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Maharashtra Politics: सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में शिवसेना, मंत्रिमंडल के साथियों और विधायकों का असंतोष पड़ा भारी

Sun, 03 Jul 2022 06:49 PM IST
Prem shukla प्रेम शुक्ल
Updated Sun, 03 Jul 2022 06:49 PM IST
सार

यह स्पष्ट है कि ठाकरे परिवार अपने संगठन से नित्य संपर्क से कट चुका था । उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य ठाकरे अपने दरबारियों से इस कदर घिरे हुए थे कि उन्हें शिवसैनिकों का दर्द दूर अपने मंत्रिमंडल के साथियों और विधायकों के असंतोष तक से भी पूरी तरह अनभिज्ञ थे।

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उद्धव ठाकरे के लिए चुनौतियों से भरा दौर - फोटो : पीटीआई

विस्तार

शिवसेना अपने स्थापना काल के बाद सबसे भयंकर चुनौती का सामना कर रही है  ।बीते छह दशकों के इतिहास में शिवसेना को बारंबार बगावतों का सामना करना पड़ा, पर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए, यह पहली बार हुआ है। हालांकि महाराष्ट्र के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे स्वयं को असली शिवसेना और शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का शिष्य करार दे रहे हैं।

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जिस तरह से उन्होंने शिवसेना के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित किया, जिस अंदाज में उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल में शामिल सभी के सभी निर्वाचित विधानसभा सदस्यों ने एकनाथ शिंदे के पाले में आकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व को धता बताया, उससे यह स्पष्ट है कि ठाकरे परिवार अपने संगठन से नित्य संपर्क से कट चुका था ।
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उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य ठाकरे अपने दरबारियों से इस कदर घिरे हुए थे कि वह शिवसैनिकों का दर्द से दूर अपने मंत्रिमंडल के साथियों और विधायकों के असंतोष तक से भी पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
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शिवसेना का विरोध से पुराना नाता

स्थापना काल के बाद कई बार शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे को विद्रोह का सामना करना पड़ा । 1977 में जब जनता पार्टी का दौर आया तब हेमचंद्र गुप्ते और दत्ता प्रधान ने शिवसेना के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए ठाकरे से दूरी बना ली थी। तब शिवसेना के पहले महापौर रहे हेमचंद्र गुप्ते ने ना केवल जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी बल्कि बाला साहब ठाकरे के नेतृत्व को चुनौती भी दे दी थी ।

हेमचंद्र गुप्ते शिवसेना के गढ़ दादर से विधानसभा का चुनाव जीतने में सफल भी हुए थे। सनद रहे कि शिवसेना में आज जो संगठन का स्वरूप है उसके शिल्पकार दत्ता प्रधान हुआ करते थे। उन्होंने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तर्ज पर शिवसेना में शाखा नामक इकाई का प्रचलन प्रारंभ किया था। जब दत्ता प्रधान शिवसेना से अलग हुए तब लोगों के मन में सवाल उठा था कि क्या शिवसेना अपने सांगठनिक स्वरूप को आगे बढ़ा पाएगी? 

उन दिनों ऐसा भी दौर आया जब मनोहर जोशी और सुधीर जोशी बाला साहब ठाकरे के पास गए और दोनों ने प्रस्तावित किया कि अब शिवसेना के बने रहने का कोई औचित्य शेष नहीं है। तब बाला साहब ठाकरे ने कहा था-

जो चाहे वह सहर्ष शिवसेना से बाहर जा सकता है, मैं अपने बूते शिवसेना चला लूंगा।


अपने अस्तित्व को बचाने के लिए शिवसेना को मुस्लिम लीग और कांग्रेस से भी गठबंधन करना पड़ा था।  मस्तान तलाव पर शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे और मुस्लिम लीग के सर्वे सर्वा गुलाम बनातवाला की ऐतिहासिक सभा को तो आज के शिवसेना के कर्ताधर्ता विस्मृत कर चुके होंगे । 1980 में बालासाहेब ठाकरे को कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के साथ समझौता करना पड़ा था और 1985 में मुंबई महानगर पालिका में शिवसेना वसंतदादा पाटील के प्रश्रय के बिना सत्ता में नहीं पहुंच पाती ।

शिवसेना को मुंबई और ठाणे महानगरपालिका के अलावा बड़ी सफलता तब मिलनी  प्रारंभ हुई जब बालासाहेब ठाकरे ने स्वयं को हिंदू हृदय सम्राट की भूमिका में जनता के समक्ष पेश किया । 1987 के विलेपार्ले विधानसभा के उप चुनाव के पहले शिवसेना के केवल दो ही विधायक निर्वाचित हुए थे।

