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दूसरा पहलू: लीला जो 1860 में अल्मोड़ा के एक मंदिर से शुरू हुई... आज भी जारी है कुमाऊं की रामलीला

Wed, 01 Oct 2025 06:28 AM IST
ज्योति भास्कर डॉ. राजेंद्र सिंह क्वीरा
डॉ. राजेंद्र सिंह क्वीरा Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 01 Oct 2025 06:28 AM IST
सार

अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर से 1860 में शुरू हुई रामलीला की परंपरा लखनऊ सहित कई शहरों तक पहुंची, जो आज भी जारी है। कुमाऊं की रामलीला को शुरू कराने में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त जोशी की विशेष भूमिका रही थी। पहले रामलीलाओं में पुरुष ही मंचन करते थे, लेकिन अब कई जगह पुरुषों के साथ महिलाएं भी रामलीला में किरदार निभा रही हैं। कुछ जगह सिर्फ महिलाओं की रामलीला पूरे जोर-शोर से होने लगी है।

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Navratri dussehra special play began in temple of Almora in 1860 Ramlila of Kumaon uttarakhand continues today
लीला जो 1860 में अल्मोड़ा के एक मंदिर से शुरू हुई... - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

देवभूमि उत्तराखंड अपनी कला, संस्कृति, उत्सव-पर्व, खानपान, पहनावा व प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यहां के कुमाऊं अंचल की रामलीला की पूरे देश में एक अलग पहचान है। प्राचीन काल से चली आ रही यह रामलीला हमारे समाज में रचती बसती चली गई, और लोगों के बीच उसने अपना एक विशेष स्थान बना लिया। कुमाऊं मंडल में रामलीला नाटक के मंचन का 165 वर्ष पुराना इतिहास रहा है। यहां पर ब्रिटिश काल में सन 1860 से रामलीला का मंचन शुरू हुआ था, जो कि आज भी जारी है।

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सर्वप्रथम रामलीला अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर से प्रारंभ हुई और इसे शुरू कराने में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त जोशी की विशेष भूमिका रही थी। उसके बाद यह रामलीला धीरे-धीरे पूरे कुमाऊं के साथ-साथ गढ़वाल अंचल व उत्तर प्रदेश के बरेली, मुरादाबाद व लखनऊ आदि स्थानों पर भी शुरू हो गई, जो कि आज भी यहां की रामलीला उत्तराखंड के अलावा देश के कई शहरों में देखने को मिलती है।
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यहां की रामलीला मुख्यत: रामचरितमानस की गीत-नाट्य शैली पर आधारित है। गौरतलब है कि रामलीला मंचन में अभिनय करने वाले पात्र कोई पेशेवर कलाकार नहीं होते, सब युवा/स्थानीय लोग ही होते हैं, जो बस एक-दो माह की तैयारी कर पूरे उत्साह के साथ बखूबी अपने-अपने किरदारों को निभाते हैं। सांस्कृतिक नगरी कहे जाने वाली अल्मोड़ा की रामलीला को ऐतिहासिक माना जाता है।
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यहां की आकर्षक व भव्य रामलीला की चर्चा पूरे देश में होती है, यहां रावण परिवार के पुतलों का निर्माण और उनका दहन भव्य होता है। जिसे देखने के लिए देश के अनेक स्थानों से लोग आते हैं। रावण परिवार के पुतलों का निर्माण यहां प्राचीन काल से ही सभी जाति धर्मों के लोग एकजुट होकर करते आए हैं, जो कि यहां की परंपरा व एकता, भाईचारे का विशिष्ठ उदाहरण भी है। यहां की सांस्कृतिक संस्था लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब) इसके लिए वर्षों से विशेष रूप से कार्यरत है।


पहले रामलीलाओं में पुरुष ही मंचन करते थे, लेकिन अब कई जगह पुरुषों के साथ महिलाएं भी रामलीला में किरदार निभा रही हैं। कुछ जगह सिर्फ महिलाओं की रामलीला पूरे जोर-शोर से होने लगी है, जो विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। हल्द्वानी, अल्मोड़ा आदि जगहों पर महिलाओं ने रामलीला मंचन की बागडोर अपने हाथों में लेकर अलग से महिलाओं की रामलीला का आयोजन शुरू कर दिया है। इससे महिला सशक्तीकरण को बढ़ाने के साथ उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक मंच भी मिल रहा है।

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