Delhi MCD Results: क्या जीत के पीछे छिपे कड़वे सच पर आत्ममंथन करेंगे अरविंद केजरीवाल?
जीत की खुशी में पूरी आम आदमी पार्टी ढोल की थापों पर नाच रही है, पर निश्चित ही अरविंद केजरीवाल इस जीत के आंकड़ों के पीछे छिपे कड़वे सच पर आत्ममंथन करेंगे, क्योंकि पौने तीन साल पहले वर्ष 2020 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनावों में उन्हें मिले वोटों में काफी गिरावट आ गई है, जो उनके लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
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तीन बार दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने आखिरकार नगर निगम चुनाव भी बहुमत के साथ जीत हासिल कर ली है। पूरी संभावना है कि अब दिल्ली में केजरीवाल का मेयर होगा। आम आदमी पार्टी को बहुमत (125) से 9 सीटें अधिक मिली हैं। इस जीत की खुशी में पूरी आम आदमी पार्टी ढोल की थापों पर नाच रही है, पर निश्चित ही अरविंद केजरीवाल इस जीत के आंकड़ों के पीछे छिपे कड़वे सच पर आत्ममंथन करेंगे, क्योंकि पौने तीन साल पहले वर्ष 2020 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनावों में उन्हें मिले वोटों में काफी गिरावट आ गई है, जो उनके लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
पहले दिल्ली नगर निगम चुनाव में मिले वोट प्रतिशत और सीटों पर निगाह डालते हैं।
आम आदमी पार्टी ने 250 में से 134 सीटें जीती हैं और उसे 42.05% वोट मिले हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 104 सीटें जीती हैं और उसे 39.05% वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस ने मात्र 9 सीटें जीती हैं और उसे 11.68% वोट मिले हैं। यदि वर्ष 2017 के नतीजों पर नजर डालें तो आम आदमी पार्टी बहुत फायदे में नजर आती है। तब उसे मात्र 25.08% वोटों के साथ 48 सीटें मिली थीं। भारतीय जनता पार्टी को 39.03% वोटों के साथ 181 सीटें और कांग्रेस को 21.02% वोटों के साथ 30 सीटें मिली थीं। इस बार अन्य के खाते में 3 सीटें आई हैं, जबकि पिछली बार 11 सीटें अन्य को मिली थीं।
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वर्ष 2013 में जब पहली बार आम आदमी पार्टी (29.50% वोट व 28 सीटें) ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा था, तब उसे कांग्रेस (24.60% वोट व 8 सीटें) से छिटका वोट ही मिला था और वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस (9.70% वोट व शून्य सीटें) का पूरा वोट आम आदमी पार्टी (54.30% वोट व 67 सीटें) की ओर से शिफ्ट हो गया था।
भाजपा को वर्ष 2013 में 33% वोट व 32 सीटें और वर्ष 2015 में 32.30% वोट व 3 सीटें मिली थीं। यही कहानी वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में दोहराई गई थी।
अब वर्ष 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखते हैं। आम आदमी पार्टी को 63 सीट (53.6%), भाजपा को 7 सीटें (38.5%) और कांग्रेस को 0 सीट (4.3% वोट) मिले थे। इस लिहाज से इस नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी को 10.75% वोटों का शुद्ध घाटा हुआ है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस पार्टी को हुआ है। उसको 7.7% अधिक वोट मिले हैं।
कांग्रेस बढ़ा सकती है मुश्किलें
यदि कांग्रेस अपने खोए मैदान को वापस ले रही है और खासकर मुस्लिम क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है तो यह आम आदमी पार्टी को चिंता में डालने वाला होगा। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने पुराने वोटबैंक में थोड़ी और बढ़त बना ली तो निश्चित ही अरविंद केजरीवाल के लिए चौथी बार सरकार बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। फिर उन्होंने नगर निगम चुनाव में जो लंबे-चौड़े वादे किए हैं, उनकी परख भी जनता करेगी। दिल्ली सरकार के साथ नगर निगम भी पास आने के बाद अरविंद केजरीवाल के पास कोई बहाना नहीं रह जाएगा।
दिल्ली में सालों-साल से खड़े कूड़े के पहाड़ों को साफ करने का सबसे बड़ा वादा अरविंद केजरीवाल ने इस चुनाव में किया है। दिल्ली के एजुकेशन और हेल्थ सिस्टम को वो पहले ही वर्ल्ड क्लास बताते आ रहे थे, अब नगर निगम के अंतर्गत आने वाले स्कूल और अस्पताल भी उन्हीं के जिम्मे आ गए हैं। आवारा जानवरों की समस्या दूर करने का जो वादा अरविंद केजरीवाल ने किया है, उसका रोडमैप कैसे बनाएंगे?
यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि आवारा जानवरों की समस्या केवल दिल्ली की नहीं है, यह देश भर की समस्या है। आवारा जानवरों से निजात पाने का कोई ठोस तरीका अब तक कोई राज्य खोजा नहीं पाया है।
पार्किंग की समस्या को दूर करने की बात अरविंद केजरीवाल ने की है। यह तो सर्वविदित है कि दिल्ली में गाड़ियां ज्यादा हैं और पार्किंग कम। क्या मल्टीलेवल पार्किंग सिस्टम्स की बाढ़ दिल्ली में आने वाली है? दिल्ली को पार्क सिटी बनाने का वादा भी आम आदमी पार्टी ने किया है। अच्छा वादा है, लेकिन जमीन के अभाव में यह पूरा कैसे होगा? यह देखना रोचक होगा।
वादों पर खरे उतर पाएंगे केजरीवाल
पिछले सालों में एमसीडी कर्मचारियों के वेतन की समस्या रही है। जब नगर निगम पर भाजपा काबिज थी तो वह अरविंद केजरीवाल पर ही बजट रोकने का आरोप लगाती थी। दिल्ली नगर निगम का बजट 15,276 करोड़ का है। उम्मीद है कि कर्मचारियों को अब वेतन की समस्या नहीं आएगी।
अरविंद केजरीवाल यदि वादों पर खरे नहीं उतरे तो पहले वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में यही जनता सबक सिखाएगी। कभी एक्टिविस्ट रहे अरविंद केजरीवाल अब नेता बन चुके हैं। बड़े वादे करने और उन्हें पूरा करने के अंतर को वो बखूबी समझते हैं।
शायद यही कारण है कि नगर निगम में जीत के बाद उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहयोग से दिल्ली का विकास कराएंगे। सहयोग मिलेगा या आरोप-प्रत्यारोप जारी रहेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
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