शिक्षक दिवस 2020: कोरोना काल में शिक्षक की चुनौतियां और गुरुकुल से गूगल तक का सफर
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भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की दृष्टि से बड़े बदलावों का पहला चरण आजादी के साथ आया। जब भारत ने विभाजन की विभीषिका को झेलकर अपने रूपांतरण का स्वयं सांस्थानिक ढ़ांचा खड़ा किया। परिवर्तकारी संक्रमण का दूसरा दौर उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ प्रारंभ हुआ, जिसे तीव्र रूपांतरण में बदला वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ हमारे जुड़ाव ने, 80 और 90 के दशक में।
सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का तीसरा चरण वैश्विक महामारी कोरोना संकट के साथ भारत में शुरू हुआ। आंशिक अर्थों में रूपांतरण की यह प्रक्रिया नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के साथ ही जारी हो गई थी, जिसके पीछे नई वैश्विक अर्थव्यवस्था, विदेश निवेश और मीडिया तथा वैश्विक संपर्कों की तेज गति मुख्य रूप से रही।
भारतीय समाज में रूपांतरण की इस तीव्र गति को कोरोना वायरस ने थाम दिया और बदलावों के दबाव पहले से भी ज्यादा बढ़ा दिए है। इन नए परिवर्तनों के पीछे टैक्नोलॉजी विशेष भूमिका लेने पर आमादा दिखती है। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू हुई रूपांतरण की उस प्रक्रिया की खास बात यह थी कि उसने मानवीय जीवन को तीव्र गति प्रदान की और दुनिया को एक-दूसरे के करीब ला दिया।
भू-मंड़लीकरण की प्रक्रिया में टाइम और स्पेस के इंटर-एक्शन ने तमाम प्रचलित धारणाओं व अवधारणाओं तथा मूल्य-मान्यताओं को उलटने का काम किया। पैराडाइम शिफ्ट ने संक्रमण काल को कुछ निश्चित आश्वासन देते हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक बदलावों को नए परिप्रेक्ष्य में समझने/समझाने के उद्यम शुरू किए। इस संघर्ष के बीच ही कोरोना संक्रमण से उपजा यह विश्वव्यापी संकट नए और बड़े बदलावों के दबावों के साथ उपस्थित हुआ।
भारतीय समाज की दृष्टि से स्वतंत्र भारत में रूपांतरण का यह तीसरा फेज है, जिसने परिवर्तन की गति को रोककर समाज को स्थिर कर दिया है। कोरोना संकट के प्रभाव पूरी दुनिया को बदलते जा रहे हैंं। शिक्षा और स्वास्थ्य संरचनाएं आमूल परिवर्तनों की ओर प्रवृत्त है। जरूरत से ज्यादा भय बड़े बदलावों की वजह बन रहा है।
शिक्षा के पारंपरिक ढ़ांचे को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। शिक्षण की परंपरागत पद्धति फेस-टु-फेस कक्ष शिक्षण ऑनलाइन शिक्षा में अवतरित हो चुका है। ऑनलाइन टीचिंग नए-नए विकल्पों के साथ शिक्षा जगत में उभरी चुनौतियों को अवसरों में अंकित करने के नए-नए उद्यम कर रही है, जिसका परिणाम यह होगा कि शिक्षा अपने मौलिक चरित्र में पूरी तरह बदल जाएगी।
ऑनलाइन शिक्षण की डिजिटल पद्धति उस शिक्षा संस्कृति को उलट कर रख देगी जिसमें हम गहराई तक रच-बस गए थे। हालांंकि गुरुकुल से गूगल तक का यह सफर शिक्षा में कई बदलावों का साक्षी रहा है। भारत में तो ये बदलाव नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के साथ नब्बे के दशक से ही शुरू हो गए थे। जहां शिक्षा का प्रावेटाइजेशन प्रारंभ हो गया था, वहीं शिक्षा में बड़े बदलावों की जरूरत महसूस करते हुए यू.जी.सी. ने स्मार्ट क्लासरूम, ई-पाठशाला, ऑडियो-वीडियो और डिजिटल शिक्षण के नए-नए केंद्र स्थापित करने शुरू कर दिए थे।
कोरोना महामारी ने इन जरूरतों को संस्थात्मक ढ़ांचे में ढ़ालने का दबाव बनाया है। वर्चुअल स्पेस में शिक्षा, शिक्षण और शिक्षण संस्थाओं को नए ढ़ंग के अभ्यास करने को प्रेरित किया और बदलने को बाध्य भी किया है। परिणामतः ऑनलाइन शिक्षण ने क्लासरूम टीचिंग के अर्थ, अवधारणा और आह्वान के उददेश्यों व लक्ष्यों को ही बदलकर रख दिया है।
मौजूदा महामारी से उपजी चुनौतियां समाज में रूपांतरण की प्रक्रिया को अवसरों के रूप में आयोजित करने को प्रेरित कर रही हैं...
