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राष्ट्रीय युवा दिवस 2020: भारत के युवा क्या सिर्फ लाइनों में लगने और आंदोलन करने के लिए हैं?
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भारत दुनिया का सबसे अधिक युवाओं वाले देश है। इसमें कोई दो राय नहीं कि तकरीबन 60 फीसदी युवा आबादी का आने वाले समय में देश के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृति स्वरूप में बड़ा योगदान होगा।
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युवा ना केवल लीड करेंगे बल्कि निर्माण को साकार करेंगे। जाहिर है किसी भी राष्ट्र का वर्तमान राजनीतिक शीर्ष नेतृत्व इस युवा आबादी को देखकर ना केवल इस पर रश्क करेगा बल्कि इसे अपना गर्व भी मानेगा। यकीनन इसमें कोई संशय भी नहीं होना चाहिए कि युवा हमारी शक्ति है और आने वाले समय का आधाार है। लेकिन इस भावी उपलब्धि की कल्पना के बीच हमें कुछ जमीनी सवालों को लेकर भी सोचना चाहिए।
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दरअसल, युवाओं का वर्गीकरण भारत की असली युवा आबादी का यथार्थ है। इसमें भी कई कैटगरी हैं। रोजगार मांगते युवा, मेहनत करते युवा, बेहतर शिक्षा की मांग करने पर सड़क पर आंदोलन करते युवा, सोशल मीडिया पर लगे हुए युवा, नेताओं की रैलियों में झंडा उठाकर नारे लगाते युवा ये सब हमारे देश के युवा हैं और इन्हीं से बनता है हमारा युवा भारत।
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भारत विश्व का सबसे जवान मुल्क है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 25 वर्ष की आयु वाले लोगों की संख्या 50 प्रतिशत और 35 वर्ष वाले लोगों आबादी 65 फीसदी बताई गई। ये आंकड़े बताते हैं कि हम एक युवा मुल्क के नागरिक हैं। फिर भी सरकारें इन युवाओं की मांगों को लेकर गंभीर नहीं है। युवाओं के जोश को क्यों पुलिस की लाठियों से रौंदा जा रहा है। क्या सत्ता से नजरें मिलाकर अपने हक की मांग कर रहे युवाओं को सरकार अपना विपक्ष समझ बैठी है? क्यों सरकार देश के युवाओं को रोजगार नहीं दे पा रही है। बेरोजगारी से युवा आत्महत्या कर रहे हैं।
भारत की युवा आबादी और उसकी हालत
बेरोजगारी
- फोटो : self
भारत की 10 फीसद आबादी यानी लगभग 13 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। इसमें से आठ करोड़ शिक्षित बेरोजगार हैं। कॉलेजों से हर साल लगभग 50 लाख युवा इस बेरोजगारी की कतार को और लंबी करते जा रहे हैं और सरकार यूनिवर्सिटी में चोर-पुलिस और धर पकड़ का खेल खेल रही है।
सरकार बरोजगारी के मुद्दे को क्यों नहीं गंभीरता से ले रही है। राष्ट्रवाद का झंडा लेकर युवाओं के पीछे पड़ी सरकार इन्हें नौकरी देकर क्यों नहीं राष्ट्रवादी बना लेती है। क्या देश के हर एक युवा अपनी चुनी हुई सरकार से अपने लिए बेहतर शिक्षा की मांग नहीं कर सकता है या नौकरी नहीं मांग सकता? नौकरी दिलाने का वादा तो प्रधानमंत्री जी ने भी तो किया था, लेकिन हकीकत किसी से छिपी नहीं है।
देश की वर्तमान सत्ता क्या विवेकानंद के देश वाले युवाओं को लाठी और वादों के अलावा और कुछ भी देने में समर्थ नहीं है। चुनावी रैलियों में मंच से युवा देश का झंठा बुलंद करते नेताओं के पास इस देश के युवाओं के लिए कोई विजन वाकई में है क्या?
