नोटबंदी के 730 दिन और कड़वे सवाल
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नोटबंदी को दो साल गुजर जाने के बाद भी देश, समाज और आम लोग इससे उबर नहीं पाए हैं। अब उन लोगों की कोई चर्चा नहीं है, जो मारे गए। बहुत से बाप अपनी बेटियों को ब्याह नहीं पाए। बहुत से मरीज पैसे के अभाव में अस्पतालों में इलाज नहीं करा सके। अचानक लिए गए सरकार के इस फैसले ने सभी को हिलाकर रख दिया। इस फैसले ने एक साथ बड़ी तादाद में लोगों को प्रभावित किया। यह एक बड़ा फैसला था जिसमें पहली बार सरकार ने न संसद को विश्वास में लिया गया, न विपक्ष को। यही नहीं खुद सरकार की कैबिनेट को भी पता नहीं था कि इतना बड़ा फैसला लिया गया है।
नोटबंदी के सबसे कड़वे सवाल
08 नवम्बर, 2018 को नोटबंदी को 730 दिन गुजर गए, लेकिन समस्याएं कमोबेश अब भी वैसी ही हैं, जैसी पहले थीं। 730 दिन की चर्चा इसलिए क्योंकि पीएम मोदी ने लोगों से मात्र 50 दिन का वक्त मांगा था, लेकिन उसके बाद भी बहुत कुछ बदल नहीं पाया। दरअसल, सवाल यह है कि क्या नोटबंदी ने वह हासिल किया जो पीएम नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता से वादा किया था।
नोटबंदी करने के पीछे तीन वादे किए गए थे। पहला यह कि काले धन पर हमला होगा, यानी अमीर और गरीब के बीच खाई पटेगी। दूसरा वादा था कि जो धन सरकारी खजाने में आएगा उससे आम लोगों की भलाई का काम किया जाएगा। कई लोगों ने तो शुरुआत में इस फैसले का समर्थन करते हुए यह सोचा कि शायद हो सकता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद उनके जीवन में खुशहाली आ जाए, इसलिए थोड़े दिन अगर वे कुछ नुकसान भी झेल लेते हैं तो कोई बात नहीं। इसके अलावा सबसे बड़ा वादा था कि देश में आतंकी गतिविधियां कम हो जाएंगी। नोटबंदी से आतंकियों की रीढ़ की हड्डी पर हमला हो जाएगा, यानी आतंकी गतिविधियां रुक जाएंगी। अब आपके सामने ये तीनों दावे-वादे मौजूद हैं, लेकिन परिवर्तन कोई खास नहीं दिखाई देता।
विपक्ष आज भी है हमलावर
अर्थव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि यदि किसी विकसित देश में इस तरह के फैसले लिए गए होते तो वहां की जनता इस तरह की सरकार को उखाड़कर फेंक देती। जाने-माने अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने राजनीति से अलग व्यवस्था को देखते हुए नोटबंदी को एक संगठित लूट बता दिया था। उन्होंने इसे लीगलाइज ब्लंडर तक कहा था। वहीं दूसरी ओर अब पी.चिदंबरम ने पीएम नरेन्द्र मोदी की मनी लांड्रिंग स्कीम तक बता रहे हैं। देखा जाए तो इस मुद्दे पर सरकार के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है। उम्मीद थी कि जिस तरह धूम-धड़ाके के साथ पीएम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की थी, उसी तरह वह बाहर निकलेंगे और नोटबंदी का जश्न मनाने की घोषणा करेंगे। लेकिन अब इस मुद्दे पर वे कुछ भी नहीं बोल रहे।
कौन बताएगा नोटबंदी के फायदे
आरबीआई के अनुसार, 17 लाख करोड़ अमान्य घोषित किए गए नोटों में से करीब 12,000 करोड़ सिस्टम में नहीं लौटे। इसका मतलब यह निकाला गया कि नोटबंदी फेल हो गई। रिजर्व बैंक के आंकड़े देने के बाद पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसका दावा भी किया। दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य डॉक्टर सुरजीत भल्ला ने मीडिया में कहा कि नोटबंदी फेल नहीं हुई। फिर नोटबंदी की सफलता या असफलता हम कैसे तय करें?
नोटबंदी भी कुछ इसी तरह की थी। सबको पता था कि इस फैसले से देश में तबाही का मंजर दिखने लगेगा, बावजूद यह फैसला लिया गया। आज हालात सबके सामने हैं। दरअसल, यह असफल ही रही। नोटबंदी का उद्देश्य कालेधन को सिस्टम से बाहर करना था, अगर वो किसी न किसी रूप में बैंक में आ गया तो इसका मतलब है कि धन किसी तरह से काले धन में बदला गया है और सफेद धन बनकर बैंकिंग सिस्टम में आ गया है। ये इसकी असफलता दर्शाता है, इसलिए कालेधन को रोकने की कवायद तो पूरी तरह से असफल हो गई। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि टैक्स के दायरे में बढ़ोतरी हुई, देखा जाए तो ये सही है, लेकिन इसके दीर्घकालीन प्रभाव अर्थव्यवस्था पर क्या होंगे ये एक अलग विषय है।
नहीं हुई पूरी व्यवस्था डिजिटल
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी का लक्ष्य नकदी पर आधारित भारत की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय ढंग से बदलाव लाना था। नकदी आधारित अर्थव्यवस्था की बात करें तो फ़ायदा तो हुआ है, लेकिन यदि देश में सौ ट्रांज़ेक्शन होते थे, उसमें से 10 डिजिटल ट्रांज़ेक्शन की तरफ़ गए हो सकते हैं, लेकिन बाक़ी 90 फ़ीसदी को नकद में ही चल रहा है।
दरअसल, जो परिस्थिति हम देख रहे हैं उसमें पुराने तरीके से बाज़ार में नकदी पूरी तरह से चल रही है। लोग अभी भी नकदी का इस्तेमाल उसी तरह कर रहे हैं, जैसे पहले करते थे, ऊपरी सतह पर फ़र्क पड़ा है और वो भी मामूली है।
नोटबंदी कालेधन को सफेद में बदलने की स्कीम तो बिल्कुल नहीं थी, लेकिन सरकार की नौकरशाही सरकार के क़ाबू के बाहर है। नौकरशाही ने नोटबंदी के फ़ैसले के लक्ष्य को ही पूरा नहीं होने दिया। यह जितनी कार्यान्वयन की नाकामी रही उतनी ही सरकार की समझ की असफलता भी रही, क्योंकि केंद्र सरकार समझती है कि ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोक लिया तो सब ठीक हो जाएगा, लेकिन सिस्टम में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार के पास न कोई किसी तरह की प्लानिंग अब तक नजर नहीं आई है।
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