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अमेरिका को बाजवा की उतनी ही जरूरत है जितनी कभी मुशर्रफ की थी

Sat, 24 Aug 2019 12:32 PM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Sat, 24 Aug 2019 12:32 PM IST
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Pakistan Army Chief General Qamar javed Bajwa term extension Imran khan 
पाकिस्तानी सेना अध्यक्ष कमर जावेद बाजवा - फोटो : Daily Times Pakistan

पाकिस्तानी सेना चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा को तीन साल के लिए बतौर आर्मी चीफ एक्सटेंशन मिल गया है। इस एक्सटेंशन के पीछे के खेल को समझने के लिए हमें पिछले कुछ महीने के घटनाक्रम को देखना होगा। बाजवा ने हाल ही में ब्रिटेन का दौरा किया था। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तानी स्टेब्लिशमेंट में बहुत फैसले आज भी लंदन से होते है। वहीं, इमरान खान के अमेरिका दौरे के दौरान बाजवा उनके साथ थे।

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अमेरिका के लिए इमरान खान से ज्यादा महतवपूर्ण बाजवा थे। क्योंकि तालिबान और अमेरिका के बीच चल रहे शांति वार्ता का भविष्य इमरान खान नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के हांथ में है। अफगान तालिबान के ज्यादातर कमांडर पाकिस्तानी सेना के इशारे पर चलते हैं। बाजवा के अमेरिका यात्रा ने उनके एक्सटेंशन पर मुहर लगा दी थी। क्योंकि इस समय अमेरिका को बाजवा की सख्त जरूरत है।
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हालांकि बाजवा को मिलें एक्सटेंशन से भारत को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि सभी  पाकिस्तानी सेना चीफ का भारत के प्रति नजरिया लगभग एक जैसा रहा है। लेकिन पाकिस्तानी सेना चीफ बाजवा इस समय अमेरिका के लिए ठीक उसी तरह महतवपूर्ण है, जिस तरह किसी जमाने में परवेज मुशर्रफ थे। अमेरिका ने जब अफगान युद्ध छेड़ दिया था तो मुशर्रफ की खासी जरूरत थी, मुशर्रफ ने साथ भी दिया था। आज जब युद्ध के बजाय अफगान शांति की जरूरत है तो बाजवा की उतनी ही जरूरत अमेरिका को है, जितनी मुशर्रफ की थी।

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Pakistan Army Chief General Qamar javed Bajwa term extension Imran khan 
कमर जावेद बाजवा (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

बाजवा ने एक्सटेंशन की तैयारी पहले ही कर ली थी
कमर बाजवा को सेना चीफ नवाज शरीफ ने बनाया था। नवाज शरीफ तीन बार पाकिस्तान के पीएम रहे। इस दौरान उन्होंने  6 सेना चीफ अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में लगाए। नवाज और इमरान खान में एक ही अंतर है की नवाज को सेना का समर्थन समय- समय पर रहा। लेकिन उन्हें सेना के पाकिस्तानी सेना चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा को तीन साल के लिए बतौर आर्मी चीफ एक्सटेंशन मिल गया है। इस एक्सटेंशन के पीछे के खेल को समझने के लिए हमें पिछले कुछ महीने के घटनाक्रम को देखना होगा। बाजवा ने हाल ही में ब्रिटेन का दौरा किया था। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तानी स्टेब्लिशमेंट में बहुत फैसले आज भी लंदन से होते है। वहीं, इमरान खान के अमेरिका दौरे के दौरान बाजवा उनके साथ थे। 

अमेरिका के लिए इमरान खान से ज्यादा महतवपूर्ण बाजवा थे। क्योंकि तालिबान और अमेरिका के बीच चल रहे शांति वार्ता का भविष्य इमरान खान नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के हांथ में है। अफगान तालिबान के ज्यादातर कमांडर पाकिस्तानी सेना के इशारे पर चलते हैं। बाजवा के अमेरिका यात्रा ने उनके एक्सटेंशन पर मुहर लगा दी थी। क्योंकि इस समय अमेरिका को बाजवा की सख्त जरूरत है। 

हालांकि बाजवा को मिलें एक्सटेंशन से भारत को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि सभी  पाकिस्तानी सेना चीफ का भारत के प्रति नजरिया लगभग एक जैसा रहा है। लेकिन पाकिस्तानी सेना चीफ बाजवा इस समय अमेरिका के लिए ठीक उसी तरह महतवपूर्ण है, जिस तरह किसी जमाने में परवेज मुशर्रफ थे। अमेरिका ने जब अफगान युद्ध छेड़ दिया था तो मुशर्रफ की खासी जरूरत थी, मुशर्रफ ने साथ भी दिया था। आज जब युद्ध के बजाय अफगान शांति की जरूरत है तो बाजवा की उतनी ही जरूरत अमेरिका को है, जितनी मुशर्रफ की थी।आदमी के तौर पर पाकिस्तान में नहीं देखा गया। यही कारण है कि नवाज ने हमेशा अपने करीबी बंदे को आर्मी चीफ बनाया, पर सारों से उनका बाद में टकराव हो गया। लेकिन इमरान खान को पाकिस्तान में लंबे समय से आर्मी के बंदे के रूप में देखा जा रहा है। वैसे में कमर जावेद बाजवा को एक्सटेंशन मिलना तय था।

