बापू का स्त्री विमर्श: महात्मा गांधी ने अपने जीवन में महिलाओं से प्रेरणा भी ली और प्रेरित भी किया
गांधी सिर्फ नाम नहीं बल्कि स्वयं में एक विचार है। गांधी का नाम सुनते ही मन में कुछ सिद्धांत, दर्शन और संभावनाएं चलने लगती हैं। ये सभी विमर्श सत्य, अहिंसा, स्वराज, स्वदेशी और मानवतावाद से जुड़े हुए हैं। गांधी स्वयं को एक ऐसा व्यक्ति मानते थे, जो न तो एक स्त्री थे न ही एक पुरुष, बल्कि एक मानव थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके अंदर एक स्त्री मन भी है जो बहुत ही कोमल और संवेदनशील भी है।
गांधी के स्त्री चिंतन के विषय में जस्टिस रानाडे ने एक बार लिखा था कि “हमलोग अपनी पूरी जिंदगी में स्त्रियों के हित में जितना काम कर पाएंगे, महात्मा गांधी एक दिन में कर देते हैं। आज 21वीं सदी में महिलाओं की मुखर आवाज के पीछे गांधी का बहुत बड़ा योगदान है। या यों कहें की गांधी के जीवन में जो विचार तथा सिद्धांत पनपे उसकी प्रेरणा के पीछे भी कुछ महिलाएं शामिल हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
गांधी ने हर उस व्यक्ति से सीखा जिसके विचार सत्य, धर्म तथा अहिंसा के करीब था। यहां धर्म पूजा पाठ नहीं बल्कि मानवतावाद से संबंधित विचार के रूप में अभिव्यक्त है। इस संदर्भ में सर्वप्रथम उन्हें अपनी माता पुतलीबाई से जीवन की बुनियादी सीख मिली जो धर्म, उपवास की कठोर पृष्ठभूमि, पठन-पाठन की प्रेरणा, बड़ों का आदर आदि नैतिक शिक्षा से संबंधित है।
उन्हें अपनी माता से उपवास करने की प्रेरणा ऐसी मिली जो बीमारी या कमजोरी की हालत में भी तोड़ी न जा सके। यही कारण रहा कि स्वराज आंदोलन के समय गांधी कठोर से कठोर उपवास करते चले गए। उनकी माता अशिक्षित होते हुए भी उनके भीतर ज्ञान एवं अनुशासन की ऐसी प्रेरणा जागृत कर गईं, जिसे पढ़कर और महसूस करके हम आज भी चमत्कृत होते हैं।
उनके जीवन में दूसरी महत्वपूर्ण स्त्री कस्तूरबा बाई थीं, जो न केवल उनकी पत्नी थी बल्कि उनकी बाल सखा भी थीं। बाल सखा इसलिए, क्योंकि दोनों का विवाह बचपन में ही हो गया था। कस्तूरबा बचपन से ही स्वतंत्र स्वभाव की महिला थी, जो किसी भी प्रकार की मानसिक गुलामी को स्वीकार नहीं कर पाती थीं। उस समय अधिकतर महिलाएं अपने पति को परमेश्वर की तरह मानती थी किन्तु कस्तूरबा वैसी बातें कभी स्वीकार न करती जो उन्हें पराधीन बनाती थीं। बल्कि वे गांधी से उनके पूरे जीवन में प्रश्न पूछती रहीं हैं।
गांधी को उनसे सहनशीलता हठ, स्वतंत्र व्यक्तित्व, प्रतिप्रश्न की प्रेरणा मिली। गांधी दक्षिण अफ्रीका सत्याग्रह में लिखते हैं कि, ‘पत्नी ने अपनी अद्भुत सहनशीलता के द्वारा मुझपर विजय प्राप्त किया’। मां और पत्नी के अलावा भी महात्मा गांधी के जीवन में कई महिलाएं रहीं जिनसे न केवल गांधी ने प्रेरणा ली बल्कि उनके कार्यों की प्रशंसा भी की। उनमें सरोजिनी नायडू को गांधी एक बुद्धिजीवी महिला के रूप में चिह्नित करते हैं। एक ऐसी महिला जो भारतीय होते हुए भी पश्चिमी समाज में अत्यंत लोकप्रिय है। उनकी लोकप्रियता को गांधी ने रवींद्र नाथ ठाकुर के समकक्ष आका है।
गांधी सरोजिनी नायडू के विषय में लिखते हैं कि वे इतनी ज्ञानी और बुद्धिमान हैं कि सामने वाले को खरी-खरी सुना देंगी किन्तु उनकी बात इतनी तर्कसम्मत होती है कि कोई उनका बुरा नहीं मानता। वे पश्चिम में यदि अपने देशहित के काम से जाएंगी तो सफल होकर आएंगी। अमेरिका जाने पर कैथरीन मेयो को जवाब दे आएंगी और उनकी आत्मनिर्भरता तथा निर्भीकता भारत की तमाम महिलाओं के लिए अनुकरणीय है। वे अपनी कर्तव्यपरायणता से पुरुषों को भी लजा सकती हैं।
