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Mother's day 2024: जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच जीवन की प्राण वायु है मां

Sun, 12 May 2024 09:37 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Sun, 12 May 2024 09:37 AM IST
सार

मातृत्व को धारण करने के उपरांत एक मां का सारा संसार उसके बच्चे के इर्द-गिर्द ही रच बस जाता है। उसका अपना अस्तित्व मातृत्व के भीतर खो जाता है। शेष रह जाती है तो केवल मां।

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Mothers day 2024 importance of mothers day and Know the Important Role of Mother in Our Life
मातृत्व को धारण करने के उपरांत एक मां का सारा संसार उसके बच्चे के इर्द-गिर्द ही रच बस जाता है। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

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‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गति:
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति  मातृसमा प्रिया’

अर्थात् माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। मां जीवन की प्राण वायु है। वह जीवन की जननी, पहली गुरु और सृष्टि के चक्र की केंद्रीय धुरी है। इसलिए कहा भी गया है कि ‘स्त्री ना होगी जग म्हं सृष्टि को रचावै कौण, ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन'। अर्थात् यदि स्त्री नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी।

स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ है। जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की तभी से सृष्टि की शुरुआत हुई| ‘स्त्री का मातृत्व’ ही उसे पुरुष से श्रेष्ठ बनाता है। तभी तो लोक जीवन में कहा गया है ‘मातृ देवो भव:’। अर्थात इस सृष्टि में माता का स्थान देवताओं से भी बढ़कर है क्योंकि वह सृजन का आधार है| वह सृजन की उस पीड़ा को न केवल सहती है बल्कि उसके लिए अपने संपूर्ण व्यक्तित्व व जीवन का त्याग कर देती है।

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मातृत्व को धारण करने के उपरांत एक मां का सारा संसार उसके बच्चे के इर्द-गिर्द ही रच बस जाता है। उसका अपना अस्तित्व मातृत्व के भीतर खो जाता है| शेष रह जाती है तो केवल मां। “‘घर के सबसे उपेक्षित कोने में बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ/ मथढक्की की साड़ी के नीचे पैंतीस सालों से दबा पड़ा है, मां की डिग्रियों का एक पुलिंदा”। हमारे आसपास व घरों में हमारी माओं के बंद बक्सों में कितनी कहानियां मौजूद है जो उनके जाने के बाद ही खुल पाते हैं।

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Mothers day 2024 importance of mothers day and Know the Important Role of Mother in Our Life
यह ‘दिवस’ जीवन की भाग-दौड़, जद्दोजहद के बीच अपनों के साथ और जीवन को पुन: जीने की एक कोशिश है - फोटो : Amar Ujala

हम सभी के जीवन का केंद्र मां रही है। बदलते समय और भाग-दौड़ भरी जिंदगी के बीच हमारे संबंध धीरे-धीरे शिथिल पड़ते जा रहे हैं। मातृत्व की छाया से बाहर हमने अपने लिए नए आशियाने बना लिए है, जिनमें सभी आधुनिक सुख-सुविधाएं तो मौजूद है लेकिन जो नहीं है, वह है अपनों का साथ। हम अपनों से पिछड़ रहे हैं और आधुनिकता से जुड़ रहे है। हम जीवन के श्रेष्ठ अनुपम उपहार मातृत्व के स्नेह की छाया से दूर होकर एकांगी व असहाय के रूप में जीवनयापन करने को मजबूर हो रहे है और जब कभी हम पीछे लौट भी रहे हैं तो केवल स्मृतियां को ही शेष पा रहे हैं।
 

यह ‘दिवस’ जीवन की भागदौड़, जद्दोजहद के बीच अपनों के साथ और जीवन को पुन: जीने की एक कोशिश है क्योंकि सब कुछ पाने की लालसा में हमारे माता-पिता हमसे छूट रहे हैं। ऐसे में यह ‘दिवस’ उनके स्मृति बनने से पूर्व उनके जीवन में प्रेम भरने व भावी पीढ़ी से उनके जीवनानुभवों को साझा करने का अवसर देता है। यह दिवस मातृत्व के सम्मान एवं उनके अस्तित्व के अहसास का दिवस है, जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था में कभी सम्मान नहीं दिया गया और वह आजीवन परिवार, समाज व युद्ध की भूमि में अपना शारीरिक व भावनात्मक लहू बहाती रही। हम भूल जाते हैं कि माताएं ही भविष्य के विषय में विचार कर सकती हैं, क्योंकि वे अपनी संतानों में भविष्य को जन्म देती है।


