संघवाद: अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल में मोदी इंदिरा से पीछे, पर इन पांच तरीकों से खत्म किया जा रहा संघवाद
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विस्तार
भारतीय संघवाद हाल ही में सुर्खियों में था। गणतंत्र दिवस की परेड के लिए तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल की सरकारों द्वारा तैयार की गई झांकियों को शामिल करने से इनकार किए जाने को गैरभाजपा शासित इन राज्यों पर प्रतीकात्मक हमले के तौर पर देखा गया। संसद के मौजूदा सत्र में विपक्षी सांसदों ने सांविधानिक कायदों और सिद्धांतों का उल्लंघन कर राज्यों के अधिकारों को कमतर करने को लेकर केंद्र पर तीखे हमले किए हैं।
भारतीय संघवाद पर पहला बड़ा हमला 1959 में केरल में संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर वहां की निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार की बर्खास्तगी के रूप में हुआ था। उस कदम को भड़काने वालों में कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी और गृहमंत्री गोविंद बल्लभ पंत शामिल थे। फिर भी, प्रधानमंत्री होने के नाते यह कार्रवाई नेहरू की लोकतांत्रिक साख पर धब्बा बनी हुई है।
प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के कार्यकाल में अनुच्छेद 356 का आठ बार इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने अपने दो कार्यकालों (1966 से 1977 और 1980 से 1984) में पचास बार इसका इस्तेमाल किया, औसतन साल में तीन बार। अनुच्छेद 356 का खासतौर से दो चरणों में इस्तेमाल किया गया, पहला, 1970-71 में, जब श्रीमती गांधी ने कांग्रेस पार्टी को विभाजित किया और अपने गुट को राज्य सरकारों पर वह हावी करना चाहती थीं, और दूसरा 1980 में केंद्र की सत्ता में लौटने के बाद जब कई राज्यों में दूसरी पार्टी की सरकारें थीं।
भारतीय राजनीति में इंदिरा युग का 1989 में अंत हो गया, जब उनके पुत्र राजीव गांधी प्रधानमंत्री रहते चुनाव हार गए। इसके बाद शुरू हुआ ऐसा दौर, पीछे लौटकर देखने में जो भारतीय संघवाद का स्वर्ण युग लगता है। लाइसेंस-परमिट राज का खात्मा और आम चुनावों में किसी एक दल को बहुमत न सौंपने की नागरिकों की समझदारी ने आर्थिक विकास में तेजी लाई और शासन की सहयोगात्मक भावना का पोषण किया। केंद्र और राज्यों के बीच सम्मान का माहौल पनपा और इसका लाभ दिखने लगा।
हालांकि, 2014 और 2019 के आम चुनावों में भाजपा के बहुमत हासिल करने के साथ, संघवाद फिर खतरे में आ गया है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर साढ़े सात साल हो गए हैं और इस दौरान अनुच्छेद 356 का आठ बार इस्तेमाल किया गया है, यानी साल में एक बार। इस एक कसौटी के आधार पर कहा जा सकता है कि राज्यों के अधिकारों का सम्मान करने के मामले में मोदी इंदिरा गांधी से उदार हैं। पर अन्य तरीकों से उन्होंने भारतीय संघवाद को किसी भी प्रधानमंत्री की तुलना में कहीं अधिक कमजोर और कमतर किया है। आइए उनकी गणना करें।
पहला, राज्यों से मशविरे के बिना महत्वपूर्ण नीतियां बनाई गईं और बड़े कानून पारित किए गए, जबकि इन्हें राज्यों को ही लागू करना है। बेशक, कृषि कानून (जिन्हें अब वापस ले लिया गया है) इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं, पर शिक्षा, कोऑपरेटिव, बैंकिंग इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों से संबंधित नीतियों व कानूनों के बारे में केंद्र ने पहले फैसला ले लिया, फिर उन्हें राज्यों पर थोपना चाहा।
दूसरा, हालांकि कानून व्यवस्था राज्य का विषय है, फिर भी मोदी सरकार ने राज्य सरकारों के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में उनकी क्षमता और स्वायत्तता को कमतर कर अपने आदेश का पालन करवाने के लिए हरसंभव प्रयास किया है। अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए (बजाय असली आतंकवादियों की शिनाख्त करने के) यूएपीए के मनमाने इस्तेमाल और राज्य दर राज्य एनआईए (2008 के मुंबई में हुए हमले के बाद सीमित और खास उद्देश्य के लिए जिसकी स्थापना की गई) को भेजकर मोदी सरकार दंडात्मक शक्तियों को अपने हाथों में केंद्रीकृत करना चाहती है।
