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Nepal Protests: रक्त रंजित सत्ता संघर्षों का देश नेपाल

Wed, 10 Sep 2025 07:43 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 10 Sep 2025 07:43 AM IST
सार

नेपाल का आधुनिक राजनीतिक इतिहास 1846 से शुरू होता है, जब राणा परिवार ने सत्ता हथियाकर वंशानुगत प्रधानमंत्री प्रणाली स्थापित की। इस दौरान राजा नाम मात्र के प्रतीक बनकर रह गए और राणाओं का निरंकुश शासन 1951 तक चलता रहा।

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Nepal Protests: Nepal is a country of bloody power struggles
नेपाल में हिंसा जारी। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

नेपाल, हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा देश, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व प्रसिद्ध है। किंतु इसकी राजनीतिक यात्रा अस्थिरता, सत्ता संघर्ष और बार-बार बदलती सरकारों से भरी पड़ी है। 19वीं सदी से लेकर 2025 तक नेपाल ने राजतंत्र की जड़ों से लेकर गणतंत्र की स्थापना तक का लंबा सफर तय किया, लेकिन राजनीतिक स्थिरता अब भी एक दूर का सपना बनी हुई है।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजतंत्र से लोकतंत्र तक

नेपाल का आधुनिक राजनीतिक इतिहास 1846 से शुरू होता है, जब राणा परिवार ने सत्ता हथियाकर वंशानुगत प्रधानमंत्री प्रणाली स्थापित की। इस दौरान राजा नाम मात्र के प्रतीक बनकर रह गए और राणाओं का निरंकुश शासन 1951 तक चलता रहा।
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1951 में प्रजातंत्र समर्थक आंदोलनों ने राणा शासन का अंत किया और संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी। परंतु यह स्थिरता अधिक दिन नहीं टिक सकी। 1961 में राजा महेंद्र ने दलों पर प्रतिबंध लगाकर पंचायत प्रणाली लागू की, जो सत्ता को राजसत्ता में केंद्रित करती थी। यह प्रणाली 1990 तक कायम रही, जब जन आंदोलन ने राजा बीरेंद्र को बहुदलीय लोकतंत्र बहाल करने पर मजबूर किया।
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1996 से 2006 तक माओवादी विद्रोह ने नेपाल को रक्तरंजित किया, जिसमें लगभग हजारों लोग मारे गए। इस दौर ने लोकतंत्र की नींव को गहराई से हिला दिया।

2001 के राजपरिवार नरसंहार और 2005 में राजा ज्ञानेंद्र का प्रत्यक्ष शासन राजनीतिक संकट को और गहरा गया। अंततः 2006 के जन आंदोलन और 2008 की निर्णायक घटनाओं ने राजतंत्र का अंत कर नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र बना दिया।

गणतंत्र के बाद: अस्थिर गठबंधन और बदलती सरकारें

2008 से अब तक नेपाल ने 14 सरकारें देखी हैं, जिनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 2015 में नया संविधान लागू हुआ, किंतु राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति जस की तस बनी रही।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल), माओवादी सेंटर और नेपाली कांग्रेस के बीच सत्ता संघर्ष गठबंधन सरकारों को बार-बार अस्थिर करता रहा। के.पी. शर्मा ओली चार बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन हर बार सत्ता समीकरण बिगड़ते ही उन्हें हटना पड़ा। 2022 के चुनावों के बाद प्रचंड प्रधानमंत्री बने, पर 2024 में उन्हें सत्ता से बाहर कर ओली फिर से प्रधानमंत्री बने।

1990 में बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली के बाद नेपाल ने अब तक 32 सरकारें देखी हैं, जिनमें से 13 केवल गणतंत्र बनने के बाद बनीं।

अस्थिरता के कारण: गुटबाजी, भ्रष्टाचार और बाहरी दबाव

नेपाल की अस्थिरता के मूल कारणों में राजनीतिक दलों की गुटबाजी, नेताओं की जवाबदेही की कमी और व्यापक भ्रष्टाचार शामिल हैं। संक्रमणकालीन न्याय की विफलता और माओवादी विद्रोह के बाद मानवाधिकार मामलों का अधूरा निपटारा लोकतंत्र को कमजोर करता रहा है।

इसके साथ ही भारत-चीन की प्रतिद्वंद्विता, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बाहरी प्रभाव भी नेपाल की राजनीति को प्रभावित करते हैं। हाल के वर्षों में हिंदू राष्ट्र और राजतंत्र बहाली की मांग करने वाली ताकतें भी चुनौती बनकर उभरी हैं। गोल्ड स्कैम जैसे बड़े भ्रष्टाचार घोटालों ने जनता का असंतोष और गहरा कर दिया है।

आर्थिक ठहराव और सामाजिक असंतोष

राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर नेपाल की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। 2024 में आर्थिक वृद्धि दर 4% रही, लेकिन निवेश की कमी, कर वसूली की समस्याएँ और बैंकिंग सेक्टर की कमजोर स्थिति कायम है।

आईएमएफ की ऋण सुविधा 2025 में समाप्त हो रही है और अमेरिकी सहायता में कटौती ने नेपाल की निर्भरता भारत और चीन पर और बढ़ा दी है। दूसरी ओर बेरोजगारी, प्रवासन, असमानता और जलवायु संकट जैसे गंभीर मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं।

ताजा घटनाक्रम : संकट के नए आयाम

2025 में हालात और बिगड़े। मार्च में राजतंत्र समर्थकों की हिंसक रैली में दो लोगों की मौत हो गई। अप्रैल में ऋण माफी की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन हुए।

9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री ओली को भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों और सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ उठे जनाक्रोश के बीच इस्तीफा देना पड़ा।

सेना की गश्त, कर्फ्यू और लगातार प्रदर्शन ने स्थिति को और अस्थिर कर दिया है। राजतंत्रवादी अब भारतीय समर्थन के आरोपों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर विरोध की तैयारी कर रहे हैं, वहीं वामपंथी दल गणतंत्र की रक्षा के लिए लामबंद हो रहे हैं।

राजतंत्र से गणतंत्र तक की संघर्षपूर्ण यात्रा

नेपाल का राजनीतिक इतिहास सत्ता संघर्ष और अस्थिरता की दास्तान है। राजतंत्र से गणतंत्र तक की यात्रा जितनी संघर्षपूर्ण रही, उतनी ही अस्थिरता ने देश के विकास को अवरुद्ध किया।

यदि नेपाल को स्थिरता चाहिए तो नेताओं को जवाबदेही, एकता और जन-केंद्रित नीतियों की ओर बढ़ना होगा। अन्यथा यह अस्थिरता न केवल अर्थव्यवस्था को संकट में डालेगी, बल्कि सामाजिक एकजुटता को भी खतरे में डाल देगी।


नेपाल की जनता, जिसने बार-बार आंदोलनों के जरिए बदलाव की इबारत लिखी है, एक बार फिर उम्मीद की किरण बन सकती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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