इमरान खान सेना से टकराव नहीं ले सकते। सेना के अंदर बाजवा की मजबूत स्थिति वो देख चुके थे। बाजवा ने पिछले दो सालों में सेना के इंटरनल ढांचे पर मजबूत पकड़ बना ली थी। इसी चक्कर में बाजवा ने हाल ही में  आईएसआई चीफ बदला था। सेना चीफ बनने के बाद सबसे पहले पहले उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल नावेद मुख्तार को आई एस आई का चीफ लगाया। नावेद मुख्तार ननकाना साहिब के अरेण परिवार से संबंधित थे। मुख्तार के साथ बाजवा की  ठीक निभी। मुख्तार के रिटायरमेंट के बाद उनकी जगह लेफ्टिनेट जनरल  असीम मुनीर को लगाया। कुछ महीने बाद मुनीर को हटा लेफ्टिनेंट जनरल  फैज हामिद को आई एस आई चीफ लगा दिया। बताया जाता है कि बाजवा की मुनीर से बन नहीं रही थी। बाजवा ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपने खास लोगों को कई महतवपूर्ण जगहों पर सेना के अंदर बिठा लिया था, ताकि रिटायरमेंट के पहले ही उनके एक्सटेंशन की घोषणा इमरान खान सरकार कर दे।

Pakistan Army Chief General Qamar javed Bajwa term extension Imran khan 
bajwa

बाजवा पहले जट सेना चीफ
पाकिस्तानी सेना के जातीय ढांचे को समझना जरूरी है। वैसे तो पाकिस्तानी सेना में बहुसंख्या पंजाबियों की है। अगर सेना के जातीय हिसाब से अध्ययन करे तो इसमें 65 से 70 प्रतिशत पंजाबी आबादी है। जबकि 20 प्रतिशत पश्तून पाकिस्तानी सेना में है। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि आर्मी के टॉप पोस्ट पर पश्तून लंबे समय तक रहे। अयूब खान और याहिया खान कमांडर इन चीफ रहे। दोनों पश्तून थे। आर्मी चीफ के टॉप पोस्ट पर भी जहांगीर करामात और वाहिद काकर पहुंचे, दोनों पश्तून थे। हालाकि पंजाबी पश्तूनों को शक की नजर से देखते रहे है।

आर्मी चीफ के पोस्ट पर पंजाबियों से पहुंचने वालो में जनरल जिया उल हक, आसिफ नवाज जंजुआ, परवेज कियानी, रहिल शरीफ और कमर बाजवा है। लेकिन गौर करना होगा कि पंजाबियों में भी जातीय विभाजन है। बाजवा पहले पंजाबी जट है जो आर्मी चीफ के पोस्ट पर पहुंचे है। जियाउल हक अरेन पंजाबी थे। आसिफ नवाज और रहिल शरीफ राजपूत थे। वहीं परवेज कियानी कियानी ट्राइब से संबंधित है। पाकिस्तानी पंजाब में अरेन्न, राजपूत और जाटों के बीच हमेशा  सामाजिक तनाव रहा है। इसके पीछे आर्थिक कारण भी है। तीनो जातियां ग्रामीण इलाकों में अच्छी खासी जमीनों को कंट्रोल करती है। पंजाब के शहरों के आसपास की ज्यादातर जमीन अरेंन मुसलमानों के पास है। ये तीनों पंजाबी जातियां पाकिस्तानी सेना में अच्छी खासी संख्या में है। लेकिन गौर करने वाली बात  ये भी है कि दो कुलीन मोहजिर परिवार के भारतीय मुसलमान मिर्जा असलम बेग और परवेज मुशर्रफ़ भी पाकिस्तान में सेना चीफ बने। पंजाबी बहुल सेना में उर्दू भाषी दो मुसलमानों का   आर्मी चीफ  के पद पर पहुंचना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

बाजवा का भारत के प्रति नजरिया
बाजवा भारत के लिए वैसे ही है, जैसे पहले के पाकिस्तानी सेना चीफ रहे है। लेकिन बाजवा की समझ पाकिस्तान के पहले रहे सेना चीफओं से अलग रही है। बाजवा भारत से आर्थिक संबंधों के बढ़ाने  के हक में रहे है। उन्होंने बाजवा डॉक्ट्राइन दिया। उसमे अमेरिका,कनाडा और मेक्सिको के तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने की बात की। हालांकि पुलवामा की घटना के बाद दोनों मुल्कों के बीच आर्थिक संबंध खराब होते गए, अब बदतर हालत में है। बाजवा को मिले एक्सटेंशन से भारत पाकिस्तान संबंधों पर और क्या असर पड़ेगा, यह बाजवा की कश्मीर में भविष्य की रणनीति से स्पष्ट होगा। अभी तक कश्मीर में पाकिस्तानी सेना की रणनीति वहीं है जो पहले के सेना चीफों के कार्यकाल में रही है। अतांकियों को समर्थन और कश्मीर में अतांकियो के हमले बाजवा के कार्यकाल में कम नहीं हुए। पुलवामा का अटैक बाजवा के कार्यकाल में हुआ।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।       

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