क्या युवाओं के पढ़ने वाले कॉलेजों को सरकार बेहतर नहीं बना सकती? देश में ऐसे सैकड़ों स्कूल-कॉलेज हैं जहां शिक्षक नहीं हैं, स्कूल की इमरातें धूल फांक रही हैं और उसका मैदान चुनाव में मंत्री जी के हेलीकॉप्टर को उतराने के काम आता है।
हम भारत के युवा, अपने गांव-घरों से दूर अपने भविष्य को संवारने के लिए कहीं दूर आए हैं। हम हर रोज अपने हिस्से की मेहनत जी तोड़कर करते हैं। हम पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं और बस सरकार से अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने लिए एक रास्ता चाहते हैं, ताकि हम भी इस देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।
युवाओं के सपने को कब देखेंगी सरकारें?
हमारे भी मन में भी इस देश को विश्व गुरु बनाने के सपने हैं, क्या सत्ता हमारे सपनों को साकार करने में हमारी थोड़ी सी मदद नहीं कर सकती? राजनीति की चश्में से युवाओं को देखने वाली सत्ता को इस देश के नौजवानों के लिए यह चश्मा उतारना होगा, क्योंकि अगर सरकार इस देश के युवाओं को सिर्फ वोट बैंक की राजनीति में बांध देगी, तो वह विवेकानंद के सपनों को पूरा होने से पहले ही तोड़ देगी। हम सड़क पर सिर्फ पिटने के लिए नहीं है। इस देश के कानून ने पुलिस को जो लाठी थामई है, उसे वो हमारी सुरक्षा में उठाए। सरकारें इस देश के युवाओं से जेलें नहीं, इस देश के कॉलेजों को भरे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
सरकार बरोजगारी के मुद्दे को क्यों नहीं गंभीरता से ले रही है। राष्ट्रवाद का झंडा लेकर युवाओं के पीछे पड़ी सरकार इन्हें नौकरी देकर क्यों नहीं राष्ट्रवादी बना लेती है। क्या देश के हर एक युवा अपनी चुनी हुई सरकार से अपने लिए बेहतर शिक्षा की मांग नहीं कर सकता है या नौकरी नहीं मांग सकता? नौकरी दिलाने का वादा तो प्रधानमंत्री जी ने भी तो किया था, लेकिन हकीकत किसी से छिपी नहीं है।
देश की वर्तमान सत्ता क्या विवेकानंद के देश वाले युवाओं को लाठी और वादों के अलावा और कुछ भी देने में समर्थ नहीं है। चुनावी रैलियों में मंच से युवा देश का झंठा बुलंद करते नेताओं के पास इस देश के युवाओं के लिए कोई विजन वाकई में है क्या?
क्या युवाओं के पढ़ने वाले कॉलेजों को सरकार बेहतर नहीं बना सकती? देश में ऐसे सैकड़ों स्कूल-कॉलेज हैं जहां शिक्षक नहीं हैं, स्कूल की इमरातें धूल फांक रही हैं और उसका मैदान चुनाव में मंत्री जी के हेलीकॉप्टर को उतराने के काम आता है।
हम भारत के युवा, अपने गांव-घरों से दूर अपने भविष्य को संवारने के लिए कहीं दूर आए हैं। हम हर रोज अपने हिस्से की मेहनत जी तोड़कर करते हैं। हम पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं और बस सरकार से अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने लिए एक रास्ता चाहते हैं, ताकि हम भी इस देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।
युवाओं के सपने को कब देखेंगी सरकारें?
हमारे भी मन में भी इस देश को विश्व गुरु बनाने के सपने हैं, क्या सत्ता हमारे सपनों को साकार करने में हमारी थोड़ी सी मदद नहीं कर सकती? राजनीति की चश्में से युवाओं को देखने वाली सत्ता को इस देश के नौजवानों के लिए यह चश्मा उतारना होगा, क्योंकि अगर सरकार इस देश के युवाओं को सिर्फ वोट बैंक की राजनीति में बांध देगी, तो वह विवेकानंद के सपनों को पूरा होने से पहले ही तोड़ देगी। हम सड़क पर सिर्फ पिटने के लिए नहीं है। इस देश के कानून ने पुलिस को जो लाठी थामई है, उसे वो हमारी सुरक्षा में उठाए। सरकारें इस देश के युवाओं से जेलें नहीं, इस देश के कॉलेजों को भरे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।