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सूत्रधारः इस प्यार को क्या नाम दें....
सार
दीदी कोई नई नौकरीपेशा या छात्रा लग रही थी। पीठ पर पिट्ठू बैग और कुछ भी नहीं। दीदी ने पहले पप्पी (पिल्ले) के साथ-साथ उस बच्चे को दुलारा। पुचकारा। फिर दीदी बच्चे से झुककर
घुल-मिलकर बातें करने लगीं।
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ट्रेन अभी प्लेटफॉर्म पर लगी नहीं थी लेकिन इंडेक्टर दर्शा रहा था कि दीदी का कोच इंजन की तरफ और आगे है
- फोटो : सूत्रधार
विस्तार
इसने दो दिन से दूध नहीं पीया। रेलवे प्लेटफॉर्म पर पिल्ले की ओर इशारा करते हुए एक बच्चा यात्रियों की ओर मुखातिब था। पहली नजर में सभी ने समझा, यह भीख मांगने का कोई नया अंदाज है। किसी ने बच्चे को देखा, तो किसी ने पिल्ले को।
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कोई आगे बढ़ जाता तो कोई जेब में (बटुए में) सिक्के की तलाश में जुट जाता। पिछले पंद्रह-बीस मिनट से यह सब होता रहा। जो भी वहां आसपास से गुजरता, बच्चे और पिल्ले को पुचकारता। बच्चा प्लेटफॉर्म पर ही पिल्ले की आंखों में आंखें डालकर खेलता रहा। पिल्ला भूख की वजह से सुस्त था लेकिन उसकी आंखें भी बच्चे की आंखों की ओर ही थी। दुबके पिल्ले को पुचकारते बच्चे को देखकर हर किसी का ध्यान अनायास उनकी ओर खींच जाता था।
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कोई मोबाइल निकालकर बच्चे और पिल्ले की तस्वीर कैद करता, तो कोई वीडियो बनाता। कोई बच्चे की इस आवाज पर पसीज कर अपनी जेब से सिक्के देकर आगे बढ़ जाता कि इसने दूध नहीं पीया है। तभी अचानक एक दीदी (युवती) आई। दीदी कोई नई नौकरीपेशा या छात्रा लग रही थी। पीठ पर पिट्ठू बैग और कुछ भी नहीं। दीदी ने पहले पप्पी (पिल्ले) के साथ-साथ उस बच्चे को दुलारा। पुचकारा। फिर दीदी बच्चे से झुककर घुल-मिलकर बातें करने लगीं।
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बातों-बातों में दीदी ने लड़के से पूछा, इसके लिए रोज दूध का इंतजाम कैसे करते। क्या दूध के पैसे मिल जाते हैं। इसके दूध का जुगाड़ हो जाता है, तुम क्या खाते हो। पढ़ते नहीं। यह तुम्हें कहां मिला। तुम मांगकर इसे खिलाने-पिलाने के बजाय खुद उन पैसों से पढ़ते-लिखते क्यों नहीं। क्या तुम इसे मुझे दे दोगे, मैं इसका काफी ख्याल रखूंगी। रोज भरपेट दूध पीने को दूंगी। तुम्हारा फ्रेंड कभी भूख्रा नहीं रहेगा। बोले, इसे हमें दोगे। क्या मैं अपने साथ इसे ले जाऊं, अपने घर। ट्रेन से। बच्चे को लगा, दीदी सही ही तो कह रही है।
इसे दूध की कमी नहीं होगी और मुझे इसकी फिक्र नहीं। कुछ देर सोचने के बाद आखिरकार उस बच्चे ने दीदी को पप्पी (पिल्ला) देने पर हामी भर दी। खुशी में दीदी तुरंत प्लेटफॉर्म के एक स्टॉल पर गई। चिप्स-नमकीन के दो छोटे-छोटे पैकेट खरीदकर ले आई। बच्चे को पकड़ाया। चिप्स-नमकीन के पैकेट देखकर बच्चे की आंखों की चमक बढ़ गई। उसने चिप्स के पैकेट लिए और दीदी ने पिल्ले को गोद में लिया। दीदी पप्पी को गोद में लेकर आगे बढ़ने लगी, अपने कोच की ओर। पल भर में देखते-देखते प्यार और बेबसी का सौदा हो गया।