कोविड महामारी ने राज्यों के साथ सक्रिय रूप से परामर्श कर देश को साथ लाने का बड़ा अवसर प्रस्तुत किया। इसके बजाय मोदी सरकार ने शुरू से ही एकतरफा कार्रवाई की है। इसे महामारी मानने के लिए उसने तब तक इंतजार किया, जब तक कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार (जो कि छल-कपट और दबाव से बनी थी) शपथ न ले ले। इसके बाद राज्यों से मशविरा किए बिना, यहां तक कि मंत्रिमंडल के सदस्यों से चर्चा के बिना प्रधानमंत्री ने चार घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन का एलान कर दिया। उससे काफी पहले राज्यों से सलाह के बिना राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (एनडीएमए) लागू कर दिया गया था।
करीब दो साल बाद और वायरस पर विजय के सरकार के दावों के बावजूद अधिनियम यथावत है। चूंकि यह अधिनियम केंद्र को लोगों और सामान की आवाजाही की निगरानी के लिए असाधारण शक्तियां देता है, इसलिए यह कुछ समय के लिए लागू रह सकता है।
तीसरा, मोदी सरकार ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जैसी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल पार्टियों और राज्य सरकारों को कमजोर करने व धमकाने के लिए किया है। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर एक मीम प्रसारित हो रहा है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी नेता चाहे वह शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, या राकांपा जैसी किसी भी पार्टी से हो, भाजपा में शामिल होकर भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त हो जाता है।
चौथा, लगातार विरोध करने वाली राज्य सरकारों पर हमला करते हुए मोदी सरकार ने भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की वफादारी को प्रच्छन्न रूप से परखना चाहा है। जबकि आधुनिक आईएएस और आईपीएस के निर्माता देश के पहले गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल ने अपने अधिकारियों को केंद्र और राज्य के बीच कुशल, प्रभावी और महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा। पटेल की अवधारणा में, वे हमेशा संविधान को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने के लिए थे, न कि राजनेताओं के दुर्भावनापूर्ण आदेशों का पालन करने के लिए। दूसरी ओर पटेल की कुर्सी पर अभी जो अमित शाह बैठे हैं, वह अपने अधिकारियों से व्यक्तिगत और वैचारिक वफादारी चाहते हैं। गैरभाजपा शासित पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में आईएएस और आईपीएस अधिकारी केंद्र के प्रति अपनी वफादारी घोषित करने के लिए दबाव में हैं। लोकसेवक के बारे में यह विकृत पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण केंद्र-राज्य संबंधों और सांविधानिक शासन के विचार के विपरीत है।
मोदी-शाह के शासन ने विपक्षी राज्य सरकारों को कमजोर करने के लिए राज्यपाल के कार्यालय का भी दुरुपयोग किया है। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में ही इसकी पुनरावृत्ति हुई, जहां के राज्यपालों ने पार्टी के प्रति वफादारी का ऐसा प्रदर्शन किया है, जो गणतंत्र के इतिहास में अप्रत्याशित है।
पांचवां, भारी कीमत और सांस्थानिक ऊर्जा खर्च कर प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व के 'छवि निर्माण' ने भी एक संघीय गणराज्य के रूप में भारत के विचार को कमजोर किया है, जिसमें राज्य और केंद्र समान भागीदार हैं। इसकी राज्यों को एक अनजानी लागत भी चुकानी पड़ी है। इस संबंध में जरा पीएम-केयर फंड पर विचार कीजिए। गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के अभाव के साथ यह फंड भी संघीय सिद्धांत का उल्लंघन है।
अंत में, हालांकि इंदिरा गांधी की तुलना में नरेंद्र मोदी ने अनुच्छेद 356 का कम इस्तेमाल किया हो, पर वह अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने वैधानिक रूप से गठित एक राज्य को समाप्त कर दिया। गोवा, अरुणाचल, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा और हिमाचल पहले केंद्र शासित प्रदेश थे, जो अंततः राज्य बन गए। पर जम्मू-कश्मीर में उलटा हुआ, जिसका दर्जा घटाकर केंद्र शासित क्षेत्र में बदल दिया गया। अहंकार में डूबकर सांप्रदायिक रंग के साथ उठाया यह कदम किसी भी प्रधानमंत्री द्वारा संघीय सिद्धांत पर सबसे क्रूर हमला था।
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