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मानसिक स्वास्थ्य: मौजूदा समय की प्राथमिकता, पर इसको लेकर कितना जागरूक है हमारा समाज?

Mon, 09 Jan 2023 05:15 PM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Mon, 09 Jan 2023 05:15 PM IST
सार

हमारा समाज मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अभी सजग नहीं है। यही कारण है कि हमारे आसपास काम करने वाले व्यक्ति से लेकर सड़क पर चलने वाला हर दूसरा व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है और हम उनकी पहचान नहीं कर पाते हैं।

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mental health priority for all, its importance for overall well being
मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता - फोटो : iStock

विस्तार

स्वास्थ्य, जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मान्यता भी है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है, इसीलिए अधिकांश लोग स्वास्थ्य की चिंता भी करते है और नियमित डॉक्टरी सलाह भी लेते हैं। स्वास्थ्य के प्रति लोगों की यह चिंता व सजगता मुख्यरूप से शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति ही देखा गई है, किंतु  मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी ध्यान देना उतना ही आवश्यक है।

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विडंबना है कि हममें से अधिकांश लोग इसे स्वास्थ्य का हिस्सा ही नहीं मानते हैं। इस भाग-दौड़ व चकाचौंध की आधुनिक दुनिया में हर व्यक्ति समस्या और डर से घिरा हुआ है। उसकी कुछ समस्याएं तो शारीरिक स्वास्थ्य का हिस्सा बनकर इलाज करवा लेती है, पर कुछ उसके भीतर ही भीतर मानसिक विकार का रूप लेकर अचेतन में जड़ बना लेती है।
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मनुष्य का यही अचेतन मन कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति पर हावी हो जाता है और मानसिक द्वंद्व का कारण बन जाता है। यह द्वंद्व कभी-कभी मनुष्य का स्वयं के प्रति हिंसात्मक व्यवहार के रूप में उभरता है तो कभी दूसरे मनुष्य के प्रति।

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मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजगता जरूरी

हमारा समाज मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अभी सजग नहीं है। यही कारण है कि हमारे आसपास काम करने वाले व्यक्ति से लेकर सड़क पर चलने वाला हर दूसरा व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है और हम उनकी पहचान नहीं कर पाते हैं। हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को सिर्फ पागलपन के रूप में ही देखा व समझा जाता रहा है, इसीलिए व्यक्ति स्वयं और परिवार भी नहीं समझ पाता है कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है और उसे ईलाज की आवश्यकता है।


जबकि मानसिक स्वास्थ्य पागलपन नहीं है बल्कि हमारी अति संवेदनाओं, भावनाओं व अतृप्त इच्छाओं का मानसिक विकारों के रूप में हावी होना है। जो मनुष्य को हत्या व आत्महत्या तक की स्थितियों में ला खड़ा करता है और हम सोचते रहते हैं कि एक सामान्य सा दिखने वाले व्यक्ति ने आत्महत्या कैसे कर ली? यह स्थितियां संवेदनाओं के मानसिक असंतुलन से उत्पन्न होती हैं। मानसिक असंतुलन की स्थितियां संवादहीनता के कारण और अधिक बढ़ रही है।

हमें बेहतर दिखने और अधिक बेहतर दिखने की प्रतिस्पर्धा ने अधिक आत्मकेंद्रित बना दिया है। आत्मकेंद्रित होने की इस प्रवृति के कारण मनुष्य अपने आसपास एक दिखावटी दुनिया का निर्माण कर लेता है और दो चेहरों के साथ जीना शुरू कर देता है। एक जिसे परिवार और समाज देख रहा है दूसरा उसका अपने आपसे जूझता भीतरी मन। आज जीवन में बदलते संघर्षों के मायनों ने भी मनुष्य के संघर्षरत जीवन को बदल दिया है।

पहले बहुत अधिक न भी सही तो एक उम्र तक बच्चा स्वतंत्र व तनावमुक्त जीवन जीता था। उसपर सामाजिक, शैक्षिक व पारिवारिक दबाव कम हुआ करता था। या कह सकते हैं कि वह परिवार बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखता था। बच्चा विषम परिस्थितियों, असफलता की स्थितियों में परिवार के सहयोग से स्वयं को मानसिक दबाव से मुक्त कर लेता था। वर्तमान में सामान्य स्थितियां, संबंध, परिवार का ढांचा और मनुष्य, सबकुछ बदल गया है। 

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अकेलापन, प्रतिस्पर्धा व असफलता का डर जीवन का संत्रास बनता जा रहा है। - फोटो : pixabay

मानसिक द्वंद्व से जूझता समाज

सामाजिक, आर्थिक दबाव ने बच्चों के पैदा होने के साथ ही उसमें अच्छा, बहुत अच्छा और सबसे अच्छा होने का भाव भर दिया है। वह इस भाव को ताउम्र अपने साथ लिए जीता है और अपनी आगे की पीढ़ी को हस्तांतरित करता है। हम मानसिक दबावों से भरे ऐसे समाज में पैदा हो रहे हैं जहां हमारे आस-पास अथाह तनावों व दबावों के घेरे हैं। बचपन से परिवार व समाज इन घेरों में प्रवेश लेने की शिक्षा तो देता है लेकिन वह इन घेरों से बाहर निकलने की शिक्षा देना भूल जाता है।

वह सफलता कैसे प्राप्त करें? यह शिक्षा अवश्य देता है लेकिन असफलता में कैसे स्वयं को मानसिक रूप से मजबूत बनाए? यह नहीं सिखाता है। आज हमारे आसपास का प्रत्येक व्यक्ति मानसिक द्वंद्व से जूझता, कभी ख़ुद से लड़ता तो कभी दूसरों से झगड़ता देखा जा सकता है। इन्हें ईलाज अर्थात काउंसलिंग और सबसे अधिक संवाद की आवश्यकता है।
 

अपनी मानसिक स्थितियों से किसी को परिचित न करा सकने की मानसिकता ही सबसे अधिक मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को जन्म दे रही है। मानसिक स्वास्थ्य को हमारी बीमारी न मानने की मानसिकता ही आत्महत्या की घटनाओं को बढ़ा भी रही है। हम जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं व समय-समय पर उसका निरीक्षण व परीक्षण करवाते रहते हैं उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य का भी करवाना चाहिए।


पश्चिमी देशों ने इस समस्या को गंभीरता से समझा है, यही कारण है कि इन देशों में लगभग हर व्यक्ति का अपना काउंसलर होता है। किंतु भारत में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को समस्या के रूप में देखने की मानसिकता का ही अभाव देखने को मिलता है। आज युवाओं में रोजगार की चिंता ने उनको अपने परिवार से दूर कर दिया है। 

अकेलापन, प्रतिस्पर्धा व असफलता का डर उनके जीवन का संत्रास बनता जा रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि नौकरीपेशा लोगों को अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करने का उचित समय दिया जाए जिससे कि वह अपने मानसिक द्वंद्व को अपनों से साथ साझा कर अपने मन में जन्म लेती नकारात्मक वृति का समन कर अपने ऊपर नकारात्मकता को हावी होने से बचा सके। अन्यथा युवाओं में बढ़ती मानसिक अस्वस्थता की स्थिति में आत्महत्या जैसा कदम हमारे, समाज, राष्ट्र के लिए हितकर नहीं होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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