पहली बार 1972 में वामन राव महाडिक परेल विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतने में कामयाब हुए थे। जबकि दूसरी बार 1985 के विधानसभा चुनाव में छगन भुजबल मझगांव से विधानसभा में निर्वाचित होकर आए थे।

1987 में जब हिंदुत्व के मुद्दे पर ललकार कर रमेश प्रभु शिवसेना प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए और शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन हुआ, तब 1990 के विधानसभा चुनाव में पहली बार शिवसेना मुंबई के बाहर अपना खाता खोलने में कामयाब हुई । शिवसेना के 51 विधायक निर्वाचित हुए थे ।

विधानसभा में विपक्ष का नेता पद पाने की होड़ में शिवसेना के विधायक दल की पहली बगावत 1991 में छगन भुजबल ने की, तब भुजबल ने शिवसेना के 18 विधायकों को तोड़ने का दावा किया था। किंतु तत्कालीन सुधाकरराव नाईक सरकार के पूर्ण प्रश्रय के बाद भी भुजबल केवल 12 विधायक तोड़ने में कामयाब हुए थे।

यदि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष मधुकर राव  चौधरी ने संवैधानिक खेल नहीं किया होता तो तब के दलबदल अधिनियम के अनुकूल भी भुजबल के पास संख्या बल नहीं था। 1995 में जिस तरह भुजबल को मझगांव में बाला नांदगांवकर के हाथों शिवसेना ने पराजित करने में सफलता हासिल की थी, उससे यह संदेश गया था कि शिवसेना तोड़कर कोई अपना अस्तित्व विस्तृत नहीं कर सकता।

1999 में गणेश नाईक ने भी बगावत की और नई मुंबई महानगरपालिका हमेशा के लिए वह शिवसेना से छीनने में कामयाब हुए। किंतु 1999 के विधानसभा चुनाव में  में जिस तरह आनंद दिघे की व्यूह रचना के कारण गणेश नाईक को पराजित होना पड़ा उससे भी शिवसेना के विद्रोहियों को कड़ा संदेश गया ।

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मंत्रिमंडल के साथियों और विधायकों के असंतोष पड़ा भारी - फोटो : Shivsena

नारायण राणे  की बगावत 

2005 में जब सोनिया गांधी के प्रश्रय से नारायण राणे ने शिवसेना से बगावत की तब विधायक दल का नेता होने के बावजूद नारायण राणे अपने साथ बमुश्किल 10 विधायक ही ले जा सके । उन्हें अलग गुट के रूप में मान्यता भी नहीं मिली बल्कि नारायण राणे को अपने विधायकों से त्यागपत्र दिलाकर उपचुनाव का सामना करना पड़ा।

छगन भुजबल और नारायण राणे की बगावत में सिर्फ इतना अंतर था की छगन भुजबल को बगावत के बाद शिवसैनिकों के रोष से बचने के लिए छिपना छुपाना पड़ा था। जबकि नारायण राणे ने सड़क पर उतर कर शिव सैनिकों के साथ मुकाबला भी किया था।


जब नारायण राणे उप चुनाव लड़ने के लिए कणकवली गए तब वहां गए कई शिव सैनिकों को राणे समर्थकों ने जमकर धुनाई भी की थी। नारायण राणे के भय से उद्धव ठाकरे के निजी सचिव मिलिंद नार्वेकर और शिवसेना नेता सुभाष देसाई को सुरक्षा व्यवस्था भी प्रदान करनी पड़ी थी । फिर भी उस बगावत में नारायण राणे पर उद्धव ठाकरे भारी पड़े थे। यही हाल राज ठाकरे का भी रहा।

शिवसेना को जानने वाले अधिकांश विशेषज्ञों का मानना था कि राज ठाकरे शिवसेना को नियंत्रित करने में उद्धव ठाकरे पर 20 पड़ेंगे। किंतु स्वयं बालासाहेब ठाकरे की मौजूदगी और उद्धव ठाकरे के परिश्रम के कारण राज ठाकरे विशेषज्ञों की आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाए। 


2007 के मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में वे विफल रहे। 2008 में जब राज ठाकरे ने मराठी मानुष का मुद्दा जमकर उछाला और शिवसेना को मराठी मुद्दे से हटकर हिंदुत्व के कारण गैर मराठियों की पार्टी बताना प्रारंभ किया। तब मुंबई ,पुणे और नासिक में राज ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को कुछ हद तक स्थापित करने में कामयाब हुए थे।

