शिक्षक दिवस 2020: कोरोना काल में शिक्षक की चुनौतियां और गुरुकुल से गूगल तक का सफर

Dr. Rakesh Rana डॉ. राकेेेेश राणा
Updated Sat, 05 Sep 2020 07:40 AM IST
कोरोना महामारी ने शिक्षा के पारंपरिक ढ़ांचे को बदल दिया है- सांकेतिक तस्वीर
कोरोना महामारी ने शिक्षा के पारंपरिक ढ़ांचे को बदल दिया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की दृष्टि से बड़े बदलावों का पहला चरण आजादी के साथ आया। जब भारत ने विभाजन की विभीषिका को झेलकर अपने रूपांतरण का स्वयं सांस्थानिक ढ़ांचा खड़ा किया। परिवर्तकारी संक्रमण का दूसरा दौर उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ प्रारंभ हुआ, जिसे तीव्र रूपांतरण में बदला वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ हमारे जुड़ाव ने, 80  और 90 के दशक में। 
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सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का तीसरा चरण वैश्विक महामारी कोरोना संकट के साथ भारत में शुरू हुआ। आंशिक अर्थों में रूपांतरण की यह प्रक्रिया नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के साथ ही जारी हो गई थी, जिसके पीछे नई वैश्विक अर्थव्यवस्था, विदेश निवेश और मीडिया तथा वैश्विक संपर्कों की तेज गति मुख्य रूप से रही। 



भारतीय समाज में रूपांतरण की इस तीव्र गति को कोरोना वायरस ने थाम दिया और बदलावों के दबाव पहले से भी ज्यादा बढ़ा दिए है। इन नए परिवर्तनों के पीछे टैक्नोलॉजी विशेष भूमिका लेने पर आमादा दिखती है। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू हुई रूपांतरण की उस प्रक्रिया की खास बात यह थी कि उसने मानवीय जीवन को तीव्र गति प्रदान की और दुनिया को एक-दूसरे के करीब ला दिया। 

भू-मंड़लीकरण की प्रक्रिया में टाइम और स्पेस के इंटर-एक्शन ने तमाम प्रचलित धारणाओं व अवधारणाओं तथा मूल्य-मान्यताओं को उलटने का काम किया। पैराडाइम शिफ्ट ने संक्रमण काल को कुछ निश्चित आश्वासन देते हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक बदलावों को नए परिप्रेक्ष्य में समझने/समझाने के उद्यम शुरू किए। इस संघर्ष के बीच ही कोरोना संक्रमण से उपजा यह विश्वव्यापी संकट नए और बड़े बदलावों के दबावों के साथ उपस्थित हुआ। 
          
भारतीय समाज की दृष्टि से स्वतंत्र भारत में रूपांतरण का यह तीसरा फेज है, जिसने परिवर्तन की गति को रोककर समाज को स्थिर कर दिया है। कोरोना संकट के प्रभाव पूरी दुनिया को बदलते जा रहे हैंं। शिक्षा और स्वास्थ्य संरचनाएं आमूल परिवर्तनों की ओर प्रवृत्त है। जरूरत से ज्यादा भय बड़े बदलावों की वजह बन रहा है। 

शिक्षा के पारंपरिक ढ़ांचे को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। शिक्षण की परंपरागत पद्धति फेस-टु-फेस कक्ष शिक्षण ऑनलाइन शिक्षा में अवतरित हो चुका है। ऑनलाइन टीचिंग नए-नए विकल्पों के साथ शिक्षा जगत में उभरी चुनौतियों को अवसरों में अंकित करने के नए-नए उद्यम कर रही है, जिसका परिणाम यह होगा कि शिक्षा अपने मौलिक चरित्र में पूरी तरह बदल जाएगी। 

ऑनलाइन शिक्षण की डिजिटल पद्धति उस शिक्षा संस्कृति को उलट कर रख देगी जिसमें हम गहराई तक रच-बस गए थे। हालांंकि गुरुकुल से गूगल तक का यह सफर शिक्षा में कई बदलावों का साक्षी रहा है। भारत में तो ये बदलाव नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के साथ नब्बे के दशक से ही शुरू हो गए थे। जहां शिक्षा का प्रावेटाइजेशन प्रारंभ हो गया था, वहीं शिक्षा में बड़े बदलावों की जरूरत महसूस करते हुए यू.जी.सी. ने स्मार्ट क्लासरूम, ई-पाठशाला, ऑडियो-वीडियो और डिजिटल शिक्षण के नए-नए केंद्र स्थापित करने शुरू कर दिए थे। 

कोरोना महामारी ने इन जरूरतों को संस्थात्मक ढ़ांचे में ढ़ालने का दबाव बनाया है। वर्चुअल स्पेस में शिक्षा, शिक्षण और शिक्षण संस्थाओं को नए ढ़ंग के अभ्यास करने को प्रेरित किया और बदलने को बाध्य भी किया है। परिणामतः ऑनलाइन शिक्षण ने क्लासरूम टीचिंग के अर्थ, अवधारणा और आह्वान के उददेश्यों व लक्ष्यों को ही बदलकर रख दिया है।

मौजूदा महामारी से उपजी चुनौतियां समाज में रूपांतरण की प्रक्रिया को अवसरों के रूप में आयोजित करने को प्रेरित कर रही हैं...

भारत के शिक्षा जगत को दुनिया की ज्ञान-गंगा में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है- सांकेतिक तस्वीर
भारत के शिक्षा जगत को दुनिया की ज्ञान-गंगा में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
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