ट्रेन अभी प्लेटफॉर्म पर लगी नहीं थी लेकिन इंडेक्टर दर्शा रहा था कि दीदी का कोच इंजन की तरफ और आगे है। बच्चे से पप्पी को गोद में लेकर युवती अपने कोच की दिशा में आगे बढ़ रही थी। बच्चे की टकटकी अपने फ्रेंड (पिल्ले) की ओर थी। जब तक दोनों (दीदी और पप्पी) दूर ओझल न हो जाएं, उसकी निगाहें उन्हीं पर टिकी रहीं। दोनों नजरों से दूर होते जा रहे थे। बच्चा दीदी और पप्पी को देखता रहा। फ्रेंड की जुदाई बच्चे की आंखों की चमक फीकी करती जा रही है।
चिप्स और नमकीन के पैकेट जो आंखों में जो चमक दिखी थी, वह मंद पड़ने लगी। पप्पी और दीदी को पास से लगातार दूर जाते हुए आखिरकार उस बच्चे से रहा नहीं गया। उसे दीदी (युवती) ने जो दो पैकेट नमकीन-चिप्स के थमाए थे, उसे लेकर वह अमूल के स्टॉल पर पहुंचा। नमकीन-चिप्स के पैकेट को दूध से एक्सचेंज के लिए गिड़गिड़ाने लगा। कहने लगा- अंकल, नमकीन के ये पैकेट ले लीजिए और बदले में एक मिल्क (दूध का ट्रेटा पैक) दे दीजिए।
दुकानदार को दया आ गई। दुकानदार ने दूध (मिल्क का ट्रेटा पैक) पकड़ा दिया और पैसे भी नहीं लिए। दूध का पैकेट लेकर बच्चा दौड़ता हुआ फिर दीदी (युवती) और पिल्ले (फ्रेंड) तक पहुंच गया। ट्रेटा पैक का दूध प्लेटफॉर्म पर उड़ेल कर पप्पी (पिल्ले) को पिलाने लगा। पिल्ला (पप्पी) दूध चाटता रहा और बच्चा उसकी आंखों में देखता रहा। बच्चे को खुशी थी कि वह आखिरी बार अपने फ्रेंड को खिला-पिलाकर विदा कर रहा है। उसे अहसास हुआ अब पप्पी का पेट भर गया है, वह उसके पास ही एक दिन और रह सकेगा। पिल्ले की भूख मिटते जो खुशी उसकी पलकों में दिखी, वह फौरन काफूर हो गई। दीदी फिर पिल्ले को गोद में लेने के लिए आतुर थी।
बच्चा अपने फ्रेंड को दीदी से पीछे छिपाता रहा। अब बच्चा असमंजस में था। क्या करे, फ्रेंड को दीदी के साथ जाने दे या अपने पास ही रखे। इसी उधेड़बुन में प्यार और विरह के बीच बच्चे की आंखें भर आईं। डबडबाई आंखों से उसने आखिरी बार दीदी को नमकीन के वही पैकेट लौटाते हुए कहा, इसे (पिल्ले को) मुझे ही दे दीजिए और आप अपना ये (नमकीन के पैकेट) वापस ले लीजिए। इसके (पप्पी) बगैर मेरा मन नहीं लगेगा।
रोते बच्चे को देखकर दीदी का दिल भी पसीज गया। दीदी ने अपना इरादा बदल दिया। पिल्ले और बच्चे को पुचकारा। दीदी ने गोद से उतारकर बच्चे के हाथों में पिल्ले को पकड़ा दिया। बच्चा अब किसी कीमत पर उसे गोद से नीचे उतारने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था। ट्रेन आईं। दीदी अपने कोच में बैठ गई। खिड़की से एक बार फिर बच्चे और पप्पी को निहारा। बाई किया। बच्चा दीदी को चाहकर भी बाई न कर
सका क्योंकि उसके हाथों में पप्पी था। फिर से फ्रेंड (बच्चा) अब फ्रेंड (पिल्ले) के पास था। बच्चे की आंखों में आंसू अब भी थे। ये आंसू जुदाई-विरहा, बेबसी और पीड़ा के नहीं, खुशी के थे।
आंखों के सामने के इस दृश्य ने मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी पूस की रात के हल्कू-जबरा की पीड़़ा, बेबसी और आत्मीयता की अनायास याद दिला दी।अब आप ही बताएं, इस प्यार को क्या नाम दें.....।
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