कोरोना काल को इसीलिए याद रखा जाएगा कि अब शिक्षा संवाद कक्षा में न होकर वर्चुअल स्पेस में होगा। जिसके प्रभाव और परिणाम शिक्षा में संवाद और शिक्षण की संस्कृति को ही बदल देगें। अब समाज में शिक्षण-प्रशिक्षण की नई शैली विस्तार पा रही है।
मौजूदा महामारी से उपजी चुनौतियां समाज में रूपांतरण की प्रक्रिया को अवसरों के रुप में आयोजित करने को प्रेरित कर रही हैं। यह प्रेरणा समाज को बेहतर बनाने के बहाने संकट को अवसर में तब्दील करने का वातावरण भी बना रही है। भविष्य का शैक्षिक परिदृश्य संभवतः ज्यादा सहज, बहु-विकल्पी, अधिक नवाचारी और समावेशी रुप में उभरे।
गुणवत्ता की दृष्टि से भी शिक्षा अपने बदले गुण-धर्म के अनुरूप अधिक प्रभावी होगी। यह शिक्षा की नई संस्कृति वर्चुवल स्पेस के साथ अपनी उपस्थित दर्ज कराएगी। नए अवसर यथार्थ में बदल सके, इसके लिए पूरी शिक्षा-व्यवस्था को रिवैंप करने की जरूरत है। नए माहौल में नवाचारों को नई दृष्टि से आयोजित करने की जरूरत है।
भारत के शिक्षा जगत को दुनिया की ज्ञान-गंगा में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है। जिसके पर्याप्त अवसर और विकल्प भी अब उभर रहे हैं। इस दिशा में सार्थक हस्तक्षेप करते हुए शैक्षिक परिदृश्य पर नए प्रयोगों का परिवेश तैयार करने की जरूरत है। जिसमें शिक्षक को नई भूमिका में मोर्चा संभालने के लिए तैयार होना ही होगा।
सरकार को डिजिटल अधो-संरचना का विस्तार कर समाज को सशक्त करना होगा। जिससे समाज का एक बड़ा तबका डिजिटल शिक्षण संस्कृति में जीने का अभ्यस्त बन सके। समाज को भी अब डिजिटल माध्यमों के जरिए नवाचार करने के नए-नए उद्यम करने होंंगे।
शिक्षा जगत में ज्ञान की नवाचारी संस्कृति विकसित करने की महती आवश्यकता है। यह हमारे लिए एक सुगमता लेकर और आया है क्योंकि संयोग से कोरोना-कालीन संकट के दौरान ही भारतीय नेतृत्व नई शिक्षा नीति लेकर आया है। जो मौजूदा परिदृश्य पर उभरी चुनौतियों को अवसरों में बदलने का आसान रोडमैप तैयार करने में मददगार साबित होगी।
भारत सरकार अपने डिजिटल अभियान के साथ शिक्षण पद्धति को प्रभावी, संवादी और जीवंत बनाने वाले वातावरण के साथ शिक्षा की नई संस्कृति विकसित करने की दिशा में तकनीकी विकास के लिए प्रयासरत हैं।
कोरोना महामारी की चुनौती का सामना करने के लिए इसी बीच भारत सरकार के द्वारा महत्वपूर्ण एप ‘युक्ति’ को लांच करना इस दिशा में प्रभावी पहल है। जो नए भारत के शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षण संस्थाओं को अधिक ज्ञान संपन्न और एवं नवाचारी प्रवृत्ति की ओर उन्नमुख करने में अहम भमिका निभाएगा।
कोरोना संकट ने शिक्षा क्षेत्र में जिन चुनौतियों को खड़ा किया है। उनमें सबसे बडा रुपांतरण कक्षा शिक्षण का ऑनलाइन शिक्षा में बदल जाना है। इस अनुकूलता में शिक्षक और शिक्षार्थी के साथ-साथ पाठ्क्रम, मूल्यांकन और संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का नए रूपांतरण में प्रभावी बनना है।
शिक्षा की इस नई संस्कृति के साथ ही हमारे शिक्षण संस्थानों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। जिसके लिए विशेष तैयारियों की जरुरत है। कक्षा शिक्षण का प्रतिस्थापन ऑनलाइन शिक्षण से नई सार्थकता और प्रभाविकता के साथ हो, यही विकास के अगले चरण प्राथमिकता बने। जिसेे ध्यान में रखकर संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को अपने अंदर आमूल-चूल बदलवों को स्वीकृति देनी ही होगी।
(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं)
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