ऊँ और रामनाम वाले कपड़ों को लेकर विदेशियों में बढ़ी दीवानगी, ग्रीस में ऐसे हो रही शॉपिंग
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क्या आपको पता है कि ऊँ शब्द का विदेशीकरण हो चुका है। यह पवित्र शब्द पढ़ना और बोलना भले ही बहुत कम विदेशियों को आता है, और शायद ही उन्हें इस शब्द का महत्व पता हो, लेकिन ऊँ पर अपना दिल हार बैठे हैं। जी हां यह सौ फ़ीसदी सही है। बदलते ज़माने में ऊँ, योग और रामनामा वाले कपड़े, रुद्राक्ष की माला यह सब भारतीय योगियों के झोले से निकलकर विदेशी फ़ैशन की गलियों में जा पहुंचे हैं।
यहां हिंदू धर्म की कई चीजें फ़ैशनपरस्त लोगों के वॉर्डरोब और ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने के काम आ रहे हैं। ताज्जुब तो मुझे तब हुआ जब ग्रीस में एक दुकानदार ऊँ लिखी एक तस्वीर को अरबी भाषा बताकर बेच रहा था। जब मैंने पूछा कि यह क्या लिखा है तो उसने कहा यह लिखा तो कुछ ख़ास नहीं है, लेकिन अरबी भाषा में कुछ है। उसने ऊँ वाली तस्वीर को थोड़ा सीधा और कुछ उल्टे तरफ़ से रखा था।
क्या कहा दुकानदार ने?
बाद में वह बताने लगा कि इसे आप जैसे चाहे वैसे सज़ा सकते हैं। दोनों तरफ़ से सुंदर दिखेगी। आप चाहे तो इसे ख़रीद लें। हम इसे फ़्री ऑफ़ कॉस्ट आपके घर पहुंचा सकते हैं। ग्रीस से स्वीडन तस्वीर को भेजने का अलग से कोई चार्ज नहीं लगेगा। इसकी बिक्री यहां ख़ूब होती है। मैंने जानना चाहा कि इन तस्वीरों का एक्सपोर्टर कौन है, तो पता चला कि स्थानीय लोग ही इसे बनाकर बेच रहे हैं।
एक के बाद एक मैंने कई दुकानों पर ऊँ वाली तस्वीर देखी। एक दुकानदार ने कहा कि इस शब्द का कोई अर्थ नहीं। लेकिन देखने में सुंदर लगता है तो इसकी मांग भी है।
रुद्राक्ष पर जब मिला ये जवाब
अभी यह सब सुनकर अटपटा लग ही रहा था कि मेरी नज़र रुद्राक्ष वाले ब्रेसलेट पर पड़ी। मैं नहीं जानती थी की ये असली है या नक़ली। मुझे इसकी परख नहीं है, लेकिन हमारे यहां पूजा पाठ का सामान बेचने वाले दुकानों या जौहरियों के यहां बिकने वाले रुद्राक्ष जैसे ही थे। हाथ में पहनने वाले इन ब्रेसलेट्स की पैकिंग पर ऊँ लिखा हुआ था।
दरअसल, इसकी उपयोगिता अरोमाथेरेपी के लिए थी। ब्रेसलेट को पहनकर साथ में मिल रही इत्र की शीशी जैसी डिब्बी से अलग-अलग ख़ुशबू को उन पर लगाया जा सकता था, ताकि दिनभर अच्छी ख़ुशबू आपके ईर्द-गिर्द बनी रहे। मैंने पूछा कि यही मोती क्यों? इसके लिए तो काठ के बने मोती भी काम आ सकते थे। जवाब था- अरोमाथेरेपी के लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं। उन्हें किसी धर्म विशेष से जुड़ी इसकी महत्ता का भान तक नहीं है।
ठीक ऐसा ही हाल कुछ रामनामा वाले कुर्ते और झोले का भी है जिसे फ़ैशन के लिए पहना जा रहा है। ज़्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि ऐसी चीज़ों का भारत से क्या रिश्ता है। यहां कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्हें ऐसी चीज़ें थाईलैंड या अरब के देशों से आयातीत थी। तो सोचिए क्या सचमुच इन चीजों का विदेशीकरण हुआ है या नहीं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.