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भारत जोड़ो यात्रा बनाम सत्ता संघर्षः 2024 की सियासी पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त

Thu, 08 Sep 2022 01:32 PM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Thu, 08 Sep 2022 01:32 PM IST
सार

लोकसभा चुनाव की सियासी पिक्चर का फर्स्ट लुक सामने है। अभी से अलग-अलग किरदार अपनी-अपनी भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। अगले महीने कांग्रेस अध्यक्ष की ताजपोशी होने जा रही है, वहीं अगले साल जनवरी में भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा होने वाला है। 

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palning for 2024 election in india, Bharat Jodo Yatra Rahul Gandhi commences 'padyatra' from Kanyakumari
2024 लोकसभा चुनाव के लिए मंद गति से तैयारियां शुरू हो गई हैं - फोटो : istock

विस्तार

2024 में अभी देर है, दिल्ली भी दूर है, फिर भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक सियासी कदमताल तेज है। लोकसभा चुनाव की सियासी पिक्चर का फर्स्ट लुक सामने है। अभी से अलग-अलग किरदार अपनी-अपनी भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। अगले महीने कांग्रेस अध्यक्ष की ताजपोशी होने जा रही है, वहीं अगले साल जनवरी में भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल भी पूरा होने वाला है।

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2024 की सियासी पिक्चर से पहले करीब आधा दर्जन राज्यों में विधानसभा चुनाव का ट्रेलर दिखने वाला है। ऐसे में कांग्रेस की कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा, नीतीश की विपक्षी कुनबों को एकजुट करने की कवायद और भाजपा की रणनीति के खास मायने हैं।   
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कांग्रेस की कदमताल

करीब 135 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी सत्ता के गलियारे में हाशिए पर आ चुकी है। सो, सबसे पुरानी पार्टी में अब 135 करोड़ जनता से सीधे जुड़ने की बेताबी झलक रही है। 17 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव प्रस्तावित है। 19 अक्टूबर को कांग्रेस को अध्यक्ष मिल जाएगा। संगठनात्मक चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर चिल्ल-पों के बीच कांग्रेस 13 राज्यों की 3,570 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़ी है।
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155 दिन की इस यात्रा के लिए कांग्रेस ने अपने रोडमैप में जो पड़ाव तैयार किए हैं, उनमें दो साल के भीतर विधानसभा चुनाव वाले 11 राज्यों गुजरात, हिमाचल, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में से गुजरात, हिमाचल, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़ और मिजोरम इस यात्रा से अछूते हैं।


जिन 11 राज्यों में दो साल के भीतर चुनाव होने वाले हैं उनमें से 5 पर भाजपा काबिज है, तीन पर भाजपा की सहयोगी जबकि तीन पर विपक्ष। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के रोडमैप में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर ही शामिल हैं। कांग्रेस दक्षिण में दबदबा महसूस करती है, सो यात्रा भी उसने कश्मीर से कन्याकुमारी के बजाय कन्याकुमारी से कश्मीर शुरू की है।

इस यात्रा की बदौलत कांग्रेस फिर से सियासी गलियारे की चर्चा का हिस्सा बनती दिख रही है, वह भी तब,  जब पार्टी के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से नाता तोड़कर कश्मीर में अपनी किस्मत आजमाने की ठान ली है। इससे पहले पंजाब में कैप्टन अमरिंदर ने टाटा-बाई-बाई कर कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रखा है।

जाहिर है, भारत जोड़ो यात्रा के जरिए संगठनात्मक चुनाव के पहले राहुल गांधी फिर से मजबूती से भले उभर रहे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनावों वाले राज्यों की अनदेखी पार्टी की रणनीतिक कमजोरी को दर्शाता है।

इसी तरह, क्षेत्रीय दलों की कवायद से भी इस पुरानी पार्टी की लोकसभा चुनाव में हिस्सेदारी की बढ़त को लेकर संशय के बादल हैं। कांग्रेस सीधे मुकाबले की स्थिति में नहीं है, लेकिन इस यात्रा की बदौलत वह पार्टी और पार्टी अध्यक्ष को मजबूती प्रदान करने में कामयाब हो सकती है। 

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कांग्रेस ने शुरू की भारत जोड़ो यात्रा की मुहिम - फोटो : Twitter

भाजपा की रणनीति

दूसरी तरफ, सबसे बड़ी पार्टी और 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' की बदौलत 2 से 303 तक पहुंची भारतीय जनता पार्टी के लिए 2024 के चुनाव की चुनौतियां कम नहीं हैं। हालांकि चुनाव प्रबंधन के मामले में भाजपा अब भी आगे है। देश के 10,35,000 बूथों तक बूथ प्रबंधन से पन्ना प्रमुख तक की जिम्मेदारी पार्टी को मतदाताओं से सीधे जोड़ती है।

