 डिग्री की शीतलहर में अपना वोट डाला। मास्टर जी को उम्मीद है कि ग्राम पंचायतें ही गांधी के अंतिम व्यक्ति को न्याय दिला सकती हैं। अगले साल देश की आज़ादी के 75 साल हो जाएंगे। इस मौके पर देश की जनता को नई संसद की इमारत सौगात में मिल जाएगी। अभी देश में ढाई लाख से ज्यादा पंचायतें हैं और पंचायती राज व्यवस्था को दुरुस्त करने की चुनौती भी है।
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- मुंशी प्रेमचंद का पंच परमेश्वर
कोई 105 साल पहले 1916 में हिॆंदी की एक पत्रिका में एक किस्सा छपा था। किस्से का नाम था 'पंच परमेश्वर'। कहानीकार मुंशी प्रेमचंद थे। कहानी में दो अभिन्न मित्र पंच के रूप में एक-दूसरे के खिलाफ फैसला सुनाते हैं। पंच की भूमिका में उनके भीतर दोस्ती-दुश्मनी, न्याय-अन्याय की रस्साकशी चलती है, लेकिन जीत पंच के अंदर बैठे परमेश्वर की होती है।
कहानी में विवेक की आवाज खाला जान का वह प्रश्न है जो वह असमंजस में फंसे मित्र के ज़मीर पर हथौड़े की चोट करता है, 'बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात नहीं करोगे?' प्रेमचंद की यह कहानी तीन पात्रों जुम्मन, अलगू और मौसी के जरिए लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की तस्वीर पेश करती है। देश में पंचायत प्रणाली को संस्थागत बनाने में मिनी संसद कही जाने वाली देश की तकरीबन दो लाख चौंसठ हजार ग्राम पंचायतों के इतिहास और वर्तमान का व्यावहारिक आकलन सौ साल बाद भी इस किस्से से किया जा सकता है।
- आपदा काल में पंचायतों की जिम्मेदारी
पंचायत के सबसे महत्वपूर्ण काम रोजगार के मसले पर मनरेगा का लक्ष्य पूरा करने की हैं। मनरेगा में गड़बड़ी भी होती है। कई पंचायतों में पुस्तकालय और पालनाघर जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। अधिकतर पंचायत क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है। इस संक्रमण (कोरोना) काल में भी सर्दी-ज़ुकाम या बुखार होने पर ग्रामीणों को 20 से 25 मील दूर पास के शहर जाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के लिए आज भी गांवों में प्रसूति की सुविधा नहीं है। थियेटर, संगीत, साहित्य, खेलकूद और हुनर विकास जैसे क्षेत्रों में पंचायत की सक्रियता या भागीदारी को तरसना पड़ता।
संक्रमण काल में जब गरीब परिवार, बच्चों की पढ़ाई के लिए महंगे एंड्रायड फोन और फोन कंपनियों के बिलों का बोझ नहीं उठा सकते, तब पंचायतों की एक बड़ी भूमिका ग्रामीण विद्यार्थियों के पठन-पाठन में हो सकती हैं, जहां शिक्षा को कम खर्च में सर्वसुलभ बनाया जा सकता है, लेकिन पंचायतों ने इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। ऐसे में कई पंचायतों में ग्रामीण मतदाता नाराज होकर चुनावों का बहिष्कार करते। हिमाचल में इस बार तीन लाख बेरोज़गार शारीरिक शिक्षक अपने-अपने इलाकों में वोट देने नहीं गए। शाहपुर प्रखंड के तीन वार्डों में तो उम्मीदवारों ने नामांकण पत्र तक नहीं भरे।
वास्तव में यह दलों के बीच का ही शक्ति परीक्षण होता है...
- महिलाओं-दलितों की भागीदारी बढ़ी
हालांकि पंचायत के चुनावों का सांविधानिक रूप से किसी राजनीतिक दल से कोई लेना- देना नहीं होता है, लेकिन इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो नब्बे फीसदी उम्मीदवार किसी न किसी दल के सदस्य होते हैं और उनकी मदद से चुनाव जीतते हैं। वास्तव में यह दलों के बीच का ही शक्ति परीक्षण होता है। सत्तर और अस्सी के दशक तक पंचायतों पर सामंती ताकतों का कब्जा रहता था। ये इस या उस दल के सिपहसालार के रूप में वर्चस्व के लिए काम करते थे, लेकिन 1993 में 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन कानून के लागू होने के बाद से ग्रामीण राजनीति में नए समीकरण बनने लगे।
इस नए कानून के तहत अनुसूचित जाति व जनजाति के साथ-साथ स्त्रियों को भी पंचायत चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण मिला। यह सच है कि अरसे तक और बहुत हद तक अभी भी, बहुत सी जगहों पर महिलाएं प्रतीकात्मक रूप में चुनाव में भागीदारी करती या जीतती आई हैं और उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य ही वास्तविक संचालक होते रहे हैं लेकिन कानून बनने के 28 सालों के बाद महिलाओं के पक्ष में भी समीकरण बनने लगे हैं। सत्ता में राजनीतिक भागीदारी की प्रक्रिया ही अपने आप में दलित-आदिवासी और स्त्रियों के सशक्तीकरण की दिशा में पहला कदम माना जा सकता है
- पंचायत उम्मीदवारों की परख का बदलावः सर्वे
हिमाचल विश्वविद्यालय के ग्रामीण विकास अध्ययन विभाग द्वारा इसी साल 5 से 9 जनवरी तक किया गया एक सर्वे बताता है कि पिछले 20 सालों में आम मतदाताओं के मत-व्यवहार में बदलाव आया है, जहां पहले ग्रामीण मतदाता गांव के धनाढ्य और जाति के लिहाज़ से शक्तिशाली उम्मीदवारों को वोट देना एक तरह से अपना फ़र्ज़ समझते थे, वहां अब वे उम्मीदवार की पृष्ठभूमि, उनकी प्रतिबद्धता का स्तर और पढ़ाई लिखाई के बारे में जानना चाहते हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने यह भी बताया कि स्त्री पंच या मुखिया तक पहुंच आसान होती है, वे पंचायत की बैठक दिन के समय करती हैं और आम तौर पर हिंसक धमकी या टकराव का सहारा नहीं लेतीं। हालांकि सर्वे में यह भी बताया गया है कि इन बदलते हुए समीकरणों के बावज़ूद ज्यादातर पंचायतों में चुनाव जाति, धर्म, पैसा, लिंग और राजनीतिक दलों के वर्चस्व के आधार पर लड़े जा रहे हैं।
लेखिका किरण शाहीन का परिचयः हिमाचल के गांव में रहते हुए ग्राम्य जीवन पर शोध कर रही हैं।
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