तब भी शिवसेना के पास राज ठाकरे की तुलना में 3 गुना से कहीं अधिक विधायक संख्या थी । राज ठाकरे के 13 विधायकों की तुलना में शिवसेना के 45 विधायक निर्वाचित हुए थे । कालांतर में राज ठाकरे हाशिए पर चले गए।

मौजूदा परिस्थितियां अलग

इस बार परिस्थितियां बिल्कुल बदली हुई हैं। शिवसेना के कुल 55 विधायकों में से 39 एकनाथ शिंदे के साथ हैं। संभवत: विश्वास मत हासिल करने तक यह आंकड़ा और बढ़ जाए । शिंदे की बगावत के बाद जब उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी आहूत की तब मुंबई के परिसर के सात जिला प्रमुखों में से 5 जिस तरह से एकनाथ शिंदे के पक्ष में दिखाई दिए ,उससे साफ संकेत गया है कि उद्धव ठाकरे शिवसेना पर अपना नियंत्रण हो चुके हैं।

सांसदों में भी उद्धव ठाकरे की तुलना में एकनाथ शिंदे के समर्थकों का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। चूंकि महाराष्ट्र की अधिकांश महानगर पालिकाओं में समय अवधि पूर्ण होने के कारण वहां प्रशासक नियुक्त किए जा चुके हैं, इसलिए पार्षदों में किसको बढ़त हासिल है यह अभी सटीक संख्या नहीं बताई जा सकती।

किंतु इतना तय है की ठाणे, कल्याण - डोंबिवली ,उल्हासनगर और भिवंडी -निजामपुर जैसी शिवसेना के नियंत्रण वाली महानगरपालिका अब शिंदे गुट के नियंत्रण में है । मुंबई में भी यदि शिंदे गुट उद्धव ठाकरे गुट पर भारी पड़ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

मुंबई में प्रकाश सुर्वे, यामिनी जाधव ,दिलीप लांडे, मंगेश कुडालकर जैसे विधायक एकनाथ शिंदे के साथ जा चुके हैं। जिन नगर सेवकों को अब कांग्रेस और राकांपा के साथ मिलकर जीत की संभावना नजर नहीं आएगी वह शिंदे का सहारा लेने में संकोच नहीं करेंगे। विधायक दल जिस तरह से एकनाथ शिंदे के प्रभुत्व में है उसके कारण मुंबई के उद्धव ठाकरे गुट के विधायक चाहे आदित्य ठाकरे हों ,सुनील राऊत, सुनील प्रभु या रविंद्र वायकर इनकी भी सदस्यता पर संवैधानिक संकट आसन्न  है।

आने वाले दिनों में यदि निर्वाचन आयोग के समक्ष भी एकनाथ शिंदे गुट दावा पेश करता है तो उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह और संगठन अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। 

जब हेमचंद्र गुप्ते ने शिवसेना से विद्रोह किया था तब राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने इस विद्रोह  को महत्त्व भी नहीं दिया था । जब छगन भुजबल शिवसेना से बागी हुए थे तब वे शिवसेना का कैडर हिला पाने में कामयाब नहीं हुए थे। जब नारायण राणे उद्धव ठाकरे को चुनौती देते हुए शिवसेना से बाहर गए थे तब भी शिवसेना का कैडर टस से मस नहीं हुआ था, लेकिन इस बार जहां भी शिव सैनिकों ने प्रदर्शन करने का उत्साह दिखाया वहां उनसे कई गुना ज्यादा शिवसेना के बागी सशक्त नजर आए।

चाहे जलगांव में गुलाबराव पाटिल हो कोकण में भरत गोगावले हों, मराठवाड़ा में तानाजी सावंत या फिर कल्याण में श्रीकांत शिंदे इनके समर्थक शिव सैनिकों पर भारी पड़ रहे हैं । शिवसेना का न  तो  विधायक दल प्रबल है और ना ही सड़क पर उतरने वाली उनकी मारधाड़ करने वाली सेना। ऐसे में संभव है एकनाथ शिंदे शिवसेना के विधायक दल के साथ साथ पूरी शिवसेना को ही अपने नियंत्रण में करने में कामयाब हो जाएं । यदि यह संभव हुआ तो शिवसेना बालासाहेब ठाकरे के विचारों वाली तो होगी पर ठाकरे वंश से मुक्त हो जाएगी ।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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