मप्र विधानसभा चुनाव 2023.: नए जिलों पर सवार चुनावी जीत की उम्मीदें और सियासी दांव
बीते 40 दिनों में उन्होंने राज्य में 4 नए जिलों की घोषणा कर दी है। सतना जिले से अलग कर मैहर को नया जिला घोषित करना इसकी ताजा कड़ी है और चूंकि विधानसभा चुनाव घोषित होने और आचार संहिता लगने में अभी करीब एक माह का समय बाकी है, इसलिए चार-पांच और नए जिले घोषित हो जाएं तो आश्चर्य नहीं।
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मध्यप्रदेश में भाजपा की सत्ता में वापसी का एक और चुनावी टोटका धड़ाधड़ नए जिलों की घोषणा है। इस मामले में राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रिकॉर्ड बनाने की स्थिति में हैं। बीते 40 दिनों में उन्होंने राज्य में 4 नए जिलों की घोषणा कर दी है।
सतना जिले से अलग कर मैहर को नया जिला घोषित करना इसकी ताजा कड़ी है और चूंकि विधानसभा चुनाव घोषित होने और आचार संहिता लगने में अभी करीब एक माह का समय बाकी है, इसलिए चार-पांच और नए जिले घोषित हो जाएं तो आश्चर्य नहीं।
मैहर को मिलाकर मप्र में अब कुल 56 जिले हो गए हैं। इनमें से 53 का विधिवत गठन हो चुका है और बाकी 3 गठन की प्रक्रिया में हैं। इतने जिलों के साथ मध्यप्रदेश अब आकार के साथ-साथ जिलों की संख्या के मामले में भी देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया है। देश में सबसे ज्यादा 72 जिले उत्तर प्रदेश में हैं तो सबसे कम 2 जिलों वाला राज्य गोवा है।विज्ञापन विज्ञापन
भारतीय प्रशासनिक प्रणाली में जिले का महत्व इसलिए है कि यह देश में त्रिस्तरीय प्रशासन प्रणाली की केन्द्र व राज्य के बाद तीसरी और जमीनी क्रियान्वयन की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, इसीलिए जिला कलेक्टर को इतनी शक्तियां दी गई हैं कि वो एक अर्थ में ‘जिले का मालिक’ ही होता है, इसीलिए हर आईएएस अधिकारी की मंशा यही होती है कि वो कम से कम एक बार तो जिले का कलेक्टर बनकर सत्ता और प्रशासनिक क्षमता दिखाने का सुख भोगे। वैसे किसी भी राज्य में जिलों का गठन मुख्यत: एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके लिए राज्य सरकार पूरी तरह अधिकृत है।
मप्र ही नहीं राजस्थान में भी जिलों की सियासत
वैसे ‘नए जिलों की राजनीति’ करने वाले शिवराज अकेले मुख्यमंत्री नहीं है। राजस्थान में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार ने तो पांच साल में 17 नए जिले बना दिए हैं। जिलों की संख्या के लिहाज में राजस्थान का नंबर देश में तीसरा है। यही चाल कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी चली है। उन्होंने पिछले पांच सालों में राज्य में 5 नए जिले बनाएं हैं, जिससे छत्तीसगढ़ जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य में भी जिलो की संख्या बढ़कर अब 33 हो गई है।
दिलचस्प बात यह है कि राज्य में जो नए जिले बनाए गए हैं, उनमें से ज्यादातर के नाम किसी रेलगाड़ी की तरह हैं। मसलन मोहला- मानपुर- अंबागढ़ चौकी जिला। खैरागढ़-छुईखदान-गडई जिला या फिर मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला। इसका आम बोलचाल में प्रयोग कैसे होता होगा यह सोचने की बात है।
नए जिले बनाने का असली मकसद यही है कि प्रशासन की पहुंच लोगों तक आसानी से हो सके और उसके माध्यम से सरकारी कामकाज सुचारू और द्रुत गति से चल सके, क्योंकि नया जिला बनने से संचार सुविधाएं भी अपने आप बढ़ती हैं। हालांकि आजकल नया जिला बनाना राजनीतिक फैसला ज्यादा बन गया है, क्योंकि अलग जिला बनाना और उसके लिए आंदोलन कर लोगों को एकजुट करना सीधे राजनीतिक लाभांश देने वाली प्रक्रिया है।
