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माइक्रोआरएनए की खोज और नोबल पुरस्कार: जीन की गतिविधि को नियंत्रित करता है माइक्रो आरएनए

Sat, 19 Oct 2024 02:49 PM IST
शशांक द्विवेदी शशांक द्विवेदी
Updated Sat, 19 Oct 2024 02:49 PM IST
सार

Nobel Prize in Physiology or Medicine 2024: दोनों विज्ञानियों को संयुक्त से 10 दिसंबर को पुरस्कार मिलेंगे। माइक्रो आरएनए जेनेटिक मैटेरियल आरएनए का सूक्ष्म हिस्सा होता है जो कोशिका के स्तर पर जीन की कार्यप्रणाली को बदलने देता है।

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Nobel Prize in Physiology or Medicine 2024: The Role Of Micro RNA In Gene Regulation
दोनों विज्ञानियों को संयुक्त से 10 दिसंबर को पुरस्कार मिलेंगे। - फोटो : Nobel_ORG

विस्तार

माइक्रोआरएनए की खोज और ट्रांसक्रिप्शन के बाद जीन एक्प्रेशन को रेगुलेट करने में उनकी भूमिका के लिए अमेरिका के दो विज्ञानियों विक्टर एंब्रोस और गैरी रुवकुन को  साल 2024 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिलेगा।

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नोबेल असेंबली ने कहा- उनकी खोज "जीवों के विकास और कार्य करने के तरीके के लिए मौलिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो रही है।
 

दोनों विज्ञानियों को संयुक्त से 10 दिसंबर को पुरस्कार मिलेंगे। माइक्रो आरएनए जेनेटिक मैटेरियल आरएनए का सूक्ष्म हिस्सा होता है जो कोशिका के स्तर पर जीन की कार्यप्रणाली को बदलने देता है। माइक्रो आरएनए की जीन की गतिविधि को नियंत्रित करने और जीवों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दोनों विज्ञानियों की खोज ने जीन को नियंत्रित करने के नए सिद्धांत के बारे में बताया है। 

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उनके शोध से यह समझने में मदद मिली कि शरीर में कोशिकाएं कैसे काम करती हैं। एंब्रोस ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में माइक्रो आरएनए को लेकर शोध किया। वह यूनिवर्सिटी आफ मैसाचुसेट्स मेडिकल स्कूल में नेचुरल साइंस के प्रोफेसर हैं, जबकि रुवकुन ने यह शोध मैसाचुसेट्स जनरल हास्पिटल और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में किया। पिछले साल कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को चिकित्सा का नोबेल दिया गया था। इन्हें न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया था। इस खोज की वजह से कोरोनावायरस यानी सीओवीआईडी-19 के खिलाफ प्रभावी एमआरएनए टीकों के विकास में मदद मिली थी।

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नोबेल  दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है, जिसके तहत विजेताओं को एक स्वर्ण पदक, प्रमाणपत्र और उसके साथ करीब एक करोड़ स्वीडिश क्रोना (करीब 8.3 करोड़ रुपए) की राशि पुरस्कार स्वरूप दी जाती है। सर अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार, मेडिसिन यानी चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार 1901 से किसी भी देश के उस वैज्ञानिक या संगठन को दिया जाता है, जिसने मेडिसिन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो। यह उन पांच नोबेल पुरस्कारों में से एक है, जिसे सर अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत में सन 1895 में स्थापित किया गया था।

क्या होते हैं माइक्रो आरएनए  

माइक्रोआरएनए एक छोटा अणु है जो जीन गतिविधि को रेगुलेट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भले ही हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में एक जैसे जीन होते हैं, लेकिन विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं, जैसे मांसपेशी और तंत्रिका कोशिकाएं, अलग-अलग कार्य करती हैं। यह जीन रेगुलेशन के कारण संभव है, जो कोशिकाओं को केवल उन जीनों को "चालू" करने की अनुमति देता है जिनकी उन्हें आवश्यकता होती है। यह खोज जीवों के विकास और कार्य करने के तरीके को समझने के लिए मौलिक रूप से महत्वपूर्ण

साबित हो रही है। माइक्रोआरएनए को लेकर एम्ब्रोस और रुवकुन की खोज ने इस विनियमन के होने का एक नया तरीका बताया है। अमेरिकी विज्ञानी विक्टर एंब्रोस ने 1993 में पहला माइक्रो आरएनए खोजा था। जीवविज्ञानी गैरी ब्रूस रुवकुन ने दूसरे माइक्रो आरएनए एलईटी-7 की खोज की थी। उन्होंने पता लगाया कि विक्टर एंब्रोस द्वारा पहचाना गया पहला माइक्रो आरएनए लिन-4 आरएनए को कैसे नियंत्रित करता है।  

