दिल्ली संशोधन अधिनियम 2021: वैधानिक विसंगतियां खत्म हुईं
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किसी भी लोकतान्त्रिक देश के संघीय ढांचे को मज़बूत रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उस देश में उपस्थित हर स्तर की सरकार की शक्तियां और उसकी सीमाएं संविधान द्वारा निर्धारित हों ताकि किसी भी तरह का मतभेद या विसंगति न उत्पन्न हो। भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक एवं विकासशील देश के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि सरकार की शक्तियों के दायरे और परिभाषाएं त्रुटि विहीन हों ताकि सरकार का बहुमूल्य समय और संसाधन ऐसी प्रक्रियात्मक चीजों पर ना व्यर्थ हो। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 में संशोधन के लिये मोदी सरकार द्वारा लाए हुए दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) अधिनियम, 2021 को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
दिसंबर 20, 1991 को देश के तत्कालीन गृहमंत्री श्री एस बी चव्हाण ने हमारे संविधान में अनुच्छेद 239AA और 239AB को जोड़ने के लिए लोकसभा में 69वां संविधान संशोधन विधेयक रखा था। इस संशोधन ने दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) के लिए एक विधान सभा और मंत्रियों की एक परिषद के गठन का मार्ग प्रशस्त किया था। जब विधेयक को मतदान के लिए सदन पटल पर रखा गया, तो इसे लोकसभा के सभी 349 सदस्यों की सर्वसम्मति से पारित किया गया।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और उस समय सरकार के विपक्ष में रहे अटल बिहारी वाजपेयी के साथ-साथ बिल का समर्थन करने वाले सदस्यों में देश के पूर्व गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा के वरिष्ठ नेता मदन लाल खुराना भी शामिल थे जिन्होंने अपनी पार्टी द्वारा पेश किए गए संशोधनों के खारिज किए जाने के बाद भी इस विधेयक के समर्थन में मतदान किया था। इस विधेयक से न केवल दिल्ली में विधानसभा की स्थापना हो पाई और मंत्री-परिषद का गठन हो सका, बल्कि इस विधेयक के परिणाम-स्वरूप दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी हुए और मदन लाल खुराना दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने।
पिछले सप्ताह की शुरुआत में संसद के दोनों सदनों ने दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक, 2021 के पक्ष में भारी मतदान किया। संशोधन का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं में निहित अस्पष्टता को वैधानिक माध्यम से दूर करना है ताकि दिल्ली सरकार के भीतर हितधारकों के लिए एक रचनात्मक नियम-आधारित ढांचा प्रदान किया जा सके जिससे की दिल्ली सरकार केंद्र सरकार के साथ मिलकर सुचारु ढंग से काम कर सके।
दिल्ली में निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के दायित्त्वों को और अधिक स्पष्ट करना भी इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य है। यह नियम-आधारित ढांचा विशेष रूप से इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी भी है और संप्रभु सत्ता का केंद्र होने के कारण इसका एक अपना प्रतीकवाद भी है।
सहकारी संघवाद के लिए एक नियम-आधारित रूपरेखा
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने सहकारी संघवाद का पुरज़ोर समर्थन किया है और इसको प्रोत्साहित करने के लिए उठाए गए एक से एक ऐतिहासिक कदमों से बिल्कुल स्पष्ट है। चाहे योजना आयोग को समाप्त कर के उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना करना हो, जीएसटी परिषद का गठन करना हो, 14वें वित्तीय आयोग के सुझावों को स्वीकार करते हुए केन्द्रीय कर का 42% हिस्सा राज्यों को देना हो और या केंद्रीय योजनाओं का पुनर्गठन करना हो, प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में राज्यों की भागीदारी को बढ़ाने और केंद्र-राज्य के संबंधों को और अर्थपूर्ण बनाने के ये सभी स्पष्ट उदाहरण हैं।
2019 के अपने घोषणा-पत्र में एनडीए ने नीति निर्माण और शासन के सभी पहलुओं में राज्यों की अधिक भागीदारी का वादा किया था जिसके काफी हद तक पूरा किए जाने के कारण आज देश में संघवाद और अधिक मजबूत हुआ है।