हम अक्सर दिवसों को मनाए जाने का विरोध करते हैं क्योंकि अपनों के लिए तो प्रत्येक दिन ही दिवस के समान होता है। मगर वर्तमान समय का यथार्थ है कि हम रोजगार व अन्य कारणों से अकेले रहने पर मजबूर है। ऐसे में यह दिवस थोड़े समय के लिए ही सही हमें उनके होने का अहसास कराता है और संबंधों को नई ऊर्जा देता है। अन्यथा महानगरों में अकेले जीवनयापन करते बुजुर्ग और उनकी दयनीय मृत्यु की अनेक घटनाएं मौजूद है, जिनके अपने ही अंतिम समय में उनके पास नहीं पहुंच पाते हैं और यह घटनाएं उनमें अपराधबोध को जन्म देती है, वह जीवनपर्यंत तक जिसमें घुटते रहते है। “वह जब थी/ उससे इस शहर को और इस घर को नहीं था कोई सरोकार कि अपनी पीड़ाओं और संघर्षों के साथ वह कितनी अकेली थी ...आज जब वह जा रही है तो लगने लगा है सहसा मुझे इस घर को और पूरे शहर को कि वह थी ... वह थी और अब नहीं रही” 

Mothers day 2024 importance of mothers day and Know the Important Role of Mother in Our Life
अन्ना जार्विस द्वारा मई 1908 में वेस्ट वर्जिनिया के ग्राफ्टन में मेथोडिस्ट चर्च में पहला अधिकारिक मातृ दिवस मनाया था। - फोटो : Amar Ujala

पूरी दुनिया में आज मातृत्व दिवस 

आज मई का दूसरा रविवार है। इस कारण से 12 मई 2024 को ‘मातृ दिवस’ के रूप में विश्व (यूनाइटेड किगडम, इथोपिया, जर्मनी, जापान, सर्बिया, पैरु, फ़्रांस आदि में मनाया जा रहा है। ‘मातृ दिवस’ को मनाने का श्रेय कुछ लोग जूलिया वार्ड होवे को देते हैं तो कुछ ऐन रीव्स जार्विस की बेटी अन्ना जार्विस को। यह समय युद्धों का था। इस दिवस की परिकल्पना भी युद्ध के उपरांत किसी एक दिन को माताओं के त्याग का सम्मान करने के प्रति समर्पित ‘मदर्स पीस डे’ के रूप में की गई थी।
 

अन्ना जार्विस द्वारा मई 1908 में वेस्ट वर्जिनिया के ग्राफ्टन में मेथोडिस्ट चर्च में पहला अधिकारिक मातृ दिवस मनाया था। उन्होंने ‘मातृ दिवस’ को राष्ट्रीय अवकाश बनाने का अभियान चलाया था जिसके लिए उन्होंने ‘मदर्स दे इंटरनेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की थी। अधिकारिक रूप से मई 1914 में राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस के रूप में मनाए जाने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और इस दिवस को बच्चों के लिए किए गए माओं के त्याग का सम्मान करने के एक तरीके के रूप में मनाया जाने लगा।


भारत में भी आधुनिक जीवन शैली, बदलते भाव बोध के कारण रिश्तों में उत्पन्न दूरी को यह दिवस कम करने का प्रयास करता है। यह मां के त्याग, स्नेह और उसके भीतर के द्वंद्व को पुन: स्मृति का केंद्र बनाता है। ‘मातृत्व’ के पीछे स्त्री जीवन के संपूर्ण बलिदान को पुन: याद करने और अपनी माँ के विशेष होने का भाव जगाता है। अक्सर संबंधों में उदासीनता व समयाभाव के कारण हमारे लिए माएं पहले स्मृति और फिर कविता का केंद्र बन जाती है।

“मैं नहीं जानता पर क्योंकि नहीं देखा है कभी पर जो भी जहां भी लीपता होता है गोबर के घर आंगन, जो भी जहां भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुमकुम से अल्पना, जो भी जहां भी लोहे चिंता भरी आंखें लिए निहारता होता है दूर तक का पथ, वही हैं वहीं है मां।

भारतीय परिवारों में मां जीवन की लय होती है। यदि यह टूटती व छूटती है तो मनुष्य का संपूर्ण जीवन बिखर जाता है। आज के समय में मातृ दिवस हमें अपने जीवन की लय मां के स्नेह, निस्वार्थ प्रेम, त्याग को याद कराता है। ताकि हम समय रहते अपनों के प्रति कृतज्ञ हो सकें। अन्यथा समय की इस तेज़ धारा में सभी संबंध पीछे छूटते जा रहे हैं और अपनों में अकेलापन और अवसाद गहराता जा रहा है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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