Nobel Prize in Physiology or Medicine 2024: The Role Of Micro RNA In Gene Regulation
माइक्रोआरएनए न केवल सी. एलिगेंस में बल्कि सभी जानवरों में पाया जाता है। अबतक एक हजार से ज्यादा माइक्रोआरएनए खोजे जा चुके हैं। - फोटो : AdobeStock

खोज कैसे हुई

हमारे शरीर की हर कोशिका में लगभग 20,000 जीन होते हैं। ये जीन, प्रोटीन बनाने के लिए आवश्यक निर्देशों को एन्कोड करते हैं। प्रोटीन हमारे शरीर के लिए बिल्डिंग ब्लॉक्स की तरह होते हैं। लेकिन हर कोशिका के काम करने का तरीका अलग होता है। जैसे मांसपेशी कोशिका और तंत्रिका कोशिका अलग-अलग काम करती हैं। इसलिए हर कोशिका को अलग-अलग तरह के प्रोटीन की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि हर कोशिका में कुछ खास जीन ही काम करते हैं। ये जीन, कोशिका के आसपास के वातावरण के अनुसार बदलते रहते हैं।

जब कोई जीन काम करना शुरू करता है, तो उस जीन से एक नया अणु बनता है जिसे मैसेंजर आरएनए कहते हैं। यह आरएनए प्रोटीन बनाने के लिए कोशिका के एक हिस्से में जाता है। बहुत समय तक वैज्ञानिकों का मानना था कि जीन की गतिविधि मुख्य रूप से डीएनए से जुड़ने वाले विशेष प्रोटीन द्वारा नियमित होती है, जिन्हें ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर कहा जाता है। लेकिन विक्टर एम्ब्रोस और गैरी रुवकुन ने एक नई खोज की। उन्होंने पाया कि माइक्रोआरएनए नाम के बहुत छोटे अणु भी इस काम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब ये दोनों वैज्ञानिक 1993 में एक सीरिज में लगातार लैब में प्रयोग कर रहे थे, तो तब इन्होंने एक छोटे से कीड़े, सी. एलिगेंस में, एक विशेष प्रकार के मोलिक्युल की खोज की। इस मोलिक्युल को उन्होंने लिन-4  नाम दिया। बाद में यही मोलिक्युल माइक्रोआरएनए कहलाया। इसी तरह साल 2000 में वैज्ञानिकों ने एक और माइक्रोआरएनए, लेट-7  की खोज की। यह माइक्रोआरएनए न केवल सी. एलिगेंस में बल्कि सभी जानवरों में पाया जाता है। अबतक एक हजार से ज्यादा माइक्रोआरएनए खोजे जा चुके हैं।

कैंसर के इलाज के लिए जगी उम्मीद  

इंपीरियल कालेज लंदन में मोलेक्युलर आंकोलाजी की लेक्चरर डॉ. क्लेयर फ्लेचर के अनुसार इस शोध ने कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए विज्ञानियों के रास्ते खोल दिए हैं। माइक्रो आरएनए कोशिकाओं को नए प्रोटीन बनाने के लिए जेनेटिक निर्देश देता है। यह रोगों के उपचार के लिए दवाओं के विकास और बायोमार्कर के रूप में उपयोगी हो सकता है। त्वचा कैंसर के इलाज में माइक्रोआरएनए तकनीक किस तरह से मददगार हो सकती है, यह देखने के लिए क्लीनिकल परीक्षण चल रहे हैं।
  
हमारे गुणसूत्रों में मौजूद जानकारी हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं के लिए निर्देश पुस्तिका की तरह है। हर कोशिका में एक जैसे गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उन सभी के पास निर्देशों का एक ही सेट होता है। लेकिन मांसपेशी और तंत्रिका कोशिकाओं जैसी विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं एक दूसरे से बहुत अलग होती हैं।

यह मनुष्यों सहित दूसरे जीवों के लिए बेहद मायने रखता है। आज, हम जानते हैं कि मानव शरीर में एक हजार से ज्यादा माइक्रो आरएनए होते हैं। ऐसे में उनकी खोज ने हमें जीवों के बढ़ने और काम करने के तरीके के बारे में एक नया पहलू समझने में मदद की है। 1901 के बाद से  चिकित्सा के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह 115वां नोबेल पुरस्कार है।  1901 से अब तक चिकित्सा के क्षेत्र में 229 लोगों को इस सम्मान से नवाजा जा चुका है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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