10 नवंबर 2020 को जब बिहार चुनाव के नतीजे आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जनादेश के रेड कार्पेट पर ही बंगाल की चुनावी मुहिम का शंखनाद कर दिया था। अभी भाजपा के शीर्ष नेता उन चुनावी राज्यों में ही किसी न किसी बहाने एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, जहां लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 

2024 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति का आलम यह है कि अभी भाजपा ने उन 144 संसदीय सीटों पर नजर टिका रखी है, जो 2019 के चुनाव में उसकी झोली से खिसक गई थीं। गठबंधन से कुछ साथियों के खिसकने के बाद नई सीटों पर भी नजरें टिक गई हैं।

2014 में जीत के बाद जिन सीटों पर भाजपा की हार हुई थी, उनकी 30 फीसदी सीटें जीतने का लक्ष्य 2019 में तय किया गया था। 2019 में हारी 144 सीटों में इस बार यह लक्ष्य बढ़ाकर 50 फीसदी सीटों पर जीत का तय किया गया है। इसके लिए बकायदा मंत्रियों और दिग्गज नेताओं को जिम्मेदारी सौंप दी गई है।


भाजपा के सामने इस बार एनडीए के बजाय अपने बूते ही पुराने प्रदर्शन को बरकरार रखने की चुनौती है। पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जदयू से नाता टूट चुका है। बिहार ने लोकसभा चुनाव में बंपर कमल खिलाया था, जिसे इस बार दोहराना आसान नहीं होगा। सबका साथ, सबका विकास की बात करने वाली भाजपा को सहयोगियों का साथ भले छूट गया है लेकिन फर्स्ट टाइम वोटर व महिला मतदाताओं का साथ मिलना तय है।

नरेंद्र मोदी की इन मतदाताओं में सीधी पैठ है। चुनाव प्रबंधन का आलम यह है कि भाजपा हैदराबाद के निगम चुनावों से लेकर बीएमसी के चुनावों तक में शीर्ष नेतृत्व को झोंक देती है। ऐसे में कोरोना काल की वजह से भाजपा अध्यक्ष के कार्यकाल को भी विस्तार मिल जाए तो कोई हैरानी नहीं होगी। भाजपा निगम-निकाय चुनाव से लेकर राष्ट्रपति के चुनाव तक को उतनी ही शिद्दत से लड़ती है।

विपक्षी कुनबों को जोड़ने की कवायद

सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी की चुनावी जंग के बीच क्षेत्रीय दलों और कुनबों को जोड़ने की कवायद भी जारी है। बिहार में पलटने के बाद नीतीश कुमार इस अभियान के अगुआ बनकर उभरे हैं। विपक्षी कुनबों को जोड़ने की कवायद में भले नीतीश कुमार की खिचड़ी न पक पाए, तब भी इतना तय माना जा रहा है कि ताजा दिल्ली दौरे में क्षेत्रीय क्षत्रपों से भेंट-मुलाकात कर सभी को साधने की कोशिश से विपक्ष को ऑक्सीजन जरूर मिला है। 

राजनीतिक पंडित तो यह भी मान रहे हैं नीतीश बिहार विधानसभा चुनाव में खंजर के अपने जख्म को भरने में कामयाब हो जाएंगे। भाजपा को सत्ता से नहीं भी रोक पाएं तो जिस तरह विधानसभा चुनाव में जदयू को नुकसान झेलना पड़ा, उसी तरह वह भाजपा को भी इस बार बिहार में कुछ कम सीटों पर समेट कर हिसाब बराबर कर सकते हैं। इसका अंदेशा भाजपा को भी है।

यही वजह है कि अब खुद अमित शाह बिहार, राजस्थान का मिजाज भांपने और अगले मैच की पिच तैयार करने के लिए क्यूरेटर की भूमिका में पहुंचने वाले हैं।

2024 लोकसभा चुनाव का फर्स्ट लुक भले सबके सामने है, विधानसभा चुनावों का ट्रेलर-टीजर आने वाला है लेकिन असली सियासी पिक्चर (2024) अभी बाकी है। देखना यह दिलचस्प है कि 2024 में रिलीज होने वाली सियासी (सत्ता की) पिक्चर भाजपा को बॉक्स ऑफिस (बहुमत या जनादेश) पर 300 करोड़ (सीटों) के क्लब से ऊपर ले जाती है या नीचे लाती है।  पिक्चर अभी बाकी है...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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