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दूसरा पहलू: महिला मंडल काशी... जहां सास अपनी बहुओं को सौंपती हैं नेतृत्व
सार
‘महिला मंडल काशी’ बनारस की पहली महिला संस्था थी। प्रतिष्ठित परिवार की महिलाएं इसका हिस्सा थीं और नंदन साहू लेन इसका पता।
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महिला मंडल काशी
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
महिला मंडल काशी की स्थापना 90 साल पहले रत्नेश्वरी देवी ने एक औषधालय के रूप में की थी। 1937 में बनी यह संस्था काशी की पहली महिला संस्था थी। चौखंबा के प्रतिष्ठित परिवार की महिलाएं इसका हिस्सा थीं और नंदन साहू लेन इसका पता।
1930 का दशक था। काशी के संभ्रांत परिवारों की महिलाओं ने घर की दहलीज पार कर समाज सेवा की शुरुआत की, पर ये महिलाएं परिवार की प्रतिष्ठा और मर्यादा की दुशाला ओढ़कर ही निकलतीं थीं। काशी के मशहूर मोती झील परिवार, आज प्रेस परिवार, शाह, कन्हैया अलंकार, भारतेंदु जैसे और भी प्रतिष्ठित परिवार की महिलाओं ने इसे शुरू किया। इनके जरिये महिलाओं के लिए सिलाई, कढ़ाई, चित्रकला, पुस्तकालय, पत्रिका प्रकाशन के साथ-साथ काशी की पहली तैराकी की क्लास भी शुरू की गई।
महिलाएं पढ़ पाएं, इसके लिए किताबें घर पर पहुंचाई जाती थीं। पर्दा प्रथा निभाते हुए घर से बाहर चादर ओढ़कर निकलना नियम था। ऐसे में, जब देश में चादर छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तो मंडल की महिलाओं ने भी उसमें हिस्सा लिया। गंगा घाट पर रहने वाली महिलाएं तैरना नहीं जानती थीं। सो, उन्हें तैराकी सिखाने के लिए ‘कालिंदी तैराकी शिविर’ की स्थापना की गई। यह नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुज बाबू गोकुल चंद्र की पौत्री व भारतरत्न डॉ. भगवान दास की नातिन कालिंदी के नाम पर रखा गया। इसके पीछे भी कहानी है। कम उम्र में कालिंदी की मृत्यु हो गई थी। उन्हीं की याद में यह शिविर शुरू किया गया।
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शिविर के लिए सुबह बाकायदा गंगा किनारे तंबू गाड़ा जाता, फिर पानी में मोटे रस्सों का घेरा बनाया जाता। शुरुआत में लोगों ने इसका विरोध किया। एक समय तो दो लठैत को तैराकी शिविर के बाहर तैनात करना पड़ा। हालांकि, धीरे-धीरे विरोध खत्म हो गया और हर साल गर्मी के एक महीने तक यह शिविर कई साल चला। 1978 में संस्था ने अपना पहला तीज मेला आयोजित किया था। इसमें महिलाएं साड़ी से लेकर पापड़ तक बेचने व खरीदने आईं। आज भी हर साल सावन में यह मेला लगता है।
फिलहाल, 100 से ज्यादा महिलाएं इस मंडल की सदस्याएं हैं। इनकी धरोहर में 4,000 किताबों वाला एक पुस्तकालय है। इनके कार्यक्रमों का हिस्सा काशी नरेश विभूति नारायण, प्रसिद्ध लेखिका शिवानी, भानु शंकर मेहता और ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी भी बन चुकी हैं। इस मंडल की महिलाएं ऑनलाइन जूम मीटिंग भी करने लगी हैं। परंपरा के मुताबिक, मंडल की जो महिलाएं सास बन जाती हैं, वे इसकी कमान अपनी बहुओं को सौंप देती हैं। शायद यही वजह है कि 90 साल से यह मंडल सक्रिय है।
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1930 का दशक था। काशी के संभ्रांत परिवारों की महिलाओं ने घर की दहलीज पार कर समाज सेवा की शुरुआत की, पर ये महिलाएं परिवार की प्रतिष्ठा और मर्यादा की दुशाला ओढ़कर ही निकलतीं थीं। काशी के मशहूर मोती झील परिवार, आज प्रेस परिवार, शाह, कन्हैया अलंकार, भारतेंदु जैसे और भी प्रतिष्ठित परिवार की महिलाओं ने इसे शुरू किया। इनके जरिये महिलाओं के लिए सिलाई, कढ़ाई, चित्रकला, पुस्तकालय, पत्रिका प्रकाशन के साथ-साथ काशी की पहली तैराकी की क्लास भी शुरू की गई।
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महिलाएं पढ़ पाएं, इसके लिए किताबें घर पर पहुंचाई जाती थीं। पर्दा प्रथा निभाते हुए घर से बाहर चादर ओढ़कर निकलना नियम था। ऐसे में, जब देश में चादर छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तो मंडल की महिलाओं ने भी उसमें हिस्सा लिया। गंगा घाट पर रहने वाली महिलाएं तैरना नहीं जानती थीं। सो, उन्हें तैराकी सिखाने के लिए ‘कालिंदी तैराकी शिविर’ की स्थापना की गई। यह नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुज बाबू गोकुल चंद्र की पौत्री व भारतरत्न डॉ. भगवान दास की नातिन कालिंदी के नाम पर रखा गया। इसके पीछे भी कहानी है। कम उम्र में कालिंदी की मृत्यु हो गई थी। उन्हीं की याद में यह शिविर शुरू किया गया।
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शिविर के लिए सुबह बाकायदा गंगा किनारे तंबू गाड़ा जाता, फिर पानी में मोटे रस्सों का घेरा बनाया जाता। शुरुआत में लोगों ने इसका विरोध किया। एक समय तो दो लठैत को तैराकी शिविर के बाहर तैनात करना पड़ा। हालांकि, धीरे-धीरे विरोध खत्म हो गया और हर साल गर्मी के एक महीने तक यह शिविर कई साल चला। 1978 में संस्था ने अपना पहला तीज मेला आयोजित किया था। इसमें महिलाएं साड़ी से लेकर पापड़ तक बेचने व खरीदने आईं। आज भी हर साल सावन में यह मेला लगता है।
फिलहाल, 100 से ज्यादा महिलाएं इस मंडल की सदस्याएं हैं। इनकी धरोहर में 4,000 किताबों वाला एक पुस्तकालय है। इनके कार्यक्रमों का हिस्सा काशी नरेश विभूति नारायण, प्रसिद्ध लेखिका शिवानी, भानु शंकर मेहता और ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी भी बन चुकी हैं। इस मंडल की महिलाएं ऑनलाइन जूम मीटिंग भी करने लगी हैं। परंपरा के मुताबिक, मंडल की जो महिलाएं सास बन जाती हैं, वे इसकी कमान अपनी बहुओं को सौंप देती हैं। शायद यही वजह है कि 90 साल से यह मंडल सक्रिय है।