इसमें दो राय नहीं कि आकार में विशाल होने के कारण मप्र के कई जिलों में जिला मुख्यालय से गांवों कस्बों की दूरियां काफी हैं। स्थानीय लोगों का ज्यादातर काम जिला मुख्यालय से ही पड़ता है और जिला मुख्यालय मीलों दूर होने से लोगों को असुविधा होती है।
एक अनुभव यह भी है कि छोटे जिलों में प्रशासन का आम लोगों से ज्यादा आसानी से संपर्क हो पाता है और कानून व्यवस्था और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में भी आसानी होती है।
अमूमन यह माना जाता है कि नया जिला बनाने से कम से कम उस जिले के लोगों में जिला गठित करने वाली सरकार के प्रति सहानुभूति पैदा हो जाती है, जिसका चुनाव में अनकूल लाभ मिल सकता है। लिहाजा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह एंटीइंम्बेंसी को बेअसर करने जो तमाम दांव चल रहे हैं, उनमें एक नए जिलों का गठन भी है।
अपने 18 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में देश में दूसरे सबसे ज्यादा नए जिले बनाने वाले सीएम के रूप में भी उन्हें याद किया जाएगा। अभी यह सेहरा अशोक गहलोत के नाम है। छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद विभाजित मप्र में कुल 45 जिले बचे थे, जो अब बढ़कर 56 हो गए हैं। यानी 23 साल में राज्य में 11 नए जिले बन चुके हैं तथा 15 और नए जिलों की मांग और हो रही है।
जिलों के इतने लंबे और उच्चारण में कठिन नाम रखने के पीछे केवल राजनीतिक तुष्टिकरण ही हो सकता है ताकि किसी क्षेत्र के लोगों को यह न लगे कि उनके शहर का नाम जिले के नामकरण में कहीं नहीं हैं।
यहां असल सवाल यह है कि नए जिले गठित करने से क्या सरकारों को अपेक्षित चुनावी लाभ मिलता है या मिल सकता है? इसका गारंटीड जवाब मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि विभिन्न प्रदेशों में कई जिले लंबे राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन के बाद बने हैं तो कई को अभी और इंतजार करना पड़ेगा। कई जिलों को लेकर प्रश्न चिन्ह भी हैं।
भारत में तीन स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था है। ये है केन्द्र, राज्य और जिला। इसलिए जिलों का अपना महत्व है, जो जमीनी स्तर पर प्रशासनिक की अहम इकाई होती है। हालांकि जिलों का गठन पूरी तरह से राज्य सरकार के हाथों में होता है। उसे केवल इसकी सूचना केन्द्र सरकार को देनी होती है। जहां तक इसके राजनीतिक लाभ का प्रश्न है तो कोई भी नवगठित जिला स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति तो करता ही है। एक और महत्वपूर्ण बात क्षेत्रीय अस्मिता के साथ साथ सीमित उपक्षेत्रीय पहचान का संरक्षण भी नए जिलों के माध्यम से होता है।
साथ ही मंत्रियों और विधायकों की राजनीतिक दबंगई की दृष्टि से भी अलग जिला मायने रखता है। सत्तारूढ़ दल में भी जिले में किसकी चलेगी, प्रशासन किसकी बात को तवज्जो देगा, यह अहम मुद्दा रहता आया है। मप्र में इसी राजनीतिक रूआब को लेकर मंत्रियो में सिर फुटौव्वल तक हो रही है।
नया जिला इस राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई को नए तुष्टिकरण में बदलने का काम भी करता है। इसके अलावा यदि नया जिला किसी लंबे संघर्ष के बाद बना है तो सत्तारूढ़ दल के प्रति एक सहज रूझान अपने आप बन जाता है और चुनाव में इसके वोट में तब्दील होने की पूरी संभावना होती है।
इस दृष्टि से मुख्यमंत्री और भाजपा को उम्मीद है कि नए जिलों से उन्हे पर्याप्त समर्थन मिलेगा। हालांकि, इसके बारे में दावे से कुछ नहीं जा सकता। लेकिन यह अपने आप में लोगों की मांग पूरी करने तथा इसके जरिए सियासी लाभ अर्जित करने के विश्वास को बल तो देता ही है। हां, इसका चुनावी लाभ किसे और कितना मिलेगा, यह तो नतीजे ही बताएंगे।
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