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सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ और विश्वसनीयता के संकट से जूझता परंपरागत मीडिया

Sandeep kumar verma संदीप कुमार वर्मा
Updated Wed, 21 Oct 2020 08:29 AM IST
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Media is suffering with credibility Crisis by Social media information and misinformation flood
मीडिया अपनी उपस्थिति को न्यू मीडिया के मंच पर होना आवश्यक आधार मानती है

मीडिया जिसे हम अनेक माध्यमों पर फैला एक व्यापक कैनवास कह सकते हैं, आज अभिव्यक्तियों के संबंध में यह लगातार अपनी महत्ता बढ़ा रहा है। दुनिया के सभी क्षेत्रों को समाहित करने और उनकी संप्रेषणीयता को व्यक्त करने का गुण रखने वाली इस अभिव्यक्ति को यूं ही नहीं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं कहा जाता है।

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दुनिया भर में लोकतंत्र को परिपक्व बनाने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। यही नहीं लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आधारशिला में मीडिया ने अभूतपूर्व योगदान किया है। 
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हालांकि मीडिया ने अपने प्रकटीकरण के नए नए स्वरूप भी विस्तारित किए हैं। भारत ही नहीं अपितु दुनिया के सभ्य राष्ट्रों ने मीडिया की प्रकृति और प्रवृत्ति से उच्च मानकों के समाज और राष्ट्र निर्माण की बात को स्वीकार किया है।
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अलग-अलग मीडिया ने अपने आरंभिक दौर से लेकर वर्तमान स्थिति में उद्देश्यपरक और वैधानिक कार्य की स्वीकार्यता बनाई है। आज मीडिया को समाज के बीच उपलब्ध रहते हुए लगातार कसौटियों का सामना करना हो रहा है।
 
प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक सहित न्यू मीडिया ने आज सूचना की उपलब्धता से आगे निकलकर कई प्रतिमान स्थापित किए हैं। फिर चाहे वो सामाजिक स्थिरता की बात हो या सामंजस्य की। समाज को विकसित और आत्मउन्नति की दृष्टि से हस्तक्षेपी बनाने के लिए मीडिया असाधारण उपकरण जैसा है। इसीलिए राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में भी मीडिया आवश्यक अवयव है।

चूंकि मीडिया नागरिक स्वतंत्रता के रूप में उपजा एक आवश्यक अधिकार है जो असाधारण कार्य और प्रभाव पैदा कर सकता है। यही कारण है कि आज न्यू मीडिया की व्यापकता के कारण लोकतंत्र में अभिव्यक्ति और विचारों की भागीदारी अधिकाधिक सुनिश्चित हो रही है। 

साइबर युग में देखें तो सभी मीडिया अपनी उपस्थिति को न्यू मीडिया के मंच पर होना आवश्यक आधार मानती है। कोरोनाकाल में सघनबंदी तथा उसके बाद की परिस्थितयों में न्यू मीडिया की नई तदबीरें सामने आई हैं। स्थापित संचार माध्यमों की रवायतों को न्यू मीडिया ने बदलने का अवसर दिया। हालांकि विश्व भर में प्रिंट मीडिया को लेकर पहले भी पर्यावरणीय दृष्टि से ई-पेज के रूप में तैयार करने की तेजी देखी गई और अमेरिका उसमें अग्रणी रहा। 

एक दूरदर्शी प्रयोजन के रूप में ई-मीडिया उपयुक्त है। अब सूचना की उपलब्धता का संकट भी सरल हो गया है साथ ही तकनीक ने मीडिया कर्मियों को भी रफ्तार दी है।

इंटरनेट युक्त स्क्रीन युग ने क्षण में उपलब्ध होने वाली न्यू मीडिया, प्रिंट मीडिया और टेलीविजन जैसे माध्यमों की दशा को बदला है। यही कारण है कि लोगों में न्यू-मीडिया की अभिरूचि और अन्य मीडिया को लेकर मनोवैज्ञानिक बदलाव भी दिख रहे हैं।

मीडिया का व्यापक क्षेत्र अब इंटरनेट पर उपलब्ध है और हर मीडिया की सामग्री भी मानो सर्वसुलभ होने के लिए लगातार ऑनलाइन हो रही है। विश्व नागरिक की कल्पना ने आज अपनी उपस्थिति और प्रतिक्रियाएं भी ऑनलाइन देना आरंभ किया हैं।

ऑनलाइन भाषा अंतरण और अनुवाद तथा पठनीयता के विकल्प अब बोले जाने की तकनीक से लैस किए जा रहे हैं। यही कारण है कि न्यू मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों की लोकप्रियता शीर्ष पर है। अखबारों के ई-संस्करण, ऑनलाइन टेलीविजन, पोर्टल पर मीडिया मिक्स यानी कन्वर्जेंस का यह दौर तकनीकी उपयोगकर्ताओं के लिए आकर्षक है।

देश दुनिया की आकाशवाणी को उंगलियों पर स्क्रॉल करते हुए सुनने का आसान मंच भी रेडियो गार्डन के रूप में उपलब्ध है। सूचना संसार को सहज करता मीडिया का यह रूप आज साइबर पृष्ठभूमि की श्रेणी में है। साइबर युग ने ऑनलाइन मीडिया के पूरे तंत्र को साइबर अपराध के जोखिम से भी सीधा रूबरू कराने कार्य किया है।