इसको लेकर कोई दो राय नहीं हो सकती की सहकारी संघवाद के लिए विश्वास और परस्पर सहयोग के वातावरण की आवश्यकता होती है, और ऐसे वातावरण के लिए कुछ बेहद आवश्यक शर्तें हैं, जैसे कि- भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का स्पष्ट परिसीमन किया जाना, अस्पष्टताओं को दूर करना, और हित-धारकों के बीच कमांड की स्पष्ट श्रृंखला की परिभाषा का स्पष्ट होना। इस संबंध में यह स्पष्ट रूप से परिभाषित करना महत्वपूर्ण था कि दिल्ली के अनूठे मामले में सरकार का प्रतिनिधित्व कौन करता है। एक उदाहरण से यह मुद्दा और भी साफ हो जाएगा।
जून 2015 में दिल्ली विधानसभा ने ‘दिल्ली नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी विधेयक’ को पारित किया और इसे कानून की शक्ल देने के लिए भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा। इस बिल में "सरकार" शब्द को "दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार" के रूप में परिभाषित किया गया था। जनवरी 2017 में उपराज्यपाल ने दिल्ली के विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा, जिसमें यह कहा गया कि राष्ट्रपति ने विधेयक को वापस कर दिया है।
राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को वापस करने के कारणों में से एक कारण सरकार की असंगत परिभाषा थी। उसके बाद दिल्ली विधानसभा ने इस विधेयक का एक संशोधित संस्करण पारित किया जिसमें "सरकार" की परिभाषा को "राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एनसीटी दिल्ली के उपराज्यपाल" के रूप में वर्णित किया गया था।
संसद द्वारा पारित किए गए संशोधन का उद्देश्य भी इसी निरंतरता को लाना है, जिसे अतीत में दिल्ली सरकार द्वारा निश्चित रूप स्वीकार किया गया है और इसे सही भी ठहराया है। इसी तरह यह अधिनियम यह भी सुनिश्चित करेगा कि उपराज्यपाल (एलजी) को और अधिक जवाबदेह बनाया जाए। दिल्ली की जनता को नियम आधारित काम मिले, यही सरकार की प्राथमिकता है।
एक विधायी अधिकार
1991 में पारित संवैधानिक संशोधन संसद को संवैधानिक प्रावधानों के पूरक कानून बनाने का अधिकार देता है, इसी प्रकार एनसीटी दिल्ली सरकार के पास राज्य की सूची और समवर्ती सूची के तहत निर्दिष्ट मामलों के संबंध में उन कानूनों को बनाने की शक्ति है, जो कि एक केंद्र शासित प्रदेश पर लागू होते हैं।
यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि केंद्र सरकार और एनसीटी दिल्ली सरकार के बीच पूर्ण समन्वय बना रहे ताकि विधायी मामलों में कोई अतिक्रमण नहीं हो पाए। जहां तक मामला एनसीटी दिल्ली सरकार का है तो इसको पुलिस, लोक व्यवस्था और भूमि से संबंधित मामलों में कोई विधायी क्षमता नहीं है जो वैसे तो राज्य सूची में हैं, लेकिन केंद्र शासित प्रदेशों के लिए लागू नहीं होते हैं।
अतः इन विषयों पर दिल्ली विधानसभा के विचाराधीन विधायी प्रस्तावों से उत्पन्न वृद्धिशील अतिक्रमण का खतरा दिल्ली के लिए गंभीर संकट साबित हो सकता है। और इसीलिए एक संवैधानिक कृत्य के रूप में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन करने वाली सरकार को ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘फासीवादी’ चित्रित करना विपक्ष नासमझी को प्रदर्शित करता है।
दिल्ली एक कामकाजी सरकार की हकदार है
हमारी राष्ट्रीय राजधानी में देश की विधायिका, संघ सरकार का पूर्ण अधिष्ठान, देश की सर्वोच्च न्यायपालिका, विश्व भर के राजनयिक मिशन और राष्ट्रीय महत्व के अन्य संस्थान आदि मौजूद हैं। ऐसे में हमको यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि यहाँ सुचारू रूप से कामकाज चलता रहे और भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में अस्पष्टता से उत्पन्न होने वाली गलतफहमियों के कारण जनता और राज-काज प्रभावित ना हो। यह लोकतान्त्रिक प्रणाली के सशक्तिकरण के लिए उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है जिसके परिणाम जन-प्रिय ही होंगे।
विपक्ष में एक हिस्से ने इस विधेयक को लेकर सरकार पर देश के संघीय ढांचे को कमज़ोर करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरे हिस्से ने इस विधेयक को ‘लोकतंत्र की हत्या’ करने वाला विधेयक करार दिया है। इस तरह के आरोप न केवल तथ्यात्मक रूप से भ्रामक और सत्य से कोसों दूर है, बल्कि मोदी सरकार के प्रति विपक्ष की कुंठा और द्वेष की एक जीती-जागती मिसाल भी हैं। दिल्ली के लोग एक काम-काजी सरकार के योग्य हैं और इस विधेयक ने ऐसा ही माहौल बनाने में सहायता की है।
(जी किशन रेड्डी गृह राज्य मंत्री हैं और लोकसभा में सिकंदराबाद संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं)
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