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चैत्र नवरात्रि विशेष: कश्मीरी नववर्ष और चैत्र नवरात्र

Sun, 30 Mar 2025 03:52 PM IST
Ashish koul आशीष कौल
Updated Sun, 30 Mar 2025 03:52 PM IST
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Navreh or Kashmiri New Year and its celebration
नवरह - फोटो : डॉ. अशिष कौल
नवरह - यह कोई ग्रेगोरियन छलावा नहीं,
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श्री राम ने चुना इसे, अपने राज्याभिषेक का पावन साया!

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता से, गर्व से गूंजता सबसे पुराना कैलेंडर,
5101 वर्षों का साक्षी, कहता है - नव वर्ष मंगलमय हो, ‘नवरह पोश्ते’ की बधाई!

नवरह- यह महज उत्सव नहीं, यह एक संकल्प है गहरा,
सप्तऋषि कैलेंडर का गीत, जो समय के सीने पर चमकता है सारा।
5101 सालों की अनवरत कथा, ब्रह्मांड की धड़कनों का लेखा,
अपने होने पर गर्व करो, अपनी जड़ों को फिर से देखो।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा में बसा है नवरह का आलोक,
प्रतीकों की गहराई में, खगोलीय शक्तियों का अनंत लोक।
ब्रह्मा के प्रकट होने का स्वर, विष्णु की करुणा का आधार,
यह दिन है दिव्यता का, जिसमें बसता है अनंत संसार।
राम का राज्याभिषेक, धर्म की जीत का प्रतीक बना,
नवरह की पवित्रता में, इतिहास का गौरव समा।

नश्वर से परे, ऋषियों और तारों की पुकार,
आध्यात्मिक पथ का दीपक, जो जलता है बार-बार।
चैत्र नवरात्रों के साथ जुड़ा यह पावन संनाद,
मां की नौ रूपों में आराधना, ब्रह्मांड का विकास संनाद।
बिग बैंग के बाद की यात्रा, नौ चरणों का आधार,
शाश्वत माता का आलिंगन, जो जीवन को देता है प्यार।

नवरह का इतिहास गूंजता है समय की सांसों में,
विक्रमादित्य का संवत, ललितादित्य का गर्व गाथाओं में।
मध्य एशिया से तिब्बत तक, फैला था जिसका प्रकाश,
कश्मीर की धरती से उठा, वह स्वर्णिम इतिहास।

शौर्य दिवस अगले दिन, वीरता का गान गाता है,
प्राचीन कश्मीरियों का बल, जो अभी भी जीवित रहता है।
नवरह है नव प्रभात, जीवन का नया उजाला,
नए वस्त्र, दावतें, और अपनों संग हर्ष भरा मेला।
पर सुनो, एक करुण स्वर भी गूंजता है इस आलाप में,
कश्मीरी पंडित, 33 वर्षों से निर्वासित, छूटे अपने आप में।

1990 का वह काला दिन, जब नरसंहार ने सब छीना,
अपनी जड़ों से उखड़े, फिर भी आस्था को सीने से लगाए जीना।
संघर्ष है कठिन, विश्व की प्राचीनतम सभ्यता को बचाने का,
रीति-रिवाज, जो कभी जग को रोशन करते थे, अब मुरझाने का।

सनातन की नींव रखने वाली वह गौरवशाली धारा,
शारदा लिपि की साँसें भी अब ले रही हैं आखिरी किनारा।
कश्मीर में कभी गूंजता था ‘नवरह पोश्ते’ का स्वर मधुर,
आज निर्वासन में भी वह गीत है हमारा सबसे प्यारा पुर।

यह अवसर है जिसने विश्व को गढ़ा, जैसा हम जानते हैं आज,
हम हैं “कश्मीरी पंडित” - बचे हुए संरक्षक, सत्य के साज।
नवरह नहीं सिर्फ एक दिन, यह है हमारी आत्मा की पुकार,
खोई धरती, बिखरे सपने, फिर भी जलता है यह दीया चार।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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