एनी बेसेंट जो भारतीय महिला तो नहीं थी किन्तु भारत की संस्कृति से प्रभावित होकर यहीं रह गईं थी। गांधी एनी बेसेंट को उसी समय से जानना और सुनना चाहते थे जब वे लंदन में रहकर वकालत की पढ़ाई कर रहे थे। एनी बेसेंट का एक भाषण उन्हे जीवन भर याद रह गया जो सत्य के विषय में बोला गया था। एनी बेसेंट ने एकबार जनता को मंत्रमुग्ध करनेवाला शानदार भाषण दिया और अंत में यह कहकर अपनी बात समाप्त की कि 'यदि मेरे कब्र पर केवल इतना लिख दिया जाए कि यह महिला सत्य के लिए जीवित रही और सत्य के लिए मरी तो मुझे पूर्ण संतोष हो जाएगा।'
इस भाषण को सुनकर गांधी को अपने बचपन में दी गई सत्य की परीक्षा की याद आ गई जिसे वे जीवनभर निभाते रहे। गांधी एनी बेसेंट की प्रशंसा इसलिए भी करते हैं कि उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए होमरुल आंदोलन चलाया और भारत माता को अपनी माता बना लिया। उम्र के अंत तक वह बिना रुके स्वराज्य के लिए काम करती रहीं। गांधी एनी बेसेंट को लोकमान्य तिलक के बाद दूसरी लोकप्रिय इंसान के रूप में चिह्नित करते हैं।
इसी कड़ी में मेडलीन उर्फ मीरा बहन की चर्चा करना भी आवश्यक हैं क्योंकि ब्रिटिश नागरिक मीरा बहन आश्रम में रहकर जिस निष्ठा, त्याग और पवित्रता से लोगों के बीच घुल मिलकर रहीं, वह अन्य भारतीय बहनों के लिए प्रेरणा है। जो स्त्री फूल, पेड़, पशुओं से बातें करती है, कल्पना के घोड़े उड़ाती हैं, वही लड़की एक दिन रूसी क्रांति की बातें करती हैं।
तात्पर्य यह है कि एक कोमल हृदय भी स्वराज्य के लिए कितना व्याकुल हो सकता है, यह बहुत प्रेरक और विचारोत्तेजक है। गांधी के आह्वान पर लाखों महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजयालक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सुशीला नायर, उषा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर, सरलादेवी चौधरानी समेत कई महिलाएं।
गांधी लिखते हैं, जिस तरह मेरे भीतर ब्रह्मचर्य का उदय हुआ, उस कारण मैं माता के रूप में स्त्रियों के प्रति दुर्निवार रूप से आकृष्ट हुआ, स्त्रियां मेरे लिए इतनी पवित्र हो गई कि मैं उनके प्रति वासनामय प्रेम का ख्याल ही नहीं कर सकता। गांधी अपने शब्दों में स्त्रियों के लिए जो बातें लिखते हैं, वह बहुत प्रासंगिक तथा विचारणीय है। वे लिखते हैं,
मुझमें जो भी सद्गुण हैं उसका श्रेय मेरी माता को जाता है। ऐसा मानते हुए मैं स्त्री को कभी भी विषय तृप्ति के रूप में नहीं देखता हूं बल्कि सदा वैसी श्रद्धा से देखता हूं जैसे मैं अपनी मां को देखता हूं। पुरुष को नारी का स्पर्श अपवित्र नहीं करता बल्कि प्राय: वह स्वयं इतना अपवित्र रहता है कि नारी का स्पर्श करने योग्य नहीं रहता।
इस प्रकार गांधी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व स्त्री संवेदना, स्त्रियों के विचार ओर उनके व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धा से भरा हुआ प्रतीत होता है। वर्तमान समय में हमलोग गांधी के इन्हीं विमर्शों का अभाव महसूस करते हैं जिसकी आज नितांत आवश्यकता है।
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