Media is suffering with credibility Crisis by Social media information and misinformation flood
उपयोगकर्ता के लिए मीडिया का मनोविज्ञान, भावनात्मक विचार, दूरदर्शिता के पर्याय को समझ पाना कठिन हो जाता है

इस दौर में न्यू मीडिया हेतु वैधानिक संकट और दूरगामी परिणाम की दृष्टि तय करनी होगी। ऑनलाइन मीडिया हेतु लोकसंदर्भ और जवाबदेही का परिवेश तय करने के लिए तर्कसम्मत आधार बनाना जरूरी है। क्योंकि आज ऑनलाइन और सोशल मीडिया पर उपज रहे सूचना प्रहार से सूचना समाज प्रभावित हो रहा है।

छद्म रूप से साइबर अपराधों या समाचार के पीछे गैरतार्किक सूचना, मानहानिकारक विषय, असामाजिक और अश्लीलता सहित वेब जैकिंग और साइबर स्टॉकिंग से गोपनीय तरीकों से अनेक अपराध किए जा रहे हैं।

ऐसे में विषयवस्तु और उपयोगकर्ता के लिए मीडिया का मनोविज्ञान, भावनात्मक विचार, दूरदर्शिता के पर्याय को समझ पाना कठिन हो जाता है। वर्चुअल मीडिया में काल्पनिक वर्चस्व भी सूचना युग के वातावरण को प्रभावित कर रहा है। इस सभी उधेड़बुन के पीछे मीडिया की नीति और नियमन भी संकट के घेरे में आते हैं। मीडिया के सार्थक उपयोग सरल होने के बजाए ई-युग में जटिल भी हो गए हैं। 

मीडिया की स्वीकार्यता के लिए भी अब शक्ति प्रदर्शन करने पड़ रहे हैं। एक मीडिया दूसरी मीडिया पर निर्भर हो रही है इस कारण प्रत्येक मीडिया अपने मूल के समानांतर सोशल मीडिया के उपकरणों में भी अभ्यस्त हो चुकी है।

रोजमर्रा में मीडिया को निर्धारित करना एक जिम्मेदारीयुक्त कार्य है, जिसका सही मूल्यांकन और विश्लेषण भी समाज के सामने आना चाहिए। आभासी माध्यमों के संकट सहित आक्रांतित कर देने वाला परिवेश भी यहां है जो मीडिया में नए संकट खड़े कर सकता है। इसलिए विवेकपूर्ण तत्वों और तथ्य संचालन, साइबर विधियों और वैधानिक दृष्टि से अति आवश्यक है।

एक ओर साइबर सूचना तकनीक ने पाठक, दर्शक, श्रोताओं को ई-उपयोगकर्ता और सब्सक्राइबर बना दिया है। इस ऑनलाइन उपलब्धता के साथ तकनीकी उपकरण, निजी जानकारी और गोपनीयता का जोखिम भी है। आज सूचना और तथ्यों की पुष्टि और जांच के संकट भी हमारी मीडिया के सामने चुनौती है। इस कारण विश्व स्तर पर मीडिया की विश्वसनीयता का संकट भी बढ़ा है। 

हाल ही में विश्व भर ने देखा कि 180 देशों की मीडिया के सूचकांक में नार्वे, फिनलैंड और डेनमार्क क्रमश: प्रथम तीन श्रेणी में स्थान मिला है। वहीं प्रेस स्वतंत्रता की श्रेणी में भारत की स्थिति 180 देशों में 142वें स्थान पर रही। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्व स्तर पर व्यापक होती मीडिया को भारत जैसे देश में संचालन व नियंत्रण कैसे करना होगा? मीडिया उद्योग और मीडिया की भूमिका के साथ आज पेशेवर मीडिया को भी अपनी जगह और विश्वसनीयता कायम करना है।

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया सहित सभी नए माध्यमों को उत्तरदायित्वों से अलग नए प्रारूप तय करने होंगे. मीडिया की प्रभाशीलता का आधारभूत केंद्र क्या होगा, समाज में मीडिया की सामाजिकता से सृजनात्मक कार्य कैसे होंगे? वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा साइबर अपराधों की संकल्पना को ध्यान में रखते हुए उपयोगकर्ताओं को प्रशिक्षित करना होगा। साथ ही सतर्क बनाने की मुहिम भी जारी रखनी होगी।
जैसे समय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को आवश्यक जानकारी पूर्ण किए बिना उपयोग से रोकना भी एक बेहतर मार्ग हो सकता है।

महत्वपूर्ण एप्लिकेशन या वेब प्रयोजन हेतु मीडिया प्रशिक्षण का कार्य भारत में आवश्यक है। यद्यपि इस संबंध में सूचना प्रसारण मंत्रालय और साइबर सुरक्षा नीति के जरिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है फिर भी साइबर युग में सोशल मीडिया के बेहतर उपयोग और मानकीकरण के लिए सूचना समाज की वैश्विक प्रवृत्तियों के साथ भारतीय उपयोगकर्ताओं हेतु अद्यतन साइबर तकनीक के दिशानिर्देश लाने की अपेक्षा है।

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र, के जनसंचार विभाग में सहायक